अभिषेक बनर्जी को 43 संपत्तियों पर नोटिस, जानिए किन प्रॉपर्टीज को लेकर उठा विवाद

 कोलकाता
पश्चिम बंगाल BJP ने तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी से कथित रूप से जुड़ी 43 संपत्तियों की एक विस्तृत लिस्ट सार्वजनिक कर दी है. इनमें कई संपत्तियां अभिषेक बनर्जी के परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों जैसे ममता बनर्जी, अमृता बनर्जी, सबिता बनर्जी, मिनाती बनर्जी, बाणानी बनर्जी और सायानी घोष के साथ संयुक्त रूप से मालिकाना हक (स्वामित्व)वाली बताई गई हैं। 

इसके अलावा अर्पिता बनर्जी, सुदेष्णा बनर्जी, आकाश बनर्जी, सोमनथ बनर्जी और प्रियंका दास जैसे कई अन्य नाम भी अलग-अलग संपत्तियों के मालिकों या पर्सन लायबल टैक्स के रूप में सूची में शामिल हैं। 

बीजेपी ने इन संपत्तियों की लिस्ट जारी करते हुए आरोप लगाया है कि इनका सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध अभिषेक बनर्जी से जुड़ा हुआ है. सूची में शामिल संपत्तियों के स्वामित्व, स्थान और अन्य विवरणों को सार्वजनिक किया गया है, जिससे राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। 

इस सामने आए डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, कोलकाता के विभिन्न स्ट्रीट और वॉर्डों में दर्ज ये संपत्तियां अलग-अलग लोगों के साथ ज्वाइंट ओनरशिप में हैं. लिस्ट में साफ तौर पर 58/3 बैरकपुर ट्रंक रोड पर स्थित ऑर्बिट ल्यूमियर, गरियाहाट रोड पर स्थित समिरन को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी और बेहला के बेचराम चटर्जी रोड स्थित ‘साईं भवन’ जैसी अचल संपत्तियों के असेसी नंबर और पते दर्ज दिखाई दे रहे हैं। 

कोलकाता के कई पॉश इलाकों में फैली हैं संपत्तियां
असेसमेंट विभाग की इस लिस्ट में कोलकाता के कई महत्वपूर्ण इलाकों जैसे डी गुप्ता लेन, धर्मतला रोड, देवेन्द्र घोष रोड, सर्वे पार्क, कालीपद मुखर्जी रोड और मोतीलाल गुप्ता रोड की संपत्तियों को ‘एक्टिव’ स्टेटस में दिखाया गया है. इनमें से अधिकांश संपत्तियों के साथ अलग-अलग मोबाइल नंबर भी दर्ज हैं, जिन्हें अब जांच और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में लाया जा रहा है। 

सूत्रों के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार इन सभी 43 संपत्तियों के स्वामित्व विवरण की गहन जांच कराएगी. जांच में ये पता लगाया जाएगा कि इन संपत्तियों का वास्तविक स्वामित्व कौन है, इनकी खरीदारी के स्रोत क्या हैं और इनमें कोई अनियमितता तो नहीं है। 

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को कहा कि नगर मामलों के विभाग और कोलकाता नगर निगम की संपत्ति रिपोर्टों से पता चला है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी की कथित तौर पर स्वामित्व वाली 24 संपत्तियों में से 14 उनकी कथित कंपनी ‘लीप्स एंड बाउंड्स’ के नाम पर, 4 सांसद के नाम पर और छह उनके पिता के नाम पर पंजीकृत हैं। 

भवानीपुर में एक धन्यवाद सभा में बंगाल के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री ने तृणमूल के तीन और नेताओं या उनके करीबी सहयोगियों की संपत्तियों के बारे में विवरण का खुलासा किया और फिर जोर देकर कहा कि उनकी सरकार सभी भ्रष्ट व्यक्तियों को सलाखों के पीछे भेज देगी। 

‘मैंने संपत्ति खोजने का दिया था निर्देश’
शुभेंदु ने लोगों को बताते हुए कहा कि मैंने नगर मामलों के विभाग के सचिव और कोलकाता नगर निगम के आयुक्त से 4 व्यक्तियों की संपत्ति का विवरण प्राप्त करने के लिए कहा था. क्या आप उनके नाम जानना चाहते हैं?

सीएम ने बताया, ‘पहले नंबर पर बेलेघाटा के राजू नस्कर हैं, जिनके पास 18 संपत्तियां हैं. दूसरे नंबर पर कस्बा की सोना पप्पू हैं, जिनके पास 24 संपत्तियां हैं. तीसरे नंबर पर भतीजा अभिषेक बनर्जी हैं. इनमें से 14 संपत्तियां ‘लीप्स एंड बाउंड्स’ कंपनी के नाम पर, चार उनके अपने नाम पर और छह उनके पिता के नाम पर पंजीकृत हैं. चौथे नंबर पर जावेद (अहमद) खान (तृणमूल के कस्बा विधायक) के बेटे हैं, जिनके पास 90 संपत्तियां हैं। 

‘सभी भ्रष्ट लोगों को भेजेंगे जेल’
उन्होंने आगे कहा, ‘जनता को लूटने वाले लुटेरे हैं. (पुलिस अधिकारी) शांतनु सिन्हा बिस्वास और (पूर्व मंत्री) सुजीत बोस की तरह, जिन्हें जेल भेजा गया था, बीजेपी सरकार निकट भविष्य में ये सुनिश्चित करेगी कि ऐसे सभी भ्रष्ट लोगों को सलाखों के पीछे भेजा जाए। 

वहीं, सोमवार को अभिषेक बिधाननगर पुलिस द्वारा हाल ही में उनके खिलाफ दर्ज किए गए एक मामले में सुरक्षा की मांग करने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचे। 

तमिलनाडु में सियासी भूचाल के संकेत, पूर्व CM का दावा- कभी भी गिर सकती है विजय सरकार

चेन्नई

तमिलनाडु की राजनीति में बड़े उथल-पुथल के आसार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा है कि सी जोसेफ विजय की सरकार कभी भी गिर सकती है। साथ ही उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से चुनाव के लिए तैयार रहने को कहा है। फिलहाल, इसे लेकर TVK यानी तमिलागा वेत्री कझगम की अगुवाई वाले गठबंधन से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इससे पहले द्रमुक विधायक भी दावा कर चुके हैं कि मौजूदा सरकार 6 महीने में गिर जाएगी।

एनडीटीवी के अनुसार, स्टालिन ने अपने जिला सचिवों से कहा है, ‘मौजूदा सरकार कभी गिर सकती है।’ साथ ही कहा है, ‘पार्टी को कभी भी चुनाव के लिए तैयार रहना होगा।’ उन्होंने कहा, ‘हार अस्थायी है। मौजूदा सरकार कभी भी गिर सकती है। तैयार रहो। इस बात की संभावनाएं हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी दोबारा हो सकते हैं। हम वापसी करेंगे और दोबारा जीतेंगे।’

DMK को क्या उम्मीद
रिपोर्ट में डीएमके सूत्रों के हवाले से लिखा कि अगर सरकार को समर्थन दे रहे वीसीके, सीपीआई, सीपीएम और आईयूएमएल हाथ खींच लें तो राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है। साथ ही कहा कि तमिलनाडु स्पीकर या अदालत AIADMK के बागी विधायकों को अयोग्य घोषित कर दें, तो भी ऐसी स्थिति बन सकती है।

सोशल मीडिया के जरिए जीत का दावा
स्टालिन ने सोमवार को आरोप लगाया कि टीवीके ने कोई जमीनी काम नहीं किया, बल्कि लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रभावित कर तमिलनाडु विधानसभा के लिए 23 अप्रैल को हुए चुनाव में जीत हासिल की। स्टालिन ने फिर टीवीके का नाम लिये बिना कहा कि सोशल मीडिया का उपयोग बच्चों के माध्यम से परिवार के सदस्यों को प्रभावित करने के लिए किया गया और ‘यह हमारी नजरों से चूक गया।’

उन्होंने कहा कि द्रमुक को इस बात का अहसास हो गया और अब से वह बहुत सतर्क रहेगी। उन्होंने कहा कि इसके लिए पार्टी ने सोशल मीडिया आधारित ऐसे प्रयासों को रोकने के लिए योजनाएं बनाई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि 1949 में स्थापित द्रमुक ने कई चुनावी जीत और हार देखी है और पार्टी हमेशा नए सिरे से वापसी करती आई है।

36 सदस्यीय समिति बनाई
खास बात है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में हार के विश्लेषण के लिए डीएमके 36 सदस्यों की एक समिति बनाई है। स्टालिन ने इस समिति से हार की वजहों पर एक निष्पक्ष और स्पष्ट रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने समिति के सदस्यों को शनिवार को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि यह अभ्यास महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि पार्टी की चुनावी गिरावट के मूल कारणों को समझने का एक अहम प्रयास है। इस पैनल को तमिलनाडु के सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों में व्यापक जमीनी अध्ययन करने और कार्यकर्ताओं एवं स्थानीय पदाधिकारियों से सीधे फीडबैक लेने का काम सौंपा गया है।

पुष्पा झुकेगा नहीं’ वाले TMC नेता जहांगीर खान ने बदले सुर? री-पोलिंग से पहले नामांकन वापस

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल की फाल्टा विधानसभा सीट पर वोटिंग से पहले टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने अपना नामांकन वापस ले लिया है. इस सीट पर 21 मई को फिर से वोटिंग होनी थी. लेकिन वोटिंग से 48 घंटे पहले ही उन्होंने चुनाव की दौड़ से खुद को अलग कर लिया है. इससे पहले खान ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया था और अग्रिम जमानत की अर्जी दी. उन्होंने कहा कि वोटिंग की तारीख से पहले उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। 

TMC प्रवक्ता बोले- पता नहीं क्यों लिया यह फैसला
TMC प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने बताया कि फाल्टा से उसके उम्मीदवार जहांगीर खान ने 21 मई को विधानसभा क्षेत्र में होने वाले चुनाव से हटने का फैसला कर लिया है. TMC प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि पार्टी को खान के इस फैसले के बारे में जानकारी मिली है, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। 

इस पूरे घटनाक्रम पर तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि पार्टी को खान के इस निर्णय के बारे में सूचना मिली है। हालांकि, पार्टी को अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस फैसले के पीछे क्या कारण है। उन्होंने कहा, हमने सुना है कि जहांगीर खान ने फाल्टा उपचुनाव में चुनाव नहीं लड़ने या भाग नहीं लेने का फैसला किया है।” प्रवक्ता ने आगे कहा कि पार्टी अभी तक उनके नाम वापस लेने के पीछे के कारण से अवगत नहीं है। यह अचानक लिया गया फैसला माना जा रहा है। पार्टी इस मामले में अधिक जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है।

‘पुष्पा’ का नया क्लाइमेक्स
फिल्म ‘पुष्पा’ का मशहूर संवाद ‘पुष्पा झुकेगा नहीं साला’ बोलकर सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने वाले जहांगीर खान का यह कदम किसी बड़े फिल्मी सस्पेंस से कम नहीं है. चुनाव प्रचार के दौरान उनके दबंग अंदाज और सोशल मीडिया रील्स को देखकर किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे वोटिंग से ठीक पहले मैदान से हट जाएंगे. मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, जो नेता चंद दिनों पहले तक विरोधियों को खुलेआम ललकार रहा था, उसने चुनाव आयोग और पुलिस प्रशासन की कड़क घेराबंदी के आगे घुटने टेक दिए. स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह चर्चा आम हो गई है कि आखिरकार ‘पुष्पा’ का यह तेवर इतनी जल्दी कैसे ढीला पड़ गया। 

क्यों हो रहा फाल्टा विधानसभा में री-पोलिंग?
इस पूरे ड्रामे के पीछे की असल कहानी 29 अप्रैल को हुए पहले दौर के मतदान से जुड़ी हुई है. फाल्टा विधानसभा सीट के सभी 285 पोलिंग बूथों पर उस दिन वोट डाले गए थे, लेकिन मतदान के दौरान बड़े पैमाने पर धांधली, ईवीएम मशीनों पर काली पट्टी (ब्लैक टेप) चिपकाने और मतदाताओं को डराने-धमकाने की गंभीर शिकायतें सामने आई थीं. विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार देते हुए सीधे दिल्ली तक गुहार लगाई थी. इसके बाद, चुनाव आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए 29 अप्रैल को हुए पूरे चुनाव को ही पूरी तरह रद्द कर दिया और आगामी 21 मई को पूरी सीट पर नए सिरे से ‘Fresh Poll’ यानी पुनर्मतदान कराने का ऐतिहासिक फरमान जारी कर दिया। 

21 मई को होने हैं चुनाव
फाल्टा विधानसभा सीट के लिए वोटिंग हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दो चरणों में से दूसरे चरण में, 29 अप्रैल को हुई थी। उस दिन, फाल्टा से चुनावी धांधली की कई शिकायतें सामने आई थीं। कई बूथों पर, भाजपा उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्नों के बगल वाले ईवीएम बटन पर सफेद टेप लगा दिया गया था। इसके बाद, विशेष चुनाव पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता, जो फिलहाल मुख्यमंत्री अधिकारी के सलाहकार हैं। उन्होंने खुद फाल्टा का दौरा किया और इस मामले की गहन जांच की।

उनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने पूरे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में दोबारा वोटिंग का आदेश दिया था। दोबारा वोटिंग 21 मई को होगी, और नतीजे 24 मई को घोषित किए जाएंगे। जहांगीर खान उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उन्होने चुनाव में पर्यवेक्षक के तौर पर आए आईपीएस अजयपाल शर्मा को लेकर टिप्पणी की थी। जिसमें जहांगीर खान ने अजयपाल की सिंघम वाली टिप्पणी पर कहा था कि अगर वह सिंघम हैं, तो मैं पुष्पा हूं। 

पार्टी प्रवक्ता ने कहा, “हमें पता चला है कि जहांगीर खान ने फाल्टा चुनाव में न लड़ने या हिस्सा न लेने का फैसला किया है. उनके इस फैसले के पीछे की वजह के बारे में हमें अभी भी कोई जानकारी नहीं है। 

सोशल मीडिया पर भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें कथित तौर पर खान को चुनाव से हटने के अपने फैसले की घोषणा करते हुए देखा जा सकता है. हालांकि, इस वीडियो की सच्चाई की पुष्टि नहीं हुई है। 

‘सिंघम’ की कड़क एंट्री
फाल्टा में दोबारा निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग ने एक बड़ा दांव खेला. आयोग ने कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए उत्तर प्रदेश कैडर के 2011 बैच के तेजतर्रार और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आईपीएस अधिकारी डॉ. अजय पाल शर्मा को विशेष पुलिस ऑब्जर्वर बनाकर फलता भेजा. अजय पाल शर्मा की छवि अपराधियों में खौफ और जनता में ‘सिंघम’ वाली रही है. उनके फाल्टा में पैर रखते ही केंद्रीय सुरक्षा बलों (CAPF) ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया और सुरक्षा घेरा बेहद कड़ा कर दिया। 

जब आमने-सामने आए दोनों
आईपीएस अजय पाल शर्मा की एंट्री के बाद फाल्टा का सियासी पारा उस वक्त सातवें आसमान पर पहुंच गया, जब उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इस मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, वोटरों को डराने-धमकाने की शिकायत मिलने पर आईपीएस अजय पाल शर्मा भारी पुलिस बल के साथ सीधे जहांगीर खान के दफ्तर और आवास पर धमक गए थे. कैमरे के सामने आईपीएस शर्मा ने जहांगीर खान के करीबियों और सुरक्षाकर्मियों को बेहद सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा था, “उसे (जहांगीर को) कह देना कि अपनी हद में रहे, अगर किसी भी तरह की बदमाशी या वोटरों को डराने की कोशिश की तो बहुत बुरी तरह निपटे जाएंगे, बाद में रोना मत। 

विवाद पर मचा भारी बवाल
इस कड़क चेतावनी के बाद टीएमसी और आईपीएस अजय पाल शर्मा के बीच सीधा टकराव शुरू हो गया. टीएमसी नेतृत्व ने इसे असंवैधानिक बताते हुए आरोप लगाया कि आईपीएस शर्मा बीजेपी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं और टीएमसी उम्मीदवार के परिवार को प्रताड़ित कर रहे हैं. यहां तक कि एक स्थानीय महिला ने आईपीएस शर्मा और केंद्रीय बलों पर देर रात घर में घुसने और बदसलूकी करने का आरोप लगाते हुए फलता थाने में शिकायत भी दर्ज करा दी थी. मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस कार्रवाई पर तीखी आपत्ति जताई थी, जबकि बीजेपी ने ‘सिंघम’ की इस सख्ती का खुलकर समर्थन किया था। 

अदालती चक्रव्यूह का दबाव?
इस भारी विवाद और प्रशासनिक शिकंजे के बीच जहांगीर खान कानूनी तौर पर भी घिर चुके थे. अपनी गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट की शरण ली थी. अदालत ने उन्हें 26 मई तक अंतरिम राहत देते हुए चुनाव खत्म होने तक गिरफ्तारी पर रोक तो लगा दी थी, लेकिन कोर्ट ने यह शर्त भी जोड़ी थी कि वे जांच में पूरा सहयोग करेंगे और इलाके में कोई अशांति नहीं फैलाएंगे। 

अगर कांग्रेस से हाथ मिला लेतीं ममता, तो क्या बदल जाता बंगाल का चुनावी गणित?

कोलकत्ता 
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही सिर्फ एक राज्य केरल में जीत दर्ज करने में सफल रही हो, पर इन चुनाव में पार्टी यह साबित करने में सफल रही कि उसके बगैर INDIA गठबंधन के घटक दलों के लिए जीत आसान नहीं है। कम से कम पश्चिम बंगाल में यह बात सही बैठती है, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट बंटवारे की वजह से तृणमूल कांग्रेस को करीब तीन दर्जन सीट का नुकसान हुआ है।

1 दर्जन से ज्यादा सीटों पर असर
चुनाव परिणाम के आंकड़ों के मुताबिक, एक दर्जन से अधिक सीट पर कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। वर्ष 2021 में इनमें से दस सीट टीएमसी के पास थी। पर इस बार कांग्रेस को टीएमसी और भाजपा के बीच जीत के अंतर से अधिक वोट मिले। इसके साथ टीएमसी को छह सीट का नुकसान नोटा की वजह से हुआ। इन सीट पर भी कांग्रेस को नोटा से अधिक वोट मिले थे।

बंगाल में कुल विधानसभा सीटें 294 हैं, जिनमें से टीएमसी के खाते में 80 सीटें आईं हैं। जबकि, भाजपा 207 पर विजयी रही है। कांग्रेस ने 2 और लेफ्ट को 1 सीट मिली है।

मुस्लिम वोटर्स ने दिया किसका साथ
इसके साथ भाजपा को मुस्लिम वोट में विभाजन का भी फायदा मिला। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर की कुल 43 में से 20 सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की। क्योंकि, मतदाता कांग्रेस, लेफ्ट, इंडियन सेकुलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की पार्टी में बंट गए। जबकि वर्ष 2021 में मतदाता टीएमसी के पक्ष में एकजुट थे। उस वक्त टीएमसी को इन सीट में 35 और भाजपा को सिर्फ आठ सीटें मिली थी।

लेफ्ट के पास सात फीसदी वोट
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट वर्षों सरकार में रहा है। लेफ्ट के पास अभी भी करीब सात फीसदी वोट है। हार के बाद INDIA गठबंधन की दुहाई देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले स्थिति को समझ लेतीं, तो उन्हें इस तरह हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। विश्लेषकों का कहना है कि कई दर्जन ऐसी सीट हैं, जहां लेफ्ट और कांग्रेस को तृणमूल की हार के अंतर से अधिक वोट मिले हैं।

स्थिति समझनी होगी
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि वक्त आ गया है कि सभी विपक्षी दल एक बार फिर एकजुट और नए सिरे से रणनीति बनाए। बकौल उनके, कांग्रेस अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है, पर क्षेत्रीय पार्टियों को भी स्थिति को समझना होगा। सभी घटक दलों के बेहतर तालमेल और साझेदारी के साथ चुनाव में उतरना होगा। इसके लिए लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में एकजुटता जरूरी है।

पहले भी हुआ नुकसान
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि विपक्षी दलों के मत विभाजन का फायदा भाजपा को मिला है। वर्ष 2022 के गुजरात और 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम इसकी मिसाल हैं। दिल्ली में कांग्रेस को करीब एक दर्जन सीट पर हार के अंतर से अधिक वोट मिले थे। इसी तरह गुजरात में आप की वजह से कांग्रेस को 39 सीट का नुकसान हुआ था। इन सीट पर आप को भाजपा की जीत के अंतर से अधिक वोट मिले थे। जबकि आप को सिर्फ पांच सीटें मिली थी।

अभिषेक बनर्जी कौन होते हैं साइन करने वाले?’ बंगाल विधानसभा ने MLA का लेटर लौटाया

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कौन होगा? यह अब तक साफ नहीं हो सका है। इसी बीच खबर है कि विधानसभा सचिवालय ने तृणमूल कांग्रेस की तरफ से नामित विधायक सोहनदेव चट्टोपाध्याय से 80 सदस्यों का समर्थन पत्र मांगा है। वहीं, पार्टी के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की तरफ से साइन किए लेटर को खारिज कर दिया है। ऐसे में विधायक ने RTI यानी सूचना का अधिकार दाखिल किया है।

क्या है विवाद
दरअसल, टीएमसी की तरफ से चट्टोपाध्याय को नामित किया गया है। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने इस संबंध में सचिवालय में लेटर भेजा था, जिसमें उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने की मांग की गई थी। अब इस पत्र पर अभिषेक बनर्जी ने साइन किए थे। जबकि, सचिवालय का कहना है कि 80 विधायकों के साइन किया हुआ पत्र लाया जाए।

इसके बाद बालीगंज विधायक ने RTI दाखिल की है। इसमें मांग की गई है कि 2011, 2016 और 2021 में विपक्ष के नेता को चुनने के लिए किन नियमों का पालन किया गया था।

दफ्तर पर लगा है ताला
रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘विधानसभा में विपक्ष का नेता चुनने के लिए आमतौर पर ऐसी कोई चिट्ठी नहीं भेजी जाती। विधानसभा का सचिवालय सीधे उस व्यक्ति को बता देता है कि उन्हें विपक्ष का नेता चुन लिया गया है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। यहां तक कि विपक्ष के नेता के दफ्तर में भी ताला लटका हुआ है।’

सचिवालय भड़का
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेजरी बेंच के एक सदस्य ने कहा, ‘वह (अभिषेक) यह पत्र जारी करने वाले कौन होते हैं? वह सांसद हैं और तथाकथित महासचिव हैं। उनके पास तृणमूल विधायक दल में औपचारिक रूप से कोई पद नहीं है। इस मामले में उनके साइन क्यों चलेंगे।’ साथ ही कहा, ‘ये बकवास अब रुकनी ही चाहिए।’
पत्र में क्या

13 मई को तृणमूल की तरफ से विधानसभा सचिव समरेंद्र नाथ दास को पत्र सौंपा गया था। इस पत्र पर अभिषेक बनर्जी ने साइन किए थे। साथ ही फिरहाद हाकिम को विपक्ष का चीफ व्हिप बनाया गया था। जबकि, नयन बंदोपाध्याय और आशिमा पात्रा को उपनेता बनाने की बात कही गई थी।

चट्टोपाध्याय का कहना है, ‘मैं आरटीआई दाखिल करने के लिए मजबूर हो गया था। उसमें मैंने पूछा है कि बीते तीन सालों में सचिवालय ने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका के लिए किन नियमों का पालन किया है।’ उन्होंने नियमों का पालन करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया विपक्ष में सबसे बड़े दल को महज 30 सीटों की जरूरत होती है।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि सचिवालय ने चट्टोपाध्याय की नियुक्ति के तरीके पर सवाल उठाए हैं। इसमें कहा गया है कि विधायकों एक आंतरिक मीटिंग में अपना नेता चुनना चाहिए। सूत्रों ने यह भी कहा कि सचिवालय ने बैठक के नतीजों का ब्योरा मांगा है।

दक्षिण भारत में कांग्रेस का दबदबा, 106 सीटों का गणित 2029 में BJP के लिए बनेगा बड़ी चुनौती?

नई दिल्ली

केरल की सत्ता में वापसी के साथ कांग्रेस पार्टी के अरमानों को नए फंख लग गए हैं. इसके साथ ही कांग्रेस दक्षिण के पांच में से तीन राज्यों में सीधे और एक में परोक्ष रूप से सत्ता में भागीदार हो गई है. केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में उसकी हालत ठीक है. वहीं उत्तर में पार्टी की एक मात्र राज्य हिमाचल प्रदेश में सरकार है. लेकिन, दक्षिण में मिली सफलता के बाद राजनीतिक पंडितों का एक धड़ा इस बात की चर्चा करने लगा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी कहां खड़ी होती दिख रही है। 

दरअसल, उत्तर और दक्षिण भारत का राजनीतिक मिजाज पूरी तरह अलग है. हर एक मानक पर देश के दोनों क्षेत्र बिल्कुल अलग है. देश भर में एकछत्र सफलता हासिल कर चुकी भाजपा दक्षिण की ओर बढ़ते-बढ़ते अपनी रफ्तार खो देती है. मौजूदा वक्त में केवल आंध्र प्रदेश में वह चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी सरकार में वह भागीदार है. हालांकि पुड्डुचेरी में भी उसी सरकार है. मगर पांचों बड़ों राज्यों यानी तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना में से केवल कर्नाटक में ही पार्टी अपना एक ठोस जनाधार बना पाई है. वह कर्नाटक की सत्ता तक पहुंची है लेकिन बाकी के चारों राज्यों में उसकी मौजूदगी काफी कम है। 

पूरे दक्षिण की बात करें तो यहां लोकसभा की कुल 130 सीटें हैं. इसमें से 39 तमिलनाडु, 28 कर्नाटक, 25 आंध्र प्रदेश, 20 केरल, 17 तेलंगाना और एक सीट पुड्डुचेरी में हैं. इसमें आंध्र प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी जगहों पर कांग्रेस की स्थिति अच्छी है. यानी कुल 106 सीटों पर कांग्रेस सीधी टक्कर में है. कांग्रेस ने बीते 2024 के लोकसभा चुनाव में दक्षिणी राज्यों में भी इंडिया गठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा. ऐसे में गठबंधन को कुल 74 और भाजपा की एनडीए को 49 सीटों पर जीत मिली थी. केवल कांग्रेस की बात करें तो उसने अपने दम पर तमिलनाडु में नौ, कर्नाटक में नौ, आंध्र प्रदेश में शून्य, तेलंगाना में आठ और केरल में 14 सीटों पर जीत हासिल की. इस तरह उसे कुल 40 सीटों पर जीत मिली. वहीं भाजपा को अपने दम पर तमिलनाडु में शून्य, कर्नाटक में 17, आंध्र प्रदेश में तीन, तेलंगाना में आठ और केरल में एक सीट पर जीत मिली. उसे कुल 29 सीटें मिलीं. इस तरह पूरे इलाके में अकेले और बतौर गठबंधन दोनों स्थितियों में कांग्रेस का पलड़ा भारी है। 

तमिलनाडु में बदल चुकी है स्थिति
तमिलनाडु में राजनीतिक स्थिति बदल चुकी है. कांग्रेस ने अपने पुराने सहयोगी डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके के साथ चली गई है. ऐसे में लोकसभा चुनाव में उसको इसका और अधिक फायदा मिल सकता है. दूसरी तरफ पार्टी केरलम में वापस सत्ता में आई है. तेलंगाना और कर्नाटक में उसकी सरकार है और वहां भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. ऐसी स्थिति में दक्षिण में भाजपा के लिए चुनौती देखी जा रही है। 

थोड़ी बात उत्तर की
अब थोड़ी उत्तर भारत की भी बात कर लेते हैं. उत्तर भारत में वैसे तो कांग्रेस करीब-करीब पूरी तरह सत्ता से बाहर है लेकिन कुछ राज्यों में उसके मजबूत मौजूदगी को खारिज नहीं किया जा सकता. इसमें सबसे पहला नाम पंजाब का है. पंजाब में लोकसभा की 13 सीटें हैं. इसमें से सात पर कांग्रेस और तीन पर आम आदमी पार्टी को जीत मिली थी. यहां आम आदमी पार्टी की सरकार है. राज्य में आम आदमी पार्टी दोफाड़ हो चुकी है. ऐसे में यहां पर भी कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है. इस राज्य में भाजपा की शून्य सीटें मिली थी। 

इस कड़ी में दूसरा राज्य हरियाणा है. यहां लोकसभा की 10 सीटें हैं. भाजपा और कांग्रेस यहां बराबरी पर हैं और दोनों को पांच-पांच सीटों पर जीत मिली थी. उत्तर भारत में तीसरा सबसे बड़ा राज्य राजस्थान है जहां कांग्रेस अभी भी मजबूत स्थिति में है. राज्य में लोकसभा की 26 सीटें हैं और बीते चुनाव में वह आठ सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुई थी. भाजपा को यहां 14 सीटों पर जीत मिली थी. कहने का मतलब है कि इन कुछ राज्यों से कांग्रेस को उम्मीद है. राजनीति के जानकार और आंकड़ों भी बताते हैं कि यहां अपने दम पर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. इस तरह से देखें तो दक्षिण की 130 और उत्तर भारत की 49 सीटों पर वह सीधे टक्कर में है. यानी कुल 179 सीटों पर वह टक्कर में है. इसके अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस की ठीकठाक मौजूदगी है। 

फलता बना बंगाल की सियासत का नया रणक्षेत्र, क्या ममता के गढ़ में सेंध लगा पाएगी BJP?

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की सियासत में ‘डायमंड हार्बर’ का इलाका हमेशा से हाई-वोल्टेज रहा है. इस वक्त सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बना हुआ है इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला फलता विधानसभा क्षेत्र. चुनावी हिंसा के आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर फालता में 21 मई को दोबारा मतदान कराने का फैसला किया। 

फलता विधानसभा सीट पर चुनाव कैंपेनिंग के लिए आखिरी 48 घंटे बचे हैं. फलता की धरती पर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है. इस बार के विधानसभा चुनाव के केंद्र में हैं टीएमसी के कद्दावर उम्मीदवार जहांगीर खान, जिनके इर्द-गिर्द इस इलाके का पूरा समीकरण घूम रहा है। 

बंगाल की सियासत में जहांगीर खान की तूती बोलती थी, लेकिन अब सत्ता बदल चुकी है. ऐसे में फलता सीट जो 15 सालों से टीएमसी का मजबूत गढ़ बना हुआ है, उस पर बीजेपी भी जीत का परचम फहराना चाहती है. ऐसे में क्या जहांगीर खान अपना सियासी प्रभाव जमाए रख सकेंगे या फिर सत्ता के बदलन के साथ ही सियासी गेम भी फालता का बदल जाएगा। 

सिंघम’ बनाम ‘पुष्पा’ की  चुनावी जंग 
फालता का चुनाव आम सियासी लड़ाई से कहीं आगे निकलकर एक एक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा हो चुका है. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा, जिन्हें यूपी की सियासत में ‘सिंघम’ के तौर पर देखा जाता है. वहीं, टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने एक चुनावी जनसभा में खुलेआम चुनौती देते हुए कहा था, ‘अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं… पुष्पराज, झुकेगा नहीं। 

पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन और बीजेपी की बड़ी जीत के बाद अब सियासी समीकरण पूरी तरह पलट गए हैं. टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान जो कुछ दिन पहले तक गायब (अंडरग्राउंड) बताए जा रहे थे, वे चुनाव आयोग के निर्देश और पुलिस सुरक्षा के साये में वापस फालता लौटे हैं और अपने प्रचार में जुटे हैं। 

फलता सीट का सियासी समीकरण
फलता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले में आती है. पारंपरिक रूप से यह इलाका टीएमसी और खासकर अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. देश की आजादी के बाद से फलता सीट पर 1952 से लेकर अब तक कुल 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और इस बार 18वीं बार चुनाव हो रहे. इस सीट की खासियत यह रही है कि यहां जब भी जो लहर आई, जनता ने लंबे समय तक उसी पार्टी का साथ दिया। 

1952 से लेकर 2006 तक लेफ्ट ने नौ बार फलता सीट पर जीत दर्ज की है. कांग्रेस ने चार बार इस सीट पर जीत का परचम फहरा चुकी है तो टीएमसी भी 4 बार जीतने में सफल रही है. 2011 से लेकर अभी तक टीएमसी का दबदबा है. 2021 के चुनाव में टीएमसी ने यहां करीब 40 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. इतिहास गवाह है कि फलता सीट पहले करीब तीन दशक तक वामपंथ का अभेद्य दुर्ग थी, जिसे बाद में टीएमसी ने अपना नया घर बना लिया। 

देवांग्शु पांडा और जहांगीर खान में फाइट
2026 फलता सीट पर अभूतपूर्व पुनर्मतदान में चलते दोबारा चुनाव हो रहे हैं. बीजेपी के देवांग्शु पांडा और टीएमसी के जहांगीर खान के बीच मुख्य मुकाबला है. फलता का यह किला टीएमसी के पास सुरक्षित गढ़ रहा है, लेकिन बीजेपी अब इस सीट पर हरहाल में जीत का परचम फहराना चाहती है.  बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा, जो पेशे से वकील हैं, वे इस बार टीएमसी के ‘खौफ वाले नैरेटिव’ को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. केंद्रीय बलों की भारी तैनाती के कारण इस बार फर्जी वोटिंग या बूथ कैप्चरिंग की गुंजाइश न के बराबर है, जो बीजेपी के पक्ष में जा सकता है। 

बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने फलता में खुद कमान संभाल ली है. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा के समर्थन में एक बड़ी रैली की और सीधे जहांगीर खान पर निशाना साधा. शुभेंदु ने सरेआम चेतावनी देते हुए कहा था कि वह (जहांगीर खान) खुद को पुष्पा कहता है, अब इस ‘पुष्पा’ की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है. फलता के लोगों ने पिछले 10 साल से आजादी से वोट नहीं डाला है, लेकिन इस बार बिना किसी खौफ के मतदान कीजिए और बीजेपी को 1 लाख से अधिक वोटों से जिताइए। 

फलता सीट पर क्या बीजेपी जीत सकेगी
फलता विधानसभा सीट के सियासी समीकरण को देखें तो मुस्लिम और दलित वोटर अहम हैं. इस इलाके में अल्पसंख्यक और दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है, जो अब तक टीएमसी का पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं, जहांगीर खान इसी समीकरण के भरोसे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं तो बीजेपी दलित वोटों और हिंदू वोटों के धार्मिक ध्रुवीकरण पर अपनी जीत की आस लगा रही है। 

पश्चिम बंगाल की सत्ता में बीजेपी के आने के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस का रुख पूरी तरह बदल चुका है. फलता में पुलिस ने हाल ही में जहांगीर खान के बेहद करीबी और फलता पंचायत समिति के उपाध्यक्ष सैदुल खान को जानलेवा हमले और हिंसा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। 

आखिरी 48 घंटे में आर-पार की लड़ाई
फलता सीट पर चुनाव कैंपेनिंग के ये आखिरी 48 घंटे बेहद संवेदनशील हैं. एक तरफ टीएमसी और जहांगीर खान अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं और सहानुभूति कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें फंसाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी इस पुनर्मतदान को ‘आतंक से मुक्ति’ के उत्सव के रूप में प्रचारित कर रही है। 

बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद 21 मई को होने वाला यह पुनर्मतदान सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या केंद्रीय बलों और सख्त प्रशासन की मौजूदगी में डायमंड हार्बर के इस इलाके में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं. जहांगीर खान का ‘पुष्पा’ अवतार फाल्टा की जनता को भाता है या शुभेंदु अधिकारी का ‘एक्शन’ रंग लाता है, इसका फैसला 24 मई को नतीजों के साथ होगा। 

 

केरल में BJP का 13 सूत्रीय एजेंडा: लोकसभा चुनाव से पहले अल्पसंख्यक और OBC राजनीति पर फोकस

केरल

केरल विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर जीत से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए 13 सूत्रीय राजनीतिक एजेंडा जारी किया है. पार्टी ने इस एजेंडे में पिछड़े हिंदू समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ अपने राजनीतिक समीकरण को नए सिरे से तय करने पर जोर दिया है.

यह राजनीतिक प्रस्ताव शनिवार को तिरुवनंतपुरम में हुई केरल बीजेपी की कोर कमेटी की बैठक में पारित किया गया. बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री और केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने की. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 13 सूत्रीय एजेंडे में राज्य की क्रिश्चियन कम्युनिटी के बीच कोई स्पेशल आउटरीच प्रोग्राम चलाने का उल्लेख नहीं किया गया है. केरल विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने चर्च और क्रिश्चियन कम्युनिटी के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश की थी.

सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने क्रिश्चियन कम्युनिटी से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है, लेकिन चर्च नेतृत्व के साथ संस्थागत स्तर पर संबंध मजबूत करने की रणनीति से पीछे हट गई है. इसकी एक बड़ी वजह कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ के साथ चर्च नेतृत्व की बढ़ती राजनीतिक नजदीकी मानी जा रही है. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 का चर्च द्वारा विरोध भी बीजेपी के लिए चुनावी अभियान में असहज स्थिति का कारण बना.

बीजेपी ने अपने नए एजेंडे में ओबीसी आरक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया है. पार्टी का कहना है कि धर्म के आधार पर ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए और आरक्षण केवल ओबीसी, एससी, एसटी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सीमित रहना चाहिए. पार्टी का आरोप है कि केरल में अल्पसंख्यक समुदाय का एक वर्ग ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ ले रहा है, जिसे समाप्त किया जाना चाहिए. राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि बीजेपी पिछड़ा वर्ग आरक्षण को धर्म आधारित आरक्षण में बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध करेगी.

उन्होंने कहा कि पार्टी की नीति ‘सबके लिए न्याय, किसी का तुष्टिकरण नहीं’ है. उन्होंने आरोप लगाया कि यदि राज्य सरकार मुस्लिम लीग और जमात-ए-इस्लामी के दबाव में तुष्टिकरण की राजनीति करती है तो बीजेपी उसका कड़ा विरोध करेगी. बीजेपी ने अपने 13 सूत्रीय एजेंडे में सबरीमला मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया है. पार्टी ने सबरीमला गोल्ड लूट मामले में सीबीआई जांच की मांग की है और महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग भी की है.

इसके अलावा मंदिरों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों का ऑडिट कराने की मांग की गई है. पार्टी ने शिक्षा संस्थानों में निवेश बढ़ाने, बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों, आतंकवादी संगठनों और नशे के प्रभाव से बचाने के लिए कदम उठाने की भी बात कही है. बीजेपी का दावा है कि केरल में अब एलडीएफ और यूडीएफ के अलावा तीसरा राजनीतिक विकल्प उभर चुका है और जनता ने उसे स्वीकार करना शुरू कर दिया है.
 
हालांकि चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, केरल में बीजेपी की सीटें बढ़ने के बावजूद उसके वोट शेयर में बड़ा उछाल नहीं आया. पार्टी को 2026 विधानसभा चुनाव में 11.42 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2021 में उसे 11.30 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. पार्टी का लक्ष्य 20 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर राज्य की बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का था, लेकिन वह इससे काफी पीछे रह गई. हालांकि, इस केरल विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने लिए सकारात्मक पक्ष भी देख रही है. राजीव चंद्रशेखर के मुताबिक राज्य की 21 सीटें ऐसी रहीं, ​जहां बीजेपी को 20 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, वहीं 10 ऐसी सीटें भी रहीं, जहां पार्टी को 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले.

TVK सरकार पर विपक्ष का हमला, विधायकों की खरीद-फरोख्त का दावा

चेन्नई

 तमिलनाडु में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद सत्ता में आए विजय थलापति और उनकी पार्टी के ऊपर गंभीर आरोप लग रहे हैं। तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) प्रमुख दिनाकरन ने विजय और उनकी पार्टी के ऊपर हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने के लिए तमिलगा वेट्री कझगम ने हॉर्स ट्रेडिंग की है। उन्होंने कहा कि अगर विजय ने एएमएमके से गए विधायक को मंत्री पद दिया, तो फिर वह इस मामले की सीबीआई जांच की मांग करेंगे।

तिरुचिरापल्ली में मीडिया से बात करते हुए दिनाकरन ने विजय और उनकी पार्टी की पूरी राजनीति पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि टीवीके की पूरी राजनीति ही हॉर्स ट्रेडिंग पर आधारित है। उन्होंने सीएम विजय पर तंज कसते हुए कहा, “विजय कहते हैं कि वह घोड़े की रफ्तार से काम करेंगे, लेकिन उन्होंने घोड़ा ही मोलभाव करके खरीदा है।”

दरअसल, यह पूरा मामला विजय और उनकी सरकार द्वारा पास किए गए फ्लोर टेस्ट के दौरान का है। AMMK ने तमिलनाडु विधानसभा में एक सीट हासिल की थी। लेकिन फ्लोर टेस्ट के पहले ही उसके एकमात्र विधायक एस. कामराज ने विजय की पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद पार्टी ने अपने एकमात्र विधायक को निष्कासित कर दिया। विधायक के ऊपर कार्यवाही की मांग करते हुए पार्टी प्रमुख ने कहा कि था राजनीतिक दल में केवल पार्टी प्रमुख को ही चीफ व्हिप जारी करने का अधिकार होता है।

AMMK के अलावा मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने भी विजय की पार्टी के ऊपर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। डीएमके नेता एसएस शिवशंक ने शनिवार को टीवीके पर एआई़डीएमके और एएमएमके के विधायकों की हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विजय की सरकार कुछ ही दिनों की मेहमान है। मीडिया से बात करते हुए डीएमके नेता ने कहा कि लगातार विरोध और राजनीतिक अहंकार ही टीवीके और विजय के पतन का कारण बनेगी।

‘मैं घोर सनातनी हूं’— Digvijaya Singh बोले- एकादशी व्रत रखता हूं, नर्मदा परिक्रमा भी कर चुका हूं

इंदौर 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह  इंदौर में थे, वे जब रेसीडेंसी कोठी में विधायक उषा ठाकुर से मिले तो दोनों में मीठी नोक झोंक हुई। ठाकुर ने भोजशाला के फैसले पर कुछ कहा कि तो दिग्विजय सिंह ने कहा कि मैं घोर सनातन धर्म को मानने वाला हुं। मैने नर्मदा परिक्रमा है। एकादशी का उपवास करता हुं। उषा ने कहा कि आप पक्के सनातनी है तो सार्वजनिक रुप से स्वीकार करना चाहिए। भोजशाला को लेकर जो फैसला आया है। उसका आपको सम्मान करना चाहिए। तो दिग्विजय सिंह ने कहा कि तुम्हें कैसे मान लिया कि मैंने फैसले का विरोध किया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक दिवसीय दौरे पर इंदौर पहुंचे। वे पूर्व विधायक अश्विन जोशी के निधन पर शोक प्रकट करने उनके निवास पर पहुंचे। इसके बाद वे अन्य कार्यकर्ता व नेतागणो से भी मिले।

मीडिया से चर्चा के दौरान सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में अच्छे दिन लाने का वादा किया था, लेकिन आज आम जनता महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रही है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल, डीजल और रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। जिससे गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है, जबकि कुछ चुनिंदा लोग लगातार अमीर बनते जा रहे हैं।

सिंह ने कहा कि पहले भाजपा नेताओं द्वारा कांग्रेस पर लोगों का मंगलसूत्र छीनने जैसे आरोप लगाए जाते थे, लेकिन अब जनता को सोना नहीं खरीदने, विदेश यात्रा नहीं करने और तेल कम उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है और रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट आई है। बेरोजगारी कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है।

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और घोटालों को लेकर भी सिंह ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नीट परीक्षा में धांधली रोकने के लिए समिति द्वारा विस्तृत रिपोर्ट दी गई थी, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। उनका आरोप था कि बार-बार सामने आ रहे घोटाले युवाओं के भविष्य के साथ बड़ा धोखा हैं।
 
भोजशाला मामले में इंदौर हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि फैसले का अध्ययन किया जाएगा और आगे की कार्रवाई कानून व संविधान के दायरे में रहकर ही की जाएगी। उन्होंने कहा कि भोजशाला एक एएसआई संरक्षित स्थल है और वहां पूजा-अनुष्ठान को लेकर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट करेगा।

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