तमिलनाडु में ऑपरेशन L तेज, AIADMK के 10 विधायक जल्द TVK में शामिल होंगे।

नई दिल्ली
तमिलनाडु की राजनीति में इस समय एक बड़ा सियासी भूचाल आया हुआ है। मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की अगुवाई वाली सत्तारूढ़ पार्टी तमिलगा वेत्रि कड़गम (TVK) बहुमत के करीब पहुंचती दिख रही है। खबर आ रही है कि मुख्य विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके (AIADMK) के करीब 10 और असंतुष्ट विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर 15 अगस्त से पहले औपचारिक रूप से सत्तारूढ़ TVK में शामिल हो सकते हैं। विजय की पार्टी के भीतर इस योजना को ऑपरेशन एल (Operation L) का नाम दिया गया है।

सूत्रों का कहना है कि विधायकों के इस्तीफे की यह टाइमिंग बेहद सोच-समझकर तय की गई है। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग जल्द ही विधानसभा उपचुनावों का ऐलान कर सकता है। वार्ता में शामिल एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “इस्तीफे और दलबदल की यह पूरी प्रक्रिया स्वतंत्रता दिवस से पहले पूरी कर ली जाएगी। मुख्य उद्देश्य यह है कि चुनाव आयोग द्वारा उपचुनावों की तारीखों की घोषणा करने से पहले इसे अंतिम रूप दे दिया जाए।”

यह राजनीतिक उठापटक पिछले कुछ हफ्तों से लगातार जारी है। मई महीने में जिन 25 AIADMK विधायकों ने अपनी ही पार्टी के व्हिप का उल्लंघन कर सरकार बनाने के लिए विजय का समर्थन किया था, उनमें से लगभग आधे या तो TVK का दामन थाम चुके हैं या शामिल होने की कगार पर हैं।

तमिलनाडु में क्या है सीटों का गणित
234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा की वर्तमान में 227 विधायकों की क्षमता है। 7 सीटें फिलहाल खाली हैं। सत्तारूढ़ TVK के 107 विधायक हैं। वहीं, विपक्षी AIADMK में लगातार इस्तीफों के कारण घटकर विधायकों की संख्या 41 हो गई है। हाल ही में एआईएडीएमके के पूर्व मंत्री सी. विजयभास्कर और एम. आर. विजयभास्कर ने अपने पद से इस्तीफा देकर TVK की सदस्यता ली थी। इनके अलावा पूर्व मंत्री एम.एस.एम. आनंदन, एस. वलारमथी और कई पूर्व विधायक व जिला स्तरीय पदाधिकारी भी पाला बदल चुके हैं। इससे विपक्ष लगातार कमजोर हो रहा है और सत्तारूढ़ दल बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच गया है।

सूत्रों का दावा है कि बागी विधायकों के अगले जत्थे में एआईएडीएमके के सबसे बड़े और प्रभावशाली क्षेत्रीय क्षत्रप माने जाने वाले एस. पी. वेलुमणि और सी. वी. शनमुगम के करीबी नेता शामिल हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जुलाई के अंत या अगस्त की शुरुआत तक ये दोनों दिग्गज नेता खुद भी टीवीके में शामिल हो सकते हैं।

कैबिनेट मंत्री पद और टिकट का भरोसा
इस्तीफा देने वाले विधायकों को आगामी उपचुनावों में TVK के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ने का मौका दिया जाएगा। वरिष्ठ नेताओं से वादा किया गया है कि दोबारा जीतकर आने पर उन्हें विजय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री का पद सौंपा जाएगा। अन्य नेताओं को संगठन में जिला सचिव या राज्य स्तर पर पदाधिकारी बनाकर समायोजित किया जाएगा।

पलानीस्वामी पर तानाशाही के आरोप
पाला बदलने की तैयारी कर रहे एआईएडीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने आंतरिक कलह को उजागर करते हुए कहा कि यह कदम कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि सालों की हताशा का नतीजा है। उन्होंने आरोप लगाया, “पलानीस्वामी यानी कि EPS अपने आखिरी दिन तक पार्टी के महासचिव बने रहना चाहते हैं। जिला सचिव का पद छिन जाने के बाद भी हम में से कई लोगों ने इंतजार किया, लेकिन संकट को सुलझाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ।” एआईएडीएमके द्वारा वेलुमणि जैसे बड़े नेताओं के वफादार जिला सचिवों को हटाए जाने के कारण पार्टी के भीतर असंतोष की आग और भड़क गई थी।

वाशिंग मशीन से तुलना
इस पूरे दलबदल पर विपक्ष ने तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस खेल के पीछे भारी-भरकम वित्तीय प्रलोभन यानी कि हॉर्स-ट्रेडिंग शामिल है। इसके अलावा डीएमके (DMK) के नेताओं ने तंज कसते हुए इसे पॉलिटिकल वाशिंग मशीन करार दिया है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच का सामना कर रहे पूर्व मंत्रियों जैसे कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सी. विजयभास्कर को बचाने के लिए यह सुरक्षित रास्ता दिया जा रहा है। हालांकि, टीवीके ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि कानूनी जांच अपनी जगह स्वतंत्र रूप से चलती रहेगी

इस बार मुख्यमंत्री विजय की रणनीति अन्य राजनीतिक दलों से काफी अलग है। वे थोक में दलबदल कराने के बजाय चरणों में नेताओं को शामिल कर रहे हैं। साथ ही वे इस बात पर अड़े हैं कि किसी भी विपक्षी विधायक को पार्टी के सिंबल पर रहते हुए शामिल नहीं किया जाएगा। उन्हें पहले इस्तीफा देना होगा और फिर उपचुनावों के जरिए जनता के बीच जाकर नया जनादेश हासिल करना होगा।

चुनाव के बाद होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में कम से कम 5 बड़े एआईएडीएमके चेहरों को जगह मिल सकती है। इस कदम से मुख्यमंत्री विजय न केवल सहयोगियों पर अपनी निर्भरता कम करेंगे, बल्कि राज्य के जमीनी स्तर पर मजबूत विपक्षी चुनावी मशीनरी को अपनी नई नवेली पार्टी में समाहित कर लेंगे

उद्धव कैंप में बगावत की अटकलों के बीच दिल्ली की गुप्त बैठक की तस्वीरें वायरल

मुंबई 

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ और गुप्त मुलाकातों के दौर की यादें ताजा हो गई हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना UBT गुट के जिन 6 लोकसभा सांसदों ने पिछले महीने पाला बदलकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थामा था, अब उनकी लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के साथ हुई एक ‘अघोषित बैठक’ की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आ गई हैं।

इन तस्वीरों के सामने आने के बाद शिवसेना (UBT) को लगे इस सबसे बड़े झटके की इनसाइड स्टोरी और पुख्ता हो गई है, जिसे शिंदे गुट ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नाम दिया था।

क्या है ‘ऑपरेशन टाइगर’ और दिल्ली में क्या हुआ?
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम बेहद गुपचुप तरीके से महीनों से बुना जा रहा था, जिसका क्लाइमेक्स दिल्ली में देखने को मिला। सामने आई तस्वीरें 17 जून की उस सुबह की गवाही दे रही हैं जब इन सांसदों ने दिल्ली में पाला बदला।

    तड़के 6:30 बजे की हलचल: बागी सांसद ओमराजे निंबालकर सुबह करीब 6:30 बजे ही सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के दिल्ली आवास पर पहुंचे। वहां उन्होंने दलबदल के कागजातों पर दस्तखत किए और तुरंत महाराष्ट्र के लिए रवाना हो गए।

    होटल लीला में जमावड़ा: बाकी के 5 सांसद- संजय दिना पाटील, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर और भाऊसाहेब वाकचौरे सुबह करीब 7:30 बजे दिल्ली के आलीशान होटल लीला पहुंचे। इनके साथ ही शिंदे गुट के सांसद श्रीकांत शिंदे और महाराष्ट्र के मंत्री प्रताप सरनाईक भी अलग-अलग रास्तों से वहां पहुंचे ताकि किसी को भनक न लगे।

    अध्यक्ष के गार्डन में हस्ताक्षर: सुबह करीब 9:30 बजे यह पूरा ग्रुप ओम बिरला के घर पहुंचा, जहां बाकी सांसदों ने भी अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए दस्तखत किए। वायरल तस्वीरों में ये पांचों सांसद लोकसभा अध्यक्ष के लॉन में एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

बगावत के पीछे सांसदों ने क्या दी दलील?
इन बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे पत्र में दावा किया कि वे यह कदम उठाने पर इसलिए मजबूर हुए क्योंकि उद्धव ठाकरे अपनी शिवसेना (UBT) का विलय कांग्रेस पार्टी में करने की योजना बना रहे थे, जो सांसदों और शिवसेना की मूल विचारधारा के लिए पूरी तरह अस्वीकार्य था।

सांसदों ने यह भी सुनिश्चित किया कि उनके पास दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य होने से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या बल (9 में से 6 सांसद) मौजूद है।

हमने चौका नहीं, सीधा छक्का मारा है: एकनाथ शिंदे
सांसदों के आधिकारिक रूप से शिंदे गुट में शामिल होने के बाद महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के सफल होने का एलान किया। इन सांसदों को जमीन से जुड़े “धुरंधर और शेर” बताते हुए शिंदे ने 2022 की अपनी ऐतिहासिक बगावत की यादें ताजा कीं।

उन्होंने कहा, “चार साल पहले (जून 2022) जब हमने शिवसेना के भीतर विद्रोह किया था, तब हमारे साथ 40 विधायक थे। उस समय हमने चौका मारा था। लेकिन इस बार, हमने चौका नहीं बल्कि सीधा छक्का (सिक्सर) मारा है। ये छह शेर अब अपनी असली शिवसेना फैमिली में वापस आ गए हैं।”

इस बड़े सियासी उलटफेर ने उद्धव ठाकरे खेमे को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। जहां उद्धव गुट इन सांसदों की वैधता पर सवाल उठा रहा है और कानूनी कार्रवाई की बात कर रहा है, वहीं इन ताजा तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि ‘ऑपरेशन टाइगर’ की स्क्रिप्ट बेहद चालाकी और पुख्ता तैयारी के साथ लिखी गई थी।

दतिया टिकट विवाद पर कैलाश विजयवर्गीय का बड़ा बयान, बोले- आशुतोष तिवारी भारी मतों से जीतेंगे

इंदौर 

दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा द्वारा आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद सामने आई नाराजगी पर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि भाजपा में लोकतांत्रिक व्यवस्था है और कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। उन्होंने विश्वास जताया कि संगठन कार्यकर्ताओं से चर्चा कर सभी मतभेद दूर करेगा और आशुतोष तिवारी भारी मतों से चुनाव जीतेंगे।

विजयवर्गीय ने कहा कि पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी भाजपा के लिए कोई असामान्य स्थिति नहीं है। पार्टी सभी कार्यकर्ताओं से संवाद करेगी और संगठन के निर्णय का सम्मान कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि भाजपा हर फैसला पूरी प्रक्रिया और विचार-विमर्श के बाद लेती है तथा पार्टी का निर्णय सभी के लिए सर्वोपरि होता है।

‘नरोत्तम मिश्रा पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता’
कैलाश विजयवर्गीय ने नरोत्तम मिश्रा की सराहना करते हुए कहा कि वे भाजपा के वरिष्ठ और समर्पित नेता हैं तथा पार्टी के निर्णय का सम्मान करेंगे। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं भी नरोत्तम मिश्रा से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी।

उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों पर हजारों कार्यकर्ता चुनाव लड़ने की तैयारी करते हैं, लेकिन उम्मीदवार का चयन संगठन की निर्धारित प्रक्रिया के तहत होता है। टिकट घोषित होने के बाद उसे बदलने की परंपरा भाजपा में नहीं रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें नहीं लगता कि दतिया का टिकट बदला जाएगा। उनके अनुसार आशुतोष तिवारी पूर्व संगठन मंत्री रह चुके हैं और पार्टी के मजबूत कार्यकर्ता हैं।

कौन हैं नरोत्तम मिश्रा जिनके लिए हुआ बवाल
डबरा क्षेत्र से दतिया तक 33 साल का सियासी सफर रहा है नरोत्तम मिश्रा का। क्षेत्र में उन्हें दादा कहकर संबोधित किया जाता है। 15 अप्रैल 1960 में ग्वालियर में जन्मे नरोत्तम मिश्र के राजनीतिक करियर की शुरुआत भाजपा युवा मोर्चा से हुई थी। 1998 में नरोत्तम मिश्रा जीवाजी यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर ग्वालियर स्टूडेंट यूनियन के सेक्रेटरी बन गए थे। डबरा से पहला चुनाव लड़ा और 1990 में पहली बार विधायक बने। वहीं 1998 और 2003 में इसी सीट से जीत दर्ज की। परिसीमन के बाद डबरा सुरक्षित सीट घोषित हो गई थी। इसलिए नरोत्तम ने दतिया का रुख किया। नरोत्तम 2008 में दतिया से चुने गए और यह सिलसिला 2018 तक जारी रहा। इसके बाद बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान की सरकार में मंत्री रहे।

2023 में हार गए थे चुनाव
2023 में नरोत्तम मिश्रा कांग्रेस के राजेंद्र भारती से महज 7 हजार वोटों के अंतर से हार गए थे। राजेंद्र भारती और नरोत्तम मिश्रा की पुरानी प्रतिद्वंदिता के चलते यह सीट प्रतिष्ठा की सीट बन गई थी। हाल ही में कांग्रेस विधायक रहते हुए राजेंद्र भारती को बैंक के एक मामले में सजा हो गई। इसके बाद उनकी विधायकी खत्म हो गई थी। उसी के कारण दतिया में उपचुनाव हो रहे हैं। नरोत्तम मिश्रा ने कुछ दिन पहले ही नामांकन फार्म खरीद लिया था और नरोत्तम के साथ ही सभी यह मानकर चल रहे थे कि वे ही यहां से उम्मीदवार बनाए जा रहे हैं, लेकिन पार्टी का फैसला कुछ अलग ही रहा। वहां से पूर्व हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। जिसके बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने शुक्रवार शाम से ही हंगामा शुरू कर दिया था।

जीतू पटवारी के भाई के ड्रग्स मामले पर कांग्रेस पर निशाना
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई द्वारा पूर्व में ड्रग्स लेने की बात स्वीकार किए जाने के मुद्दे पर भी कैलाश विजयवर्गीय ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को दूसरों पर टिप्पणी करने से पहले अपने घर की स्थिति भी देखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीतू पटवारी के भाई ने स्वयं स्वीकार किया है कि वह पहले ड्रग्स का सेवन करते थे और अब शराब भी नहीं पीते। विजयवर्गीय ने कहा कि यह उनका निजी मामला है, लेकिन जब स्वयं स्वीकारोक्ति हो चुकी है तो इस पर अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

साइकिल यात्रा पर भी साधा निशाना
जीतू पटवारी की प्रस्तावित साइकिल यात्रा पर टिप्पणी करते हुए विजयवर्गीय ने कांग्रेस पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि इससे पहले राहुल गांधी ने भी लंबी यात्राएं निकाली थीं, लेकिन उससे देश की राजनीति पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस के शीर्ष नेता की यात्रा से कोई विशेष बदलाव नहीं आया, तो जीतू पटवारी की साइकिल यात्रा से भी कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है।

यूसुफ पठान के कदम से बढ़ीं अटकलें, शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद ममता बनर्जी को लग सकता है डबल झटका

नई दिल्ली

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और लोकसभा सांसद यूसुफ पठान ने हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की है। इस मीटिंग के बाद से ही अटकलों का दौर शुरू हो गया है। हालांकि, उन्होंने या भारतीय जनता पार्टी ने इसे लेकर आधिकारिक रूप से बैठक के एजेंडा को लेकर कुछ नहीं कहा है। गुरुवार को उन्होंने नाबन्न में सीएम से मुलाकात की थी।

बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान और बीरभूम से सांसद शताब्दी रॉय ने भी मुख्यमंत्री से हाल के समय में अलग-अलग मुलाकात की है। हालांकि, अब तक यह साफ नहीं हो सका है कि किस मुद्दे को लेकर मुलाकात हुई थी। ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब हाल ही में भाजपा ने राज्यसभा उपचुनाव की तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान किया है।

यूसुफ पठान भी हो चुके हैं बागी
जून में तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने अलग होकर NCPI यानी नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर दिया था। खास बात है कि इस लिस्ट में पठान का नाम भी शामिल था। इनमें सायोनी घोष, काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंदोपाध्याय जैसे बड़े नाम भी थे। इसके अलावा टीएमसी के 60 से ज्यादा विधायक भी बागी होकर अलग गुट बना रहे हैं।

सुपरस्टार प्रसनजीत चटर्जी की भी मुलाकात
बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार प्रसनजीत चटर्जी भी गुरुवार को सीएम अधिकारी से मिलने पहुंचे थे। दोनों के बीच करीब 2 घंटे तक मुलाकात हुई। उनकी इस मुलाकात को लेकर हालांकि नई राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं, क्योंकि यह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हाल में राज्य के दौरे के दौरान अभिनेता के आवास पर जाने के कुछ दिनों बाद हुई।

उन्होंने कहा, ‘राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई।’ उन्होंने कहा, ‘हमने साथ में कॉफी पी और कुछ देर बातचीत की। राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई। बाहर कई तरह की अटकलें हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर सही नहीं हैं।’

अलग बैठने मांगी थी जगह
बीते महीने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंपे पत्र में 20 सदस्यों ने अलग बैठने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। तब दस्तीदार ने कहा था कि अध्यक्ष से मिले इस समूह में 20 सदस्य है और उनकी संख्या, सदन में पार्टी के सदस्यों की कुल संख्या के दो-तिहाई से अधिक है। साथ ही एनसीपीआई में भी विलय की बात कही थी।

इन सांसदों ने की बगावत
लिस्ट में काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायोनी घोष,खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मलिया और पार्थ भौमिक भी हैं।

राज्यसभा में BJP का बड़ा दांव! उपचुनाव के बाद वही रहेंगे तीनों सांसद, बदलेगी सिर्फ पार्टी

 नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने खाली हुई राज्यसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है. इस हादसे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि उपचुनाव के बाद भी संसद के उच्च सदन में भेजने वाले चेहरे वही रहने की उम्मीद है, बस उनकी पार्टी का रंग बदल चुका है। 

BJP इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. दूसरी तरफ, आपसी गुटबाजी और बिखराव से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस के सामने राज्यसभा में अपनी ताकत और कम होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जून में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसदों- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने अपनी ही पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद इन नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। 

बीजेपी में शामिल होते ही उम्मीदवार घोषित
सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक अब ये बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. उन्होंने आज ही बीजेपी जॉइन की और पार्टी ने आज ही उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना दिया है। 

संसदीय नियमों के मुताबिक, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक था, जबकि सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक चलना था. अब इन खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं और यही तीनों नेता एक बार फिर उम्मीदवार होंगे. सिर्फ उनकी पार्टी नई होगी। 

विधानसभा का गणित: बीजेपी का पलड़ा भारी
बंगाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो नंबर गेम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ है. 294 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 208 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव के सिस्टम के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए लगभग 70 वोटों की जरूरत होगी।

बीजेपी के पास विधायकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से 70, 69 और 69 वोट दिला सकती है. इस गणित के कारण बीजेपी की तीनों सीटों पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है। 

दो गुटों में बंटी टीएमसी, चुनौती बड़ी
बीजेपी के इस बड़े ‘खेले’ के सामने टीएमसी बेबस नजर आ रही है. किसी भी विरोधी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत होगी. वैसे तो टीएमसी के टिकट पर जीते विधायकों की कुल संख्या अभी भी करीब 80 है. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे कमजोर कर दिया है. टीएमसी के विधायक अब दो धड़ों में बंट चुके हैं- एक खेमा ममता बनर्जी के साथ है, तो दूसरा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर टीएमसी एकजुट होती, तो वह कम से कम एक सीट के लिए मुकाबला कड़ा कर सकती थी. लेकिन अंदरूनी लड़ाई इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों गुटों के बीच किसी आम सहमति की गुंजाइश खत्म हो गई है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पहले ही रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और अब उनके साथ करीब 65 विधायक हैं। 

‘विश्वासघात’ बनाम ‘नेतृत्व का संकट’
ममता बनर्जी का खेमा इस नुकसान को कम आंकने की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है कि ये उन नेताओं का ‘विश्वासघात’ है जिन्होंने संकट के समय पार्टी को छोड़ दिया. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ये सीटें टीएमसी की थीं, जो पिछले चुनाव में पार्टी की ताकत के दम पर जीती गई थीं. कुछ लोगों ने मुश्किल समय में पार्टी छोड़ दी, बंगाल की जनता सब देख रही है। 

दूसरी तरफ, बागी गुट के नेताओं का कहना है कि ये कोई आम इस्तीफा नहीं है, बल्कि ये पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अविश्वास का नतीजा है. उन्होंने कहा, ‘नेतृत्व ने संगठन के भीतर से मिल रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिसका नतीजा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. असली मुद्दा राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि ये है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का अब मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा क्यों नहीं रहा। 

फिलहाल, दोनों गुटों के बीच टीएमसी के नाम, सिंबल और संगठन पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग के सामने लंबित है. अगर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में बीजेपी इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करती है, तो राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ेगी और टीएमसी का कद घटेगा। 

TMC में बढ़ा सियासी घमासान! नेता प्रतिपक्ष पद, पार्टी दफ्तर के बाद अब बैंक खाते पर भी विवाद

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी का सियासी किला पूरी तरह से ढह गया है. विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बड़े मुश्किल दौर से गुजर रही हैं. ममता के पैरों के नीचे से पूरी राजनीतिक जमीन खिसक चुकी है. विधायक और सांसदों के बाद एक-एक कर सारी चीजें ममता के हाथों से निकलती जा रही हैं। 

साल 1998 में जिस टीएमस की स्थापना ममता बनर्जी ने खुद की थी, आज पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर हो चुकी है. दो महीने में टीएमसी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है. टीएमसी पर नियंत्रण, वफादार नेता और यहां तक कि पार्टी का बैंक खाता भी ममता बनर्जी के हाथों से निकलता दिख रहा है। 

बंगाल की सियासत में टीएमसी की टूट महज महज़ एक राजनीतिक टूट नहीं, बल्कि पूरी पार्टी पर कब्जे की क्रोनोलॉजी के रूप में देखा जा रहा है. बंगाल चुनाव के बाद से एक-एक करके सब कुछ छिन गया है और टीएमसी का कन्ट्रोल भी ममता के हाथ से निकल गया हैं। 

पहले ममता से  ‘नेता प्रतिपक्ष’ का पद छिना
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भले ही टीएमसी को करारी हार के बाद सत्ता से बाहर और विपक्ष में बैठना पड़ा था. टीएमसी के 80 विधायक के के सहारे ममता बनर्जी ने शोभन देव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित करने के लिए स्पीकर को पत्र भेजा था, लेकिन विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने सारे गेम को बिगाड़ दिया। 

टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह ने आरोप लगाया कि इस पत्र पर विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं और यह सब अभिषेक बनर्जी के इशारे पर हुआ. ममता बनर्जी ने तुरंत ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी टीएमसी के 58 से अधिक विधायकों को अपने मिला लिया। 

टीएमसी बागी गुट ने 58 विधायकों के समर्थन का पत्र विधानसभा स्पीकर रथेंद्र बोस को सौंपा, जिसे स्पीकर ने मंजूर कर लिया. नतीजा यह हुआ कि ममता बनर्जी की मर्जी के खिलाफ ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नए नेता प्रतिपक्ष बन गए और उन्हें एलओपी का कमरा अलॉट कर दिया गया. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से नेता प्रतिपक्ष का पद छिन गिया। 

MLA-MPs भी ममता के हाथ से निकले
टीएमसी के 80 में से करीब 64 विधायक फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी के साथ हैं. इसके अलावा टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर लिया है. बंगाल की सियासत में ‘तृणमूल कांग्रेस’ तीन गुटों में बंट गई. एक तरफ ऋतब्रत बनर्जी का बागी गुट है जिसके पास दो-तिहाई से ज्यादा 64 विधायक हैं और जो खुद को ‘असली टीएमसी’ कह रहा है तो ममता बनर्जी के साथ करीब  16 विधायको हैं। 

वहीं, काकोली घोष के अगुवाई में टीएमसी सांसदों ने बगावत किया तो ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका था. सांसदों के बगावत से ममता की सियासत दिल्ली में भी कमजोर पड़ गई है. 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी हो चुके हैं और सिर्फ 8 सांसद ममता के साथ है. इसके अलावा 13 राज्यसभा सांसदों में से 3 सांसदों ने पार्टी और अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। 

पार्टी दफ्तर और अध्यक्ष पद से ममता बेदखल
टीएमसी में केवल विधायक और सांसदों के स्तर पर ही बगावत नहीं हुई, बल्कि संगठन पर बागी गुट ने पूरी तरह कब्जा कर लिया. कोलकाता में बागी नेताओं, पूर्व पार्षदों और जिला अध्यक्षों की एक बड़ी बैठक में ममता बनर्जी को पद से हटा दिया गया. टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बार हुआ कि ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. बागी गुट ने अरूप रॉय को टीएमसी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। 

ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी के पद से सस्पेंड कर दिया गया और उनकी जगह संदीपन शाह और जावेद खान जैसे नेताओं को कमान सौंप दी गई. नए संगठन के दफ्तरों से ममता बनर्जी की तस्वीरें हटा दी गईं. हालांकि, बागी गुट सीधे ममता पर हमला करने से बच रहा है और उन्हें ‘मुख्य सलाहकार’ का पद ऑफर कर रहा है, लेकिन सक्रिय नेतृत्व से उन्हें पूरी तरह बेदखल कर दिया गया है. इतना ही नहीं टीएमसी के दफ्तर पर बागी गुटों का पूरी तरह से कब्जा हो गया है। 

टीएमसी का बैंक खात हुआ फ्रीज 
पार्टी और पद छिनने के बाद ममता बनर्जी गुट को सबसे बड़ा झटका आर्थिक मोर्चे पर लगा. बागी गुट ने टीएमसी के आधिकारिक बैंक खातों में अवैध फंडिंग और पैसों की हेराफेरी की शिकायत केंद्रीय एजेंसियों से कर दी. इसके चलते  प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और बिधाननगर पुलिस की कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस के तीन मुख्य बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिनमें लगभग ₹440 करोड़ जमा थे। 

आरोप मनी लॉन्ड्रिंग का लगया है.जांच में सामने आया कि चुनावों के दौरान चार्टर्ड फ्लाइट्स और एविएशन कंपनियों को ₹160 करोड़ से ज्यादा ट्रांसफर किए गए थे. खाता फ्रीज के कारण ममता बनर्जी के पास पार्टी चलाने और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो सकता है. टीएमसी के के् दोनों गुट अब इन खातों और पैसों पर अपना मालिकाना हक जता रहे हैं. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से टीएमसी का खजाना भी निकलता दिख रहा है। 

 

महाराष्ट्र में सियासी हलचल तेज! शिंदे के दफ्तर पहुंचे शरद पवार, NCP विधायकों संग बैठक से NDA में शामिल होने की अटकलें

 मुंबई

महाराष्ट्र की राजनीति में फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के प्रमुख शरद पवार और उनकी पार्टी के विधायकों के बीच एक बैठक हुई। इस बैठक ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। यह बैठक किसी विपक्षी नेता के दफ्तर में नहीं, बल्कि राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के आधिकारिक चेंबर के भीतर हुई। महाविकास अघाड़ी (MVA) के मुख्य स्तंभ शरद पवार को सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के प्रमुख नेता के केबिन में देख राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। हालांकि बाद में दोनों पक्षों ने इसे महज एक संयोग और शिष्टाचार भेंट बताया।

आपको बता दें कि शरद पवार महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद को सुलझाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में भाग लेने के लिए विधान भवन परिसर पहुंचे थे।

क्यों चुना गया उपमुख्यमंत्री शिंदे का दफ्तर?
विपक्ष के दिग्गज नेता का सत्ता पक्ष के चेंबर में बैठक करना ही इस पूरे विवाद और चर्चा का केंद्र बना। इस पर सफाई देते हुए एनसीपी (SP) के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल ने कहा कि इस जगह का चुनाव विशुद्ध रूप से व्यावहारिक कारणों से किया गया था और इसका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए।

जयंत पाटिल ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, “पार्टी के विधायक विधान भवन परिसर से जाने से पहले शरद पवार साहब से मिलना चाहते थे। पवार साहब की उम्र को देखते हुए उस कमरे तक वापस पैदल जाना उनके लिए काफी कठिन होता जहां विपक्षी दलों के अधिकांश विधायक बैठते हैं। चूंकि उपमुख्यमंत्री शिंदे का केबिन निकास द्वार के बिल्कुल पास स्थित है, इसलिए हमने सोचा कि पवार साहब के लिए लंबी दूरी तक पैदल चलने से बचने के लिए यह केबिन सबसे सुविधाजनक रहेगा।”

पाटिल ने यह भी साफ किया कि जब शरद पवार वहां पहुंचे तब एकनाथ शिंदे अपने दफ्तर में मौजूद नहीं थे। पाटिल ने कहा, “मैंने ही पवार साहब को हमारे विधायकों से मिलने के लिए वहां बैठने का सुझाव दिया था। जब शिंदे को पवार साहब की मौजूदगी का पता चला तो वे भी वहां आए और सम्मानपूर्वक 10 मिनट तक उनसे मुलाकात की।”

संजय राउत ने कहा- गद्दार नेताओं को इज्जत दे रहे…

NCP फाउंडर शरद पवार मीटिंग के लिए विधान भवन गए थे. उस समय उन्होंने डिप्टी चीफ मिनिस्टर एकनाथ शिंदे के ऑफिस में अपनी पार्टी की मीटिंग की थी. एकनाथ शिंदे भी कैबिनेट मीटिंग छोड़कर शरद पवार के स्वागत के लिए कैबिन में आ गए थे. अब इस बारे में बोलते हुए ठाकरे ग्रुप के MP संजय राउत ने कड़ी नाराजगी जताई. संजय राउत ने कहा, शरद पवार गद्दार नेताओं को इज्जत दे रहे हैं। 

संजय राउत ने कहा कि शरद पवार एक बड़े नेता हैं. लेकिन एकनाथ शिंदे, जिन्होंने महाराष्ट्र को करप्शन और धोखे के कीड़े से इंफेक्टेड कर दिया है, उनके कैबिन में मीटिंग करना ठीक नहीं है. क्या पूरा विधान भवन खाली नहीं था? विधान भवन एरिया के सामने एक राष्ट्रवादी भवन और एक शिवसेना भवन है. इससे राष्ट्रवादी शरद चंद्र पवार पार्टी की क्रेडिबिलिटी कम होती है। 

संजय राउत ने कहा, अगर हम अजित पवार के हॉल में जाकर मीटिंग करते, तो इसका मतलब होता कि हम MVA के खिलाफ गए. इसलिए, MVA के घटक दलों को नियमों का पालन करना चाहिए। 

शिंदे के केबिन में हुई बैठक से क्यों मची हलचल?

    महाराष्ट्र विधान भवन में शरद पवार महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर गठित उच्चस्तरीय समिति की बैठक में शामिल होने पहुंचे थे. समिति की बैठक खत्म होने के बाद वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यालय पहुंचे. यहीं एनसीपी (एसपी) के विधायक भी उनसे मिलने पहुंचे और बैठक हुई. इसी घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की अटकलों को जन्म दे दिया. इसके बाद एकनाथ शिंदे ने शरद पवार का शॉल और गुलदस्ता देकर स्वागत किया. हालांकि दोनों नेताओं के बीच क्या बातचीत हुई, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई। 

    एनसीपी (एसपी) नेताओं ने बाद में साफ किया कि पहले पार्टी विधायकों की बैठक हुई और उसके बाद शिंदे वहां पहुंचे. उनका कहना था कि बैठक के पीछे कोई राजनीतिक मकसद नहीं था. जयंत पाटिल ने बताया कि शरद पवार को विधानसभा परिसर के भीतर लंबी दूरी तक चलने में दिक्कत होती है. इसलिए विधायकों से मिलने के लिए शिंदे का केबिन सबसे सुविधाजनक स्थान था। 
    उन्होंने कहा, ‘पवार साहेब के लिए विपक्ष के विधायकों के कमरे तक वापस पैदल जाना मुश्किल होता. इसलिए हमने सोचा कि निकास द्वार के पास स्थित एकनाथ शिंदे का केबिन सुविधाजनक रहेगा, जिससे उन्हें ज्यादा चलना नहीं पड़े। 

    जयंत पाटिल ने आगे स्पष्ट किया, ‘जब पवार साहेब वहां पहुंचे, तब एकनाथ शिंदे अपने कार्यालय में मौजूद नहीं थे. मैंने पवार साहेब से कहा कि वे यहीं बैठकर हमारे विधायकों से मुलाकात कर लें. बाद में जब शिंदे को पता चला कि पवार साहेब आए हैं, तो वह करीब दस मिनट के लिए उनसे मिलने पहुंचे.’ बैठक की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं। 

शिंदे खेमे ने बताया शिष्टाचार मुलाकात
    एकनाथ शिंदे खेमे ने भी किसी राजनीतिक संदेश से इनकार किया. महाराष्ट्र सरकार में मंत्री उदय सामंत ने कहा कि वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करना राज्य की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है. उन्होंने कहा, ‘शरद पवार देश के वरिष्ठ नेता हैं. यदि वे हमारे नेता एकनाथ शिंदे के कार्यालय आते हैं तो उनका सम्मान करना और स्वागत करना महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है। 
    उपमुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से भी इस मुलाकात को महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद समिति की बैठक के बाद हुई ‘शिष्टाचार मुलाकात’ बताया गया। 

एनडीए में जाने की अटकलों पर एनसीपी (SP) का जवाब
बैठक के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी कि क्या शरद पवार किसी नए राजनीतिक समीकरण की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि एनसीपी (एसपी) ने इन सभी अटकलों को पूरी तरह खारिज कर दिया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने कहा, ‘शरद पवार साहेब महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर बनी समिति की बैठक में शामिल होने आए थे. इसके बाद हमने अपने विधायकों, सांसदों और नगरसेवकों के साथ बैठक की. विधानसभा सत्र के दौरान पवार साहेब यहां मौजूद हैं, इसलिए उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की. एनडीए में शामिल होने या किसी अन्य पार्टी में विलय की जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे पूरी तरह गलत हैं। 

उन्होंने कहा कि इस बैठक का किसी राजनीतिक बदलाव से कोई लेना-देना नहीं है और पार्टी महा विकास अघाड़ी का हिस्सा बनी हुई है। 

शिंदे गुट की क्या थी प्रतिक्रिया
इस मुलाकात के बाद उपमुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में इसे केवल एक शिष्टाचार भेंट बताया गया। समिति की बैठक खत्म होने के बाद जब शरद पवार वहां पहुंचे तो एकनाथ शिंदे ने शॉल और बुके देकर वरिष्ठ नेता का स्वागत किया। महाराष्ट्र के मंत्री उदय सामंत ने कहा, “शरद पवार देश के बेहद वरिष्ठ नेता हैं। यदि वे हमारे नेता एकनाथ शिंदे के कार्यालय में आते हैं तो उनका सम्मान और स्वागत करना महाराष्ट्र की समृद्ध राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है। इसमें कुछ भी गलत या असामान्य नहीं है।”

एनडीए में शामिल होने की अटकलें खारिज
इस बैठक की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या विपक्षी दल सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ किसी नए राजनीतिक समीकरण या समझौते की संभावना तलाश रहा है। शरद पवार की एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने इन तमाम अफवाहों और दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने किसी भी तरह से एनडीए (NDA) में शामिल होने या किसी अन्य दल में विलय की खबरों को पूरी तरह से झूठ बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा, “पवार साहब यहां विधानसभा सत्र के दौरान आए थे, इसलिए उन्होंने हमारे विधायकों, सांसदों और पार्षदों के साथ बातचीत की। एनडीए में जाने या पार्टी विलय की अटकलें पूरी तरह से निराधार और असत्य हैं।”

TMC में बड़ा सियासी मोड़! पार्टी गई, लेकिन खजाने का कंट्रोल फिर ममता बनर्जी के हाथ

कोलकाता
कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के तीन बैंक खातों से सीमित लेनदेन का आदेश दिया है. साथ ही इन लेनदेनों की निगरानी के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया गया है. खास बात यह है कि बैंक खातों में लेन-देन का ये अधिकार तृणमूल कांग्रेस के ममता गुट को मिला है. TMC पर कब्जे की लड़ाई लड़ रही ममता बनर्जी के लिए ये बड़ी जीत मानी जा रही है. कोर्ट के इस फैसले से पूर्व सीएम ममता बनर्जी को टीएमसी के खाते में मौजूद करोड़ों रुपयों को अदालत की निगरानी में खर्च करने का अधिकार मिल जाएगा। 

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुब्रता तालुकदार को विशेष अधिकारी नियुक्त किया है. जस्टिस सुब्रता तालुकदार कोर्ट के आदेशानुसार केवल तृणमूल कांग्रेस के दो पदाधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित चेक के आधार पर ही खर्च को अधिकृत करेंगे। 

गुरुवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि यह अंतरिम उपाय 30 सितंबर तक प्रभावी रहेगा।

कलकत्ता हाई कोर्ट के अनुसार टीएमसी पार्टी को चलाने में होने वाले खर्चे को पूरा करने के लिए इस अकाउंट से पैसे की निकासी खर्च कर सकेगी. हाई कोर्ट के अनुसार विशेष अधिकारी किसी और तरह के खर्च की इजाजत नहीं देंगे। 

TMC के बैंक अकाउंट्स में सीमित लेन-देन की इजाजत देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि अकाउंट्स फ्रीज़ करने का आदेश देने के लिए पुलिस ने जो सबूत दिखाए अदालत उससे संतुष्ट नहीं था। 

हाई कोर्ट ने कहा कि इस अंतरिम चरण में उसे ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जो FIR दर्ज होने के तुरंत बाद अकाउंट्स को फ्रीज़ करने के पुलिस के फ़ैसले को सही ठहरा सके। 

बेंच ने कहा, “FIR 18 जून को दर्ज की गई थी और 19 जून को जल्दबाज़ी में अकाउंट्स फ्रीज़ कर दिए गए। इस चरण में, कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि इतने अचानक उठाए गए कदमों का आधार क्या था। 

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस अंतरिम व्यवस्था का मतलब किसी गुट को “असली” तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता देना नहीं होगा; यह मामला अभी भी चुनाव आयोग के पास लंबित है। 

 एक रिपोर्ट के अनुसार TMC की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि डेबिट फ्रीज ने एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के कामकाज को लगभग ठप कर दिया और उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया। 

उन्होंने कहा कि शिकायत अस्पष्ट थी, उसमें खातों को अपराध से हुई कमाई से जोड़ने वाले कोई ठोस आरोप नहीं थे, और उन्होंने बताया कि पार्टी का सारा फंड चुनाव आयोग के नियमों और इनकम टैक्स एक्ट के तहत रेगुलेट होता है। 

चुनाव हारने के बाद ममता के हाथ से पार्टी गई
बता दें कि 4 मई को चुनाव नतीजे आने के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी में टूट हुई है. पार्टी के 20 सांसदों ने TMC से अलग होकर NCPI में अपना विलय कर लिया है. कोलकाता में TMC के 60 से ज्यादा विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग हो गए हैं. ऋतब्रत बनर्जी ही इस TMC का नेतृत्व कोलकाता में कर रहे हैं. ऋतब्रत बनर्जी गुट के TMC ने पार्टी के मुख्यालय पर भी अपना हक जता लिया है. ऐसे में पार्टी खाते से खर्च करने का अधिकार ममता बनर्जी को मिलता बड़ी बात है। 
 

 

भाजपा में बदले सियासी समीकरण, निखिल सोनी की नियुक्ति से कई नेताओं के बदले राजनीतिक समीकरण

इंदौर 

 इंदौर भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के नगर अध्यक्ष पद पर निखिल सोनी की नियुक्ति ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जानिए कैसे आखिरी समय में बदले समीकरण और क्यों पीछे रह गए दूसरे दावेदार।

भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा में इंदौर नगर अध्यक्ष पद पर निखिल सोनी की नियुक्ति से गुरुवार को भी सभी हैरान हैं। इस घोषणा ने सबको चौंका दिया था, क्योंकि विजय बिंजवा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। उनका नाम पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय ने ही दिया था, लेकिन आखिरी समय पर नगर भाजपा अध्यक्ष की सलाह पर यू टर्न ले लिया गया। उन्होंने एक नंबर विधानसभा के ही युवा व अच्छी टीम वाले निखिल सोनी के नाम पर सहमति दे दी।

पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पवन पाटीदार ने तीन जिलों के अध्यक्षों की घोषणा की है, जिसमें इंदौर नगर में निखिल सोनी को नियुक्ति से सभी हैरान हैं। जैसे ही सोनी का नाम सामने आया वैसे ही मोर्चा के कई नेताओं की जमीन खिसक गई, क्योंकि वे सोनी को अध्यक्ष का गंभीर दावेदार ही नहीं मान रहे थे। उन्हें लग रहा था कि ऐसे ही पैनल में नाम दिया गया होगा। सबसे ज्यादा झटका विजय बिंजवा को लगा जो खुद को बना हुआ मान रहे थे, क्योंकि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने उनका नाम प्राथमिकता से दिया था और पैनल में भी सबसे ऊपर था।

पर्दे के पीछे की कहानी
विजय का नाम सामने आने पर विरोध शुरू हो गया था। ये बात मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और उनके बेटे आकाश के साथ नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा तक भी पहुंची। आखिर में आकाश और मिश्रा के बीच में चर्चा हुई। इधर, क्षेत्रीय संतुलन और सबसे ज्यादा पिछड़ा वर्ग की आबादी एक नंबर में होने की वजह से मोर्चे का अध्यक्ष क्षेत्र से ही बनाना था जिसके चलते आकाश ने निखिल सोनी के नाम पर सहमति दे दी। मंजूरी मिलते ही मिश्रा ने सोनी के नाम को आगे बढ़ा दिया, जिसके बाद बिंजवा के बजाए सोनी को मौका दे दिया गया।

बताते हैं कि युवा होने के साथ सोनी के पास कार्यकर्ताओं की अच्छी टीम है। मजेदार बात ये है कि सोनी का नाम पैनल में आठवें नंबर पर था तो एक नंबर विधानसभा से संतोष यादव भी दावेदार थे।

रखी गई थी नजर
हाल ही में नगर भाजपा के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन रखा गया था जिसमें सभी नेताओं को भीड़ जुटाने के निर्देश दिए थे। खासतौर पर उन्हें जो कि मोर्चा व प्रकोष्ठ में अध्यक्ष व संयोजक पद के दावेदार हंै। बताते हैं कि बारीकी से सभी दावेदारों की गतिविधियों पर नजर रखी गई। बिंजवा को बनाने से पहले भीड़ लाने के लिए कहा था ताकि परीक्षा हो जाए, लेकिन वे संख्या लेकर नहीं पहुंचे थे जबकि कार्यक्रम में पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पाटीदार मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे।

चारों खाने चित चौधरी
पिछड़ा वर्ग मोर्चा में नगर अध्यक्ष बनने के लिए निलेश चौधरी पूरी ताकत से जुटे हुए थे जिनका नाम विधायक रहे जीतू जिराती ने रखा था। उन्हें आशा थी कि नियुक्ति हो जाएगी, क्योंकि नगर भाजपा में पदाधिकारी बनने से चूक गए थे। इस बार आकाश विजयवर्गीय के अड़ने की वजह से मोर्चा की कमान एक नंबर को सौंपनी पड़ गई जिसके चलते चौधरी चारों खाने चित हो गए।

18-19 जुलाई को BJP की बड़ी बैठक! वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों के साथ संगठनात्मक रणनीति पर होगा मंथन

भोपाल
 मध्यप्रदेश की राजनीति में से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है। 18 और 19 जुलाई को भाजपा मध्यप्रदेश कार्यसमिति की बड़ी बैठक होगी। सूत्रों के मुताबिक भाजपा संगठन की यह दो दिवसीय बैठक निवाड़ी के ओरछा में आयोजित होगी। बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं समेत पदाधिकारी शामिल होंगे। इस दौरान संगठन को मजबूत बनाने, बूथ स्तर पर काम तेज करने, संगठन के विस्तार समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी।

जानकारी के अनुसार, 18 और 19 जुलाई को ओरछा में भाजपा की मध्यप्रदेश प्रदेश कार्यसमिति की बैठक आयोजित होगी। बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं समेत प्रदेशभर के पदाधिकारी और कार्यसमिति सदस्य शामिल होंगे। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में बैठक आयोजित होगी। बैठक में पार्टी संगठन को मजबूत बनाने, बूथ स्तर पर काम तेज करने, संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

इसके अलावा आने वाले संगठनात्मक कार्यक्रमों और राजनीतिक रणनीति पर भी मंथन किया जाएगा। बैठक में 106 प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, 41 स्थायी आमंत्रित सदस्य, प्रदेश पदाधिकारी, संभाग और जिला प्रभारी, विभिन्न मोर्चों के प्रदेश अध्यक्ष तथा प्रकोष्ठों के संयोजक भाग लेंगे।

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu