PM मोदी पर बयान को लेकर घिरे अजय राय, यूपी कांग्रेस चीफ ने दी सफाई

महोबा/वाराणसी
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने महोबा दौरे पर एक गैंगरेप पीड़िता से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद जब वह वापस जाने के लिए अपनी कार में सवार हो रहे थे, तभी अपने एक कार्यकर्ता से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अभद्र और अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया. यह पूरी बातचीत कैमरे में रिकॉर्ड हो गई और गाली देते हुए अजय राय का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. हालांकि, अजय राय का कहना है कि ये वीडियो फेक और एडिटेड है। 

भाजपा नेताओं का कांग्रेस पर तीखा हमला
वीडियो वायरल होते ही भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने अजय राय और कांग्रेस को आड़े हाथों लिया. बीजेपी नेता अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा कि कुछ दिन पहले जब अजय राय अस्वस्थ थे, तब प्रधानमंत्री मोदी ने उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की थी, लेकिन आज वह अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करते कैमरे में कैद हुए. यही कांग्रेस का स्तर है, जो शिष्टाचार का जवाब अभद्रता से देती है. बीजेपी विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने भी इसे लगातार हार की कुंठा बताया। 

अजय राय ने वीडियो को बताया एआई जेनरेटेड
इस पूरे सियासी बवाल और वायरल वीडियो पर जब आज तक की टीम ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय से बात की, तो उन्होंने अपनी सफाई पेश की. अजय राय ने बताया कि उनके वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है और इसे एआई (AI) की मदद से जेनरेट किया गया है. इसके बाद उन्होंने कॉल काट दिया। 

अजय राय के पुराने विवादित बयान
पीएम और गृहमंत्री पर टिप्पणी: राहुल गांधी के बयान का समर्थन करते हुए मोदी-शाह को गद्दार करार दिया था। 

लटके-झटके वाला बयान: अमेठी दौरे के समय केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पर अमर्यादित टिप्पणी की थी। 

जमीन में गाड़ने की धमकी: 2022 के चुनाव में मोदी-योगी को जमीन में गाड़ने की धमकी दी थी, जिसपर राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था। 

राफेल पर तंज: खिलौने वाले विमान पर नींबू-मिर्च बांधकर प्रदर्शन किया था। 

संसद में दो-तिहाई बहुमत की तैयारी में BJP, स्टालिन को NDA में लाने की चर्चा तेज

चेन्नई

तमिलनाडु की सत्ता से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) बाहर हो चुकी है और टीवीके प्रमुख थलपति विजय मुख्यमंत्री हैं. सत्ता के बदलने के साथ ही चेन्नई से लेकर दिल्ली तक की सियासत भी बदलती दिख रही है. डीएमके का साथ छोड़कर कांग्रेस ने विजय सरकार में शामिल हो गई है तो बीजेपी की कोशिश डीएमके के साथ हाथ मिलाने की है.  इस दिशा में सियासी एक्सरसाइज भी शुरू हो गई है। 

दक्षिण के तमिलनाडु की सियासत बदलते ही कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़कर विजय के साथ हो गई. कांग्रेस के इस स्टैंड से एमके स्टालिन को गहरा झटका लगा है, जिसके बाद डीएमके ने विपक्षी इंडिया ब्लॉक से खुद को अलग कर लिया. अब मौके की नजाकत को देखते हुए बीजेपी ने डीएमके को एनडीए का हिस्सा बनाने की कवायद में जुट गई है। 

सूत्रों के मुताबिक एनडीए की नजर डीएमके के 22 लोकसभा सांसदों और राज्यसभा के 8 सांसदों पर है. बताया जा रहा है कि मुद्दों के आधार पर डीएमके से बाहर से समर्थन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, क्योंकि एनडीए संसद में दो-तिहाई बहुमत की तलाश में है। 

डीएमके को एनडीए में लाने का प्लान
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद ही  डीएमके
ने कांग्रेस से रिश्ता तोड़ लिया है.  डीएमके ने बकायदा लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने के लिए स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी लिखा है. हालांकि, सनातन धर्म के मुद्दे पर डीएमके के सियासी रुख को देखते हुए औपचारिक गठबंधन की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन डीएमके का समर्थन हासिल करने के लिए एक अलग प्लानिंग की जा रही है। 

मोदी सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस की तरह ही डीएमके भी मुद्दों के आधार पर एनडीए को समर्थन दे सकती है. सूत्रों के मुताबिक, डीएमके में टूट से कोई बड़ा फायदा नहीं होगा, इसलिए सभी 22 सांसदों का समर्थन ज्यादा अहम माना जा रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी के समय डीएमके एनडीए का हिस्सा रह चुकी है। 

दो-तिहाई बहुमत का नंबर जुटाने का दांव
बीजेपी संसद में ‘दो-तिहाई बहुमत’ का जादुई आंकड़ा जुटाने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी और चौंकाने वाले मिशन पर काम कर रही है. इस मिशन के तह तमिलनाडु की सत्ता से बाहर होने वाली डीएमके को एनडीए के पाले में लाने की है. डीएमके के 22 लोकसभा सांसद और 8 राज्यसभा सांसद है, जिनका समर्थन अगर बीजेपी हासिल कर लेती है तो संसद में दो-तिहाई वाले बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच सकती है। 

हाल ही में संसद में परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान यह साफ हो गया कि साधारण बहुमत होने के बावजूद भाजपा बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से थोड़ी दूर रह गई थी। 

वन नेशन-वन इलेक्शन, परिसीमन और न्यायिक सुधार जैसे बड़े ऐतिहासिक फैसलों को बिना किसी संवैधानिक अड़चन के पास कराने के लिए सरकार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए। 

एनडीए बहुमत में है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत (360+ सीटें) से दूर है. ऐसे में सांसदों के साथ आने से दो-तिहाई का आंकड़ा बेहद आसान हो जाएगा. ऐसे में बीजेपी की कोशिश है कि डीएमके को किसी न किसी तरह साथ लाया जाए, उससे लिए सीधे हाथ मिलाने के बजाय पर्दे के पीछे से समर्थन हासिल करने की है। 

ममता बनर्जी को बड़ा झटका, भतीजे के गढ़ में TMC का सूपड़ा साफ

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल के फलता को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था। यह लोकसभा सांसद और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के संसदीय क्षेत्र में भी आता है। इसकी बड़ी वजह यहां पर जहांगीर खान के प्रभाव को माना जाता था। अब नौबत यह है कि खुद जहांगीर अंत समय में चुनावी मैदान छोड़कर चले गए और नतीजा यह हुआ कि टीएमसी पूर्व सीएम बनर्जी के भवानीपुर के बाद एक और गढ़ गंवाने की कगार पर है।

कुछ दिनों में बदले हालात
29 अप्रैल को जब पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण का मतदान होना था, तो उसमें फलता भी शामिल था। उस दौरान क्षेत्र के हर हिस्से में टीएमसी के झंडे और पार्टी कार्यकर्ता मौजूद थे। अब कुछ ही दिनों में स्थिति बदल गई है और अब जगह दूसरे दलों के झंडों से लदी हुई है। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी एक झंडा भी नजर नहीं आ रहा था।

वहीं, इस सीट पर बाहुबली छवि वाले जहांगीर खान भी चुनाव से हटने के बाद क्षेत्र से नदारद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वह गुरुवार को हुए मतदान में भी शामिल नहीं हुए। अखबार से बातचीत में स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें आखिरी बार मंगलवार को देखा गया था। खास बात है कि मंगलवार को ही खान ने चुनाव से हटने का फैसला किया था।

अभिषेक बनर्जी का चलता था सिक्का
जहांगीर खान को डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से उन्हें 89 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। अब जब खान ने चुनाव से नाम वापस लिया, तो टीएमसी ने इससे किनारा किया और खान का निजी फैसला बताया।

बंपर वोटिंग हुई
गुरुवार को सीट पर पुनर्मतदान शांतिपूर्ण तरीके से हुआ जहां 86 फीसदी से अधिक लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। इस दौरान केंद्रीय बलों की भारी तैनाती रही। यह पुनर्मतदान 29 अप्रैल के चुनाव से जुड़े विवाद के कारण हुआ, जब कई मतदान केंद्रों से शिकायतें सामने आईं कि ईवीएम पर इत्र जैसे पदार्थ और चिपकने वाली टेप लगाई गई थीं।

भाजपा और लेफ्ट में मुकाबला
खान के हटने के बाद इस सीट पर टीएमसी के पास दावेदारी ही नहीं बची। ऐसे में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के देबांग्शु पांडा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शंभूनाथ कुर्मी के बीच माना जा रहा है। सीट पर कांग्रेस की तरफ से अब्दुर रज्जाक मोल्ला चुनाव लड़ रहे हैं।

भवानीपुर गंवाया
4 मई को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में ममता बनर्जी के भवानीपुर सीट से हारने की खबर आई। खास बात है कि उन्हें अब बंगाल के मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने ही 15 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इससे पहले वह 2021 के चुनाव में अधिकारी के सामने नंदीग्राम सीट से भी हार का सामना कर चुकी हैं।

बकरीद से पहले हुमायूं कबीर का बड़ा बयान, बोले- हर हाल में होगी कुर्बानी

मुर्शिदाबाद
 बकरीद से पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है. आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख और विधायक हुमायूं कबीर के बयान ने राज्य का राजनीतिक माहौल गरमा दिया है. हुमायूं कबीर ने गाय की कुर्बानी को लेकर साफ शब्दों में कहा है कि कुर्बानी की परंपरा 1400 साल पुरानी है और इसे कोई नहीं रोक सकता. उन्होंने कहा कि जब तक दुनिया रहेगी, तब तक कुर्बानी भी होती रहेगी। 

बातचीत में हुमायूं कबीर ने बंगाल सरकार और सत्ता पक्ष पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि सरकार कभी कुछ बोलती है और अगले दिन कुछ और कहती है. उनके मुताबिक, सरकार मुसलमानों को गाय खाने से रोकने की बात कर सकती है, क्योंकि सरकार के पास सत्ता है, लेकिन कुर्बानी तो होगा ही। 

पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 के तहत राज्य सरकार की ओर से जनता के लिए जारी नोटिस पर आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख हुमायूं कबीर ने कहा- ‘सरकार मुसलमानों से बीफ न खाने का नियम बना सकती है, लेकिन धार्मिक कुर्बानी (क़ुर्बानी) जारी रहेगी. हम किसी भी आपत्ति को नहीं मानेंगे. यह एक ऐसी परंपरा है जो 1400 सालों से चली आ रही है और जब तक यह दुनिया रहेगी, तब तक जारी रहेगी.’
‘सुवेंदु अधिकारी सरकार चलाएं, धार्मिक परंपराओं में दखल ना दें। 

AJUP चीफ ने कहा कि अगर कोई कुर्बानी रोकने की कोशिश भी करेगा तो लोग उसकी बात नहीं सुनेंगे. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की सरकार बनी है, लोगों ने उन्हें वोट देकर सत्ता सौंपी है, इसलिए सरकार चलाना उनका अधिकार है. लेकिन धार्मिक परंपराओं में दखल नहीं दिया जा सकता। 

‘इस्लाम में गाय, बकरी, ऊंट की कुर्बानी जायज
हुमायूं कबीर ने आगे कहा कि गाय, बकरी, ऊंट और दुम्बा समेत सभी जानवर, जिनकी कुर्बानी इस्लाम में जायज मानी गई है, उनकी कुर्बानी होती रहेगी. उन्होंने दावा किया कि इसे रोकने की ताकत किसी के पास नहीं है। 

हुमायूं कबीर का नाम इससे पहले भी विवादों में आ चुका है. दिसंबर 2025 में उन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर नई मस्जिद बनाने का ऐलान किया था. उस समय उनकी ही पार्टी TMC ने इस बयान पर सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें पार्टी से सस्पेंड कर दिया था। 

इसके बाद हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी बनाई. नई पार्टी बनाने के बाद उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया और दो सीटों पर जीत दर्ज की. हुमायूं कबीर ने रेजीनगर और नवदा सीट से चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत हासिल की. अब बकरीद से पहले दिया गया उनका नया बयान बंगाल की राजनीति में एक और बड़े विवाद की वजह बन सकता है। 

फुरफुरा शरीफ के वरिष्ठ पीरजादा बोले- गोहत्या रोकने के लिए कानून बने
वहीं पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 के तहत राज्य सरकार की ओर से जारी सार्वजनिक नोटिस पर फुरफुरा शरीफ के वरिष्ठ पीरजादा तोहा सिद्दीकी का कुछ और ही कहना है. उन्होंने कहा- ‘सभी को गोहत्या के खिलाफ बने कानून का पालन करना चाहिए. कुर्बानी के दौरान गायों का वध नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि, कानून हर जगह एक जैसा होना चाहिए. जहां एक ओर कुर्बानी के दौरान गोहत्या प्रतिबंधित है, वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में गायों का वध किया जा रहा है और उनके मांस का बड़ी मात्रा में विदेशों में निर्यात किया जा रहा है. बंगाल को छोड़कर अन्य राज्यों में भी गोहत्या हो रही है. इसे भी रोका जाना चाहिए. क्योंकि देश में कानून एक ही है; यह बंगाल या पूरे भारत में अलग नहीं है. हमने बीफ़ खाना छोड़ दिया है. अगर हम बीफ़ नहीं खाएंगे तो क्या हम मर जाएंगे?’

हम केवल 1950 का कानून लागू कर रहे हैं: मंत्री अग्निमित्रा पॉल
हुमायूं कबीर के बयान पर पश्चिम बंगाल की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा- ‘हमारे राज्य में 1950 से नियम है. हम यह नहीं कह रहे हैं कि बीफ बिजनेस को बंद करना है. 1950 के नियम में सख्ती से लिखा है कि 14 साल से कम उम्र के मवेशी को काटा नहीं जा सकता है. जो मवेशी बिल्कुल ही अस्वस्थ है या अपाहिज है या ज्यादा उम्र का है उसको काटने के लिए संबंधित अधिकारी से सर्टिफिकेट लेना होगा. ये अलग बात है कि 1950 के कानून को यहां सख्ती से लागू नहीं किया गया था, क्योंकि पिछली सरकार वोटबैंक के चक्कर में ढिलाई बरते हुए थे. इस सरकार में ऐसा नहीं चलेगा, क्योंकि हम गाय को माता मानते हैं। 

BJP की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का जल्द ऐलान, MP के कई दिग्गज नेताओं के नाम चर्चा में

भोपाल 

 भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जल्द ही घोषणा कर सकती है। इस नई टीम मध्य प्रदेश नेताओं का खासा दबदबा होने की संभावना है।  इस बार सबसे ज्यादा चर्चा मध्य प्रदेश के नेताओं को लेकर हो रही है, जिनकी संगठन में भूमिका पहले की तुलना में और मजबूत होने की जानकारी निकलकर सामने आई है। इसे लेकर मध्य प्रदेश से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज हो गई है। जल्द ही नई राष्ट्रीय टीम को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

सबसे ज्यादा चर्चा संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति को लेकर है। इन दोनों शीर्ष इकाइयों में जगह मिलना किसी भी नेता के लिए बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक कैलाश विजयवर्गीय और एक अन्य नेता का नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। अगर इनमें से किसी को इन समितियों में शामिल किया जाता है, तो यह मध्यप्रदेश के राजनीतिक प्रभाव को राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करेगा।

कैबिनेट मंत्री प्रहलाद पटेल को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रमुख पद मिलने की चर्चा है। वहीं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद के लिए नरोत्तम मिश्रा और राकेश सिंह को संभावित दावेदार माना जा रहा है। इसके साथ ही राष्ट्रीय महासचिव पद पर विष्णुदत्त शर्मा और कविता पाटीदार के नामों पर गंभीरता से विचार चल रहा है। इस बार पार्टी महिला नेतृत्व को भी बढ़ावा देने के मूड में दिख रही है, ऐसे में मध्यप्रदेश से किसी महिला नेता को महासचिव बनाए जाने की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है।

राष्ट्रीय मंत्री पद के लिए अरविंद भदौरिया और गौरव तिवारी के नाम चर्चा में हैं, जबकि राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर आशीष अग्रवाल और जीतू जिराती को लेकर अटकलें तेज हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में रामेश्वर शर्मा और भक्ति शर्मा के नामों पर भी विचार किया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि इस बार संगठन में बड़े स्तर पर संतुलन साधने की कोशिश हो रही है, जिसमें क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को खास महत्व दिया जाएगा। इसके साथ ही मध्यप्रदेश भाजपा को नया प्रभारी और सह-प्रभारी मिलने की संभावना भी जताई जा रही है। चर्चा है कि गुजरात से किसी वरिष्ठ नेता को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। कुल मिलाकर, अगर मध्यप्रदेश को अपेक्षित प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर साफ तौर पर दिखाई दे सकता है।

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद के लिए कई बड़े नाम चर्चा में
भाजपा की नई टीम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा और राकेश सिंह को इस पद के संभावित दावेदारों में माना जा रहा है। दोनों नेताओं का संगठन और चुनावी राजनीति में लंबा अनुभव रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए अनुभवी और संगठनात्मक पकड़ रखने वाले नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है। ऐसे में इन नामों पर गंभीरता से विचार होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

महासचिव पद पर महिला नेतृत्व को मिल सकता है महत्व
राष्ट्रीय महासचिव पद को लेकर विष्णुदत्त शर्मा और कविता पाटीदार के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं। भाजपा इस बार महिला नेतृत्व को संगठन में अधिक महत्व देने के संकेत भी देती दिखाई दे रही है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश से किसी महिला नेता को राष्ट्रीय स्तर पर अहम जिम्मेदारी मिलने की संभावना मजबूत मानी जा रही है। संगठन के भीतर महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति को आगामी चुनावी समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो यह भाजपा के संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।

राष्ट्रीय मंत्री और प्रवक्ता पदों के लिए भी मंथन जारी
राष्ट्रीय मंत्री पद के लिए अरविंद भदौरिया और गौरव तिवारी के नामों पर चर्चा चल रही है। वहीं पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर आशीष अग्रवाल और जीतू जिराती को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। भाजपा मीडिया और जनसंपर्क रणनीति को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है, ऐसे में प्रवक्ता पद पर ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी जा सकती है जो आक्रामक और प्रभावी तरीके से पार्टी का पक्ष रख सकें। इसके अलावा राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में रामेश्वर शर्मा और भक्ति शर्मा के नाम भी चर्चा में बने हुए हैं।

मध्य प्रदेश की बढ़ती भूमिका के कई राजनीतिक मायने
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा संगठन में मध्य प्रदेश के नेताओं की बढ़ती भागीदारी केवल क्षेत्रीय संतुलन का मामला नहीं है, बल्कि यह आगामी राष्ट्रीय राजनीति की रणनीति का भी हिस्सा हो सकती है। मध्य प्रदेश लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है और यहां के नेताओं ने संगठन विस्तार में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में नई राष्ट्रीय टीम में प्रदेश को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना भविष्य की चुनावी तैयारियों और राजनीतिक संदेश दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सभी की नजरें भाजपा नेतृत्व के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में पार्टी की नई राजनीतिक दिशा स्पष्ट कर सकता है।

राज्यसभा चुनाव से पहले MP कांग्रेस सतर्क, क्रॉस वोटिंग की आशंका से बढ़ी हलचल

भोपाल
प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटें इसी वर्ष जून में रिक्त हो रही हैं। इन सीटों पर निर्वाचन के लिए अधिसूचना शीघ्र जारी होने की आशा है। चुनाव नजदीक आते ही क्राॅस वोटिंग को लेकर कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है। कारण, चार विधायक भी खिसक गए तो कांग्रेस के हाथ से सीट निकल जाएगी।

क्रॉस वोटिंग को लेकर मंथन
बता दें कि विधायकों के संख्या बल की दृष्टि से दो सीटें भाजपा को मिलनी तय हैं। बची एक सीट वर्तमान की स्थिति में कांग्रेस के खाते में जाएगी, पर कुछ राज्यों में कांग्रेस विधायकों द्वारा क्राॅस वोटिंग या अनुपस्थित रहने की वजह से मप्र में भी पार्टी को डर सता रहा है।

पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों ने गुपचुप तरीके से ऐसे विधायकों पर नजर रखना शुरू कर दिया है, जो क्रास वोटिंग कर सकते हैं।

विधायकों की अनुपस्थिति बनी चुनौती
दतिया से विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता शून्य किए जाने के बाद अब कांग्रेस के 64 सदस्य विधानसभा में हैं। श्योपुर जिले के विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता शून्य करने संबंधी निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक तो लगा दी है, लेकिन वह चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।

दलबदलुओं पर नजर
बीना से कांग्रेस के टिकट पर जीतीं निर्मला सप्रे के विरुद्ध नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत कार्रवाई के लिए हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी, जिस पर सुनवाई चल रही है।सप्रे वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद कई बार भाजपा के मंच पर नजर आ चुकी हैं, हालांकि वह कई बार कह चुकी हैं कि कांग्रेस से त्याग पत्र नहीं दिया है। वह पार्टी में ही हैं। ऐसे में कांग्रेस इस वोट को अपने पक्ष में नहीं मान रही है।

हालांकि, पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाल ही में प्रदेश पदाधिकारियों ने सप्रे से बात कर पार्टी के पक्ष में मतदान करने का अनुरोध किया है। इस तरह मल्होत्रा और सप्रे को हटा दें तो कांग्रेस के पास चार अतिरिक्त वोट ही हैं। इस कारण पार्टी का डर बढ़ा हुआ है।

 

PM मोदी और अमित शाह पर राहुल गांधी के बयान से मचा सियासी तूफान, BJP ने किया जोरदार पलटवार

 नई दिल्ली

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखी टिप्पणी की है. राहुल के बयान पर पलटवार करते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अराजकतावादी मानसिकता का प्रतीक बताया। 

राहुल गांधी ने बुधवार को रायबरेली के धुलवारी गांव में वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया. इस दौरान एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा, जब ये आरएसएस कार्यकर्ता आपके सामने आएंगे तो वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंभी अमित शाह की बात करेंगे तो उनसे आप उसने खुलकर कहिएगा कि आपका प्रधानमंत्री गद्दार है. आपका गृह मंत्री गद्दार है, आपका संगठन गद्दार है, आपने हिंदुस्तान को बेचने को काम किया.  आपने संविधान पर हमला करने का काम किया है. आपने अंबेडकर पर हमला किया। 

पीएम मोदी और अमित शाह पर राहुल का हमला
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखी टिप्पणी की है. इस तीखी टिप्पणी पर पलटवार करते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अराजकतावादी मानसिकता का प्रतीक बताया। 

राहुल गांधी ने बुधवार को रायबरेली में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, जब ये आरएसएस कार्यकर्ता आपके सामने आएंगे तो वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह की बात करेंगे, तब आपको उनके मुंह पर कहना होगा कि आपके प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और संगठन (भाजपा) गद्दार हैं, आपने हमारे देश को बेचने का काम किया है. आपने संविधान पर हमला करने का काम किया है. आपने अंबेडकर पर हमला किया. आपने गांधी जी पर आक्रमण किया है, ये बातें आप उनसे खुलकर कह दीजिए। 

राहुल गांधी के बयान पर नितिन नवीन का पलटवार
राहुल के इस बयान पर बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने तीखा पलटवार किया है. उन्होंने राहुल गांधी के बयान को भारतीय राजनीति की शुचिता और आपसी सम्मान के खिलाफ बताया. उन्होंने कहा कि लगातार मिल रही हार की निराशा अब राहुल के स्वभाव और चरित्र में साफ दिखने लगी है। 

नितिन नवीन ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी भारतीय राजनीति के ‘राहू’  हैं जो देश के माहौल को गंदा कर रहे हैं.  उन्होंने कांग्रेस के इतिहास पर सवाल उठाते हुए कहा कि राहुल गांधी के पूर्वजों ने हमेशा देश की जमीन को गिरवी रखने का काम किया और कभी सैनिकों का मनोबल नहीं बढ़ाया. उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के शासनकाल में पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी रहती थी, जबकि मोदी सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करती है. आज प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आतंकवाद पर पूर्ण लगाम लगी है और सेना स्वाभिमान से काम कर रही है। 

राहुल गांधी चुनावी हार के हताश-नितिन नवीन
बीजेपी अध्यक्ष ने राहुल से सवाल करते हुए कहा कि  क्या देश की जमीन सुरक्षित रखना और नक्सलवाद खत्म करना गद्दारी है?. राहुल गांधी आपके पूर्वजों ने इस देश की जमीन को हमेशा गिरवी रखने का काम किया, कभी हमारे सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने का काम नहीं किया, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस देश की जमीन भी सुरक्षित हुई है और देश की जमीन भी मजबूत हुई है. आपके शासन काल में देश की पूरी तरह से अखंड हो गई। 

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने भी इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी इस तरह के बयान देकर राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि सीधे भारतीय राज्य और लोकतंत्र से लड़ रहे हैं. भंडारी के अनुसार, ऐसी भाषा केवल पाकिस्तान या उसके द्वारा समर्थित आतंकवादी ही बोल सकते हैं। राहुल गांधी के इस कृत्य से साफ होता है कि वे देश के सभी 140 करोड़ नागरिकों का अपमान कर रहे हैं। 

‘देश की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर’, PM मोदी की आलोचना पर शरद पवार की दो टूक नसीहत

 मुंबई

NCP (SP) चीफ शरद पवार अक्सर सियासी मतभेद के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ करते रहे हैं. एक बार फिर उन्होंने कहा है कि जब वैश्विक स्तर पर देश की प्रतिष्ठा की बात आती है तो इस पर राजनीतिक मतभेद नहीं होना चाहिए. राष्ट्रीय सम्मान सभी राजनीतिक मतभेदों से ऊपर है। 

उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. राजनीतिक मुद्दों पर हमारी उनसे अलग राय हो सकती है. हालांकि जब देश की प्रतिष्ठा और सम्मान को विदेश में कम करने या उससे समझौता करने की बात आती है तो इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे. राष्ट्र के गौरव और सम्मान के मामले में कोई सियासी मतभेद या विवाद नहीं होना चाहिए। 

एनसीपी चीफ ने कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री के रूप में वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं. शाम मुंबई में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जब भी राष्ट्रीय हित में सामूहिक रूप से काम करने का अवसर मिले, सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ आगे आना चाहिए. साथ ही देश की प्रतिष्ठा को मजबूत करने में योगदान देना चाहिए। 

इंदिरा गांधी-नरसिम्हा राव का जिक्र
पूर्व प्रधानमंत्रियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन जैसे नेताओं ने हमेशा देश के भविष्य और उसकी प्रतिष्ठा को अपने नेतृत्व के केंद्र में रखा। 

पवार ने कहा, प्रधानमंत्री मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं. हमारे राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं. जब राष्ट्र के सम्मान की बात हो, तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए. कुछ लोग आज अलग-अलग पार्टियों में हो सकते हैं, लेकिन आप सभी आम लोगों के बीच जुड़े हुए हैं और समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। 

शुरुआती सियासी सफर को किया याद
अपने शुरुआती राजनीतिक सफर को याद करते हुए पवार ने कहा कि 1958 में जब उनकी उम्र 18 वर्ष थी, वह बारामती से पुणे आए थे. उस समय उनके गृह नगर में कोई कॉलेज नहीं था. वह युवा आंदोलन से जुड़े. चार साल बाद पुणे सिटी यूथ कांग्रेस के प्रमुख बने. बाद में महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस का नेतृत्व किया, जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर काम किया। 

शरद पवार ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ी एक घटना का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जब तत्कालीन सोवियत संघ की आधिकारिक यात्रा के दौरान उन्हें लगा कि भारत के प्रधानमंत्री को उचित सम्मान नहीं दिया गया. पूर्व पीएम इंद्रकुमार गुजराल के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए पवार ने कहा कि इंदिरा गांधी ने सोवियत अधिकारियों से कहा था कि वह 40 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनके सम्मान का अपमान वह कभी स्वीकार नहीं करेंगी। 

उन्होंने पूर्व सहयोगियों से अपील करते हुए कहा, यदि राष्ट्रीय हित में सामूहिक रूप से काम करने का अवसर मिले, तो आप सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ भाग लेना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने में योगदान देना चाहिए। 

‘जय श्रीराम बोलो और पेट्रोल-डीजल सस्ता हो जाएगा’, संजय राउत का BJP पर तीखा तंज

मुंबई 

 देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इसी कड़ी में शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके समर्थकों पर बेहद तीखा तंज कसा है। मुंबई में पत्रकारों से बात करते हुए राउत ने ईंधन की कीमतों में इजाफे को प्रत्याशित बताया और तंज कसते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि यह तो होना ही था।

संजय राउत ने पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “इसमें नया क्या है? यह तो होना ही था। अगर आप बीजेपी के समर्थक हैं तो बस ‘जय श्री राम’ का नारा लगाइए और कीमतें 10 रुपये कम हो जाएंगी। बीजेपी का यही तो असली मंत्र है। ‘जय श्री राम’ बोलिए और आपको वह सब कुछ मिल जाएगा जो आप चाहते हैं।”

उन्होंने बीजेपी को वोट देने वाले आम वोटरों पर भी निशाना साधते हुए आगे कहा, “जिन्होंने बीजेपी को वोट दिया है, उन्हें अब आराम से बैठना चाहिए और इस स्थिति का सामना करना चाहिए।”

संजय राउत का यह बयान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आए नए उछाल के बाद आया है, जिसने आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा दिया है। देश भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में औसतन 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में पेट्रोल 87 पैसे महंगा होकर 98.64 रुपये और डीजल 91 पैसे बढ़कर 91.58 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। इससे ठीक चार दिन पहले भी केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में देश भर में 3 रुपये प्रति लीटर का बड़ा इजाफा किया था।

ईंधन की कीमतों में यह तेजी मिडिल ईस्ट में जारी सैन्य संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बाधित होने के कारण आई है, जिससे वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बनी हुई हैं। हालांकि भारत सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त तेल और ऊर्जा भंडार है, लेकिन घरेलू बाजार में लगातार बढ़ रही कीमतों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का बड़ा मौका दे दिया है। संजय राउत के अलावा कांग्रेस नेताओं ने भी इस बढ़ोतरी को लेकर केंद्र की आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह? ममता बनर्जी के सामने ही विधायकों ने उड़ाया अभिषेक का मजाक

कोलकत्ता 
तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों की मंगलवार को हुई आंतरिक बैठक में असहमति देखने को मिली। खबर है कि फालता सीट पर 21 मई को फिर से होने वाले चुनाव से पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान के अचानक नाम वापस लेने से टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, कालीघाट में हुई इस बैठक में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक भी मौजूद थे। बैठक में विधायकों ने फालता में अचानक हुए राजनीतिक उथल-पुथल और पार्टी के संगठनात्मक कामकाज पर सवाल उठाए।

इस घटनाक्रम की वजह जहांगीर खान हैं, जो फालता में राजनीतिक रस्साकशी के स्वघोषित ‘पुष्पा’ हैं। उन्होंने दिन में, फिर से होने वाले चुनाव से अपना नाम वापस लेने की घोषणा करके राज्य के राजनीतिक हलकों को चौंका दिया, जिससे हालिया विधानसभा चुनावों की सबसे विवादित सीटों में से एक पर भाजपा के लिए जीत की राह आसान होती दिख रही है।

जहांगीर खान के खिलाफ TMC ने क्यों नहीं की कार्रवाई?
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कोलकाता के दो और हावड़ा के एक विधायक ने जहांगीर के नाम वापस लेने का हवाला देते हुए बैठक में सवाल उठाए। संयोगवश, तीनों विधायक कालीघाट की बैठक में एक ही वाहन से पहुंचे थे। टीएमसी सूत्रों ने बताया कि ये सवाल उठाए गए कि जहांगीर ने मतदान से दो दिन पहले चुनाव से नाम वापस ले लिया, फिर भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

अभिषेक बनर्जी पर निशाना
कुछ टिप्पणियों को अभिषेक पर परोक्ष रूप से निशाना साधने के रूप में देखा गया, जिनके डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत फालता विधानसभा क्षेत्र आता है। दो वरिष्ठ विधायकों ने जहांगीर को ‘केंद्रीय प्रशासन वाले क्षेत्र का नेता’ कहकर कथित तौर पर व्यंग्य किया, जो यह डायमंड हार्बर क्षेत्र में कड़े नियंत्रण वाले राजनीतिक तंत्र की धारणा पर एक स्पष्ट कटाक्ष था।

यह सवाल भी उठाया गया कि जहांगीर, जिन्हें कथित तौर पर काफी संगठनात्मक समर्थन प्राप्त है और जिनकी प्रभावशाली नेताओं से निकटता है, ने चुनाव से हटने का फैसला क्यों किया। हाल के हफ्तों में फालता सीट का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। फालता सीट पर 29 अप्रैल को हुए चुनाव को बाद में रद्द कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा की गई थी।

श्मशान घाट के मुद्दे पर तंज
हालिया चुनाव से पहले, प्रचार के दौरान अभिषेक ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि जहांगीर ने उनसे इलाके में श्मशान घाट बनवाने का अनुरोध किया है। बाद में उन्होंने टिप्पणी की कि 4 मई को विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद, ‘दिल का दौरा पड़ने से मरने वालों’ का वहां अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की चर्चा के दौरान यह विवादास्पद टिप्पणी फिर से सामने आई और विधायकों ने कथित तौर पर पूछा कि अब श्मशान घाट कौन बनवाएगा और किसके लिए बनवाएगा।

टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने इन टिप्पणियों को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए ऐसे समय में एक व्यापक संदेश के रूप में देखा है, जब संगठन के कुछ वर्ग निजी तौर पर चुनाव के बाद की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। अभिषेक की हालिया राजनीतिक उपस्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के मद्देनजर भी इस चर्चा का महत्व बढ़ गया।

चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से सक्रिय रही हैं – कार्यक्रमों में भाग लेती रहीं और चुनाव बाद हुई हिंसा के मुद्दों पर अदालतों का रुख किया। जबकि, अभिषेक अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहे और फालता विधानसभा सीट उनके संसदीय क्षेत्र में आने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान प्रमुखता से नजर नहीं आए।.

ये विधायक हुए नाराज
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व की खुलकर आलोचना की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है, जब भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से डेटा सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि ममता बनर्जी भवानीपुर सीट के 267 में 207 बूथों पर पीछे चल रहीं थीं। यहां उन्हें शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।

अभिषेक बनर्जी पर हुए नाराज
सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों विधायकों ने आरोप लगाए हैं कि सांसद अभिषेक बनर्जी के फैसले पार्टी पर थोपे गए थे, जिसके चलते पार्टी को झटका लगा। साथ ही फालता से जहांगीर खान के नामांकन वापस लेने पर भी तंज कसा गया।

क्या था रिएक्शन
रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा, ‘बुआ और भतीजे की जोड़ी को समझ ही नहीं आया कि उनके साथ अचानक यह क्या हो गया। वे दोनों बिल्कुल चुपचाप बैठे सुनते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।’ उन्होंने बताया ठीक इसके पहले ही पार्टी प्रमुख ने दावा किया था कि भाजपा भविष्य में केंद्र से चली जाएगी।

अखबार से बातचीत में एक सूत्र ने कहा, ‘कुणाल ने खुलकर कहा कि अब बहुत हो गया है और खुलकर बोलने की आजादी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके कालीघाट वाले घर पर ऐसी बहुत सी बैठकें हो चुकी हैं, अब हमें उन बैठकों को छोड़कर सड़कों पर उतरना चाहिए ताकि बीजेपी की इस बुलडोजर आर्मी से गरीब और बेबस लोगों को बचाया जा सके।’

लगातार दूसरी बार हारी हैं ममता बनर्जी
साल 2021 में ममता बनर्जी को नंदीग्राम सीट से हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, टीएमसी ने राज्य में 200 से ज्यादी सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बरकरार रखने में सफलता हासिल की थी। वहीं, 2026 में उन्हें दोहरा झटका लगा। एक ओर जहां उन्होंने भवानीपुर सीट शुभेंदु अधिकारी के हाथों गंवाई। जबकि, टीएमसी भी महज 80 सीटें ही जीत सकी। भाजपा ने अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया।

15 विधायक गायब
बैठक में विधायकों की उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई। पार्टी सूत्रों के अनुसार, लगभग 15 विधायक अनुपस्थित थे।कई विधायकों ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, वहीं मालदा के एक विधायक ने नेतृत्व को कथित तौर पर सूचित किया कि वह काम के सिलसिले में दिल्ली में हैं। इससे राजनीतिक हलकों में उनके संभावित भावी कदम को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

LoP पर क्या हुआ फैसला
वहीं बैठक में बॉलीगंज के विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने से संबंधित प्रक्रियात्मक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। सूत्रों ने बताया कि विधायकों ने उन्हें नामित करने के समर्थन में एक पत्र पर हस्ताक्षर किए।

कोलकाता में अभिषेक की कुछ संपत्तियों के संबंध में जारी किए गए नगर निगम नोटिस पर उनके द्वारा कड़ा विरोध जताने के कुछ घंटों बाद यह बैठक हुई। विधायकों की बैठक में, उन्होंने कहा कि न तो नोटिस और न ही धमकियां उन्हें झुका पाएंगी।

बैठक में मौजूद एक टीएमसी विधायक ने अभिषेक के हवाले से कहा, ‘वे मेरा घर गिरा दें, वे नोटिस भेजें। मैं अपना सिर नहीं झुकाऊंगा। चाहे कुछ भी हो जाए, भाजपा के खिलाफ मेरी लड़ाई जारी रहेगी।’

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