भवानीपुर से ज्यादा TMC को क्यों डरा रहा फलता का नतीजा? बंगाल की राजनीति में नए संकेत

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला। 

ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस ‘ग्रासरूट मशीनरी’ यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के ‘नंबर दो’ और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र ‘डायमंड हार्बर’ का एक मुख्य हिस्सा है। 

इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है। 

अभिषेक का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ ध्वस्त
यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। 

शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात ‘डायमंड हार्बर’ मॉडल अब तृणमूल के ‘हार-बार’ मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है। 

अंतर्कलह का अंत नहीं
इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे ‘पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार’ के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है। 

ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना
चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है। 

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न कर पाना कार्यकर्ताओं के मनोबल के पूरी तरह टूटने का सबूत है. हालांकि अभिषेक बनर्जी ने हार के बाद इलेक्शन कमीशन पर गड़बड़ी का आरोप लगाया और दावा किया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं को परेशान किया गया. कार्यकर्ताओं के बीच संदेश यह गया है कि अगर लीडरशिप उनके अपने ही सबसे सुरक्षित गढ़ में उनकी सुरक्षा और राजनैतिक अस्तित्व पक्का नहीं कर सकती, तो आने वाले बड़े चुनावों में वे पूरी तरह असुरक्षित हैं. जब एक मजबूत किले में पार्टी का वोट शेयर 89% से गिरकर सिर्फ 3.7% हो जाता है, तो कार्यकर्ता इसे सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व का सरेंडर मानते हैं. इससे दक्षिण 24 परगना सहित दूसरे जिलों में भी नीचे के स्तर के कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता या पार्टी छोड़ने (दलबदल) की प्रवृत्ति बढ़ने की प्रबल आशंका है। 

लेफ्ट और कांग्रेस का उभार
फलता के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की विपक्षी राजनीति के समीकरण को भी पूरी तरह से बदल दिया है. इस उपचुनाव में माकपा (सीपीआई-एम) का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस का तीसरे स्थान पर रहना टीएमसी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी का साफ संकेत है. टीएमसी की सत्ता मुस्लिम और ग्रामीण वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण पर टिकी रही. लेकिन, लेफ्ट और कांग्रेस का उभार यह दिखाता है कि सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) मत अब केवल भाजपा तक सीमित नहीं हैं. बल्कि वे एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प की ओर भी मुड़ रहे हैं. यह टीएमसी के लिए एक बड़ा रणनीतिक खतरा है. दूसरी ओर, भाजपा के लिए फलता की यह जीत एक संजीवनी बूटी की तरह है, जिसने उनके कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस जीत को ‘डराने-धमकाने पर लोकतंत्र की विजय’ बताया है, जो यह दिखाता है कि भाजपा इस बेहद लोकल नतीजे का उपयोग राज्य स्तर पर टीएमसी के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में करने जा रही है। 

आखिर में, भवानीपुर की हार या जीत केवल ममता बनर्जी के प्रभाव तक सीमित होती है, लेकिन फलता की हार टीएमसी की जमीनी मशीनरी की ‘फेलियर’ यानी ऑर्गेनाइजेशन की नाकामी का सबूत बन जाती है. यह नतीजा साबित करता है कि पार्टी का अंदरुनी सिस्टम भीतर से कमजोर हो रहा है और बीजेपी के कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के सामने टिकने में नाकाम है. यह हार एक बड़ी चेतावनी है कि राजनीति में सिर्फ आक्रामक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी वफादारी और संगठन में तालमेल ही पार्टी की साख को बचाए रखता है। 

राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस में क्या चल रहा खेल? सोनिया गांधी की चुप्पी पर उठे सवाल

नई दिल्ली

हर बच्चा अपने मां बाप के प्यार दुलार में बड़ा होता है. नेता हो आम आदमी. बड़ा राजनीतिक घराना हो या कॉरपोरेट पावर हाउस. गांधी फैमिली में भी यही होता आया. आयरन लेडी होते हुए भी इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बेटों को प्यार से पाला. पर संजय गांधी और राजीव गांधी बिल्कुल अलग मिजाज के निकले. संजय गांधी की रुचि पॉलिटिक्स में थी और वो अंदर ही अंदर इतने पावरफुल हो गए कि बड़े से बड़े कैबिनेट मंत्री भी उनकी मर्जी के बिना इंदिरा से नहीं मिल सकते थे. आपातकाल में तो संजय पावर ने जो किया वो सबको पता है. अपनी जिद के आगे वो मां की भी नहीं सुनते थे. सीएम बदलने तक का फैसला संजय गांधी कर सकते थे. अकाल मृत्यु के साथ 23 जून 1980 को संजय का संक्षिप्त सक्रिय इतिहास खत्म हो गया। 

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव को बागडोर तो मिली लेकिन संजय गांधी वाली पकड़ नहीं थी. वो उन्हीं नेताओं की चौकड़ी में आगे बढ़े जो कभी उनकी मां के साथ हुआ करते थे. खुद का रॉयल मृदुभाषी अंदाज. जब 1991 में उनकी हत्या हो गई तो सोनिया गांधी को पार्टी संभालने में समय लगा. पीवी नरसिंह राव की पीएम पारी के बाद 1998 में सीताराम केसरी को धकिया कर वो अध्यक्ष बनीं. इटालियन बेबी पर बवाल न हुआ होता तो मनमोहन सिंह की जगह वही पीएम बनती लेकिन नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाकर सोनिया ने पार्टी और सरकार दोनों को मुट्ठी में कर लिया। 

पर राहुल गांधी कुछ नहीं सीख पाए. 2017 से 2019 तक दो साल अध्यक्ष तो रहे लेकिन न अपनी मां और न ही संजय गांधी वाली बात इनमें दिखाई दी. बल्कि हो इससे उलट रहा है. कहने को तो मल्लिकार्जुन खरगे अभी अध्यक्ष हैं और सोनिया बीमार हैं. इसलिए राहुल गांधी के पास ही पार्टी की चाबी है पर ये किसी काम का नहीं. राहुल लगातार पार्टी में बेइज्जत हो रहे हैं. और ये सिलसिला पिछले 9 साल से चल रहा है। 

जब खरगे उनके सामने अड़ गए
जब राहुल कोई फैसला करते हैं तो उसे स्टेट यूनिट नहीं मानती. और जब स्टेट यूनिट कोई फैसला करता है तो उसे राहुल गांधी नहीं मानते. इसी कन्फ्यूजन में कांग्रेस खत्म हो रही है. हरियाणा में हुड्डा को छूट दे दी तो जीता चुनाव हार गए. तमिलनाडु में एक्टर विजय से प्री पोल अलाएंस करना चाहते थे तो खरगे जी अड़ गए. सबसे दुखद बात ये रही कि बच्चे के फैसले में मां सोनिया कभी साथ नहीं रही. वो ओल्ड गार्ड के फेवर में रही. केरल में भी खरगे चला लेते लेकिन अंत में राहुल ने जमीनी नेता वीडी सतीशन को सीएम बना दिया. पर किस काम के सीएम. होम मिनिस्ट्री रमेश चेन्नीथला के पास चला गया। 

अगर संजय गांधी वाला एक भी गुण राहुल में होता ते इन नेताओं की मजाल थी कि बकार भी निकल पाता. ऊपर से जो नैरेटिव सेट करते हैं राहुल उसी का नाश करते हैं उनके नेता. जब पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को चीफ सेक्रेटरी बना दिया तो राहुल ने जम कर हमला बोला. बीजेपी-चुनाव आयोग को चोर बाजार बता दिया. जो जितना बड़ा चोर उसे उतना बड़ा इनाम. ये उनका सोशल मीडिया पोस्ट था. पर केरल में उन्हीं के सीएम ने वही काम किया जो सुवेंदु ने किया. मुख्य चुनाव अधिकारी रतन केलकर को अपना ही सेक्रेटरी बनाकर राहुल गांधी के मुंह पर तमाचा जड़ दिया. अब बीजेपी सवाल पूछ रही है. क्या केरल में कांग्रेस की जीत चुनाव अधिकारी के कारण हुई है? यहां तो राहुल गांधी के एसआईआर के सारे नैरेटिव पर उन्हीं की पार्टी ने पानी फेर दिया. ऐसी बेइज्जती किसी शीर्ष नेता की हुई है क्या. संजय गांधी होते तो सतीशन नप गए होते। 

‘एक साल में गिर जाएगी मोदी सरकार’— राहुल गांधी के दावे में कितना दम?

नई दिल्ली

विपक्ष के नेता राहुल गांधी का यह दावा कि अगले एक साल में पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार गिर जाएगी, राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. कांग्रेस की एक बैठक में दिए गए इस बयान को बीजेपी ने पूरी तरह हवा-हवाई और राजनीतिक निराशा से जुड़ा बयान बताया है. सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी के इस दावे के पीछे कोई ठोस राजनीतिक आधार है या फिर यह सिर्फ विपक्षी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश है?

अगर मौजूदा राजनीतिक हालात को देखें तो राहुल गांधी का दावा जमीन से ज्यादा राजनीतिक बयानबाजी जैसा नजर आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि केंद्र में एनडीए सरकार अभी भी मजबूत संख्या बल के साथ सत्ता में बनी हुई है. बीजेपी भले अकेले दम पर पहले जैसा आंकड़ा न लाई हो, लेकिन गठबंधन के साथ सरकार पूरी तरह स्थिर दिखाई देती है. सरकार पर किसी तरह का तत्काल राजनीतिक संकट नजर नहीं आता। 

दरअसल, हाल के महीनों में हुए कई चुनावों ने यह संकेत दिया है कि बीजेपी का जनाधार अभी भी बेहद मजबूत है. पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में पार्टी को जनता का शानदार समर्थन मिला है. खासतौर पर बंगाल में बीजेपी ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी को बेहद मजबूत किया है. असम में भी पार्टी और उसकी सरकार की पकड़ पहले से अधिक मजबूत नजर आ रही है. इन चुनावों ने यह संदेश दिया कि बीजेपी केवल हिंदी पट्टी तक सीमित पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में भी उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोक
प्रियता आज भी बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है. राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का चेहरा अभी भी विपक्ष के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावी माना जाता है. विपक्ष लगातार महंगाई, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठा रहा है, लेकिन इसके बावजूद मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में कोई कमी नहीं दिख रही. उनमें जनता का एक अटूट भरोसा दिखता है. यही वजह है कि बीजेपी लगातार चुनावी राजनीति में भी बढ़त बनाए हुए है। 

राहुल गांधी अपने बयान में आर्थिक असंतोष और युवाओं की नाराजगी को सरकार के खिलाफ माहौल बनने का कारण बता रहे हैं. कांग्रेस नीट पेपर लीक और छात्रों की परेशानी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है. लेकिन, सरकार ने इन मुद्दों पर भी त्वरित कदम उठाते हुए परीक्षा रद्द कर दी. ऐसे में ये मुद्दे भी अब प्रभावी नहीं रहे. वैसे भी भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि केवल मुद्दों के आधार पर सरकारें नहीं गिरतीं. इसके लिए सत्ता पक्ष के भीतर बड़ा विभाजन, गठबंधन में दरार या व्यापक राजनीतिक संकट होना चाहिए. फिलहाल ऐसी कोई स्थिति दिखाई नहीं देती. इसके बावजूद अगर राहुल गांधी एक मजबूत सरकार के गिरने की भविष्यवाणी कर रहे हैं तो इससे उनकी राजनीतिक समझ पर सवाल उठ सकते हैं। 

विपक्ष की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं
राहुल गांधी के बेतुके दावे के साथ विपक्ष की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं मानी जा रही. इंडिया गठबंधन के भीतर कई दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष अब तक कोई स्पष्ट चेहरा या ठोस वैकल्पिक एजेंडा पेश नहीं कर पाया है. कई राज्यों में कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर हुआ है. ऐसे में बीजेपी के मुकाबले विपक्ष की चुनौती फिलहाल बिखरी हुई नजर आती है. बीजेपी नेताओं ने भी राहुल गांधी के बयान को इसी नजरिए से देखा है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और सांसद संबित पात्रा जैसे नेताओं ने कहा कि विपक्ष जनता के जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहा और इसलिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं। 

असल में राहुल गांधी का बयान ज्यादा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश लगता है. कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह भरोसा बनाए रखना चाहती है कि बीजेपी को चुनौती दी जा सकती है. लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरण, मोदी की लोकप्रियता, एनडीए का संख्या बल और विपक्ष की कमजोरी को देखते हुए यह दावा फिलहाल वास्तविकता से ज्यादा राजनीतिक कल्पना जैसा दिखाई देता है। 

कर्नाटक में फिर तेज हुई सत्ता बदलने की चर्चा, सिद्धारमैया दिल्ली तलब; DK के पोस्टरों ने बढ़ाई हलचल

बेंगलुरु 

कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान की खबरों के बीच अब कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाया है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को 26 मई यानी मंगलवार को दिल्ली पहुंचने का फरमान जारी किया गया है। चर्चा है कि यहां सिद्धारमैया और पार्टी आलाकमान के बीच बंद कमरे में एक अहम बैठक होगी।

इससे पहले सिद्धारमैया ने कहा था कि वे सिर्फ आलाकमान के बुलाने पर ही दिल्ली जाएंगे। वहीं, डीके शिवकुमार ने हाल ही में कहा है कि आलाकमान जो भी फैसला करेगा, दोनों नेता उसका पूरी तरह पालन करेंगे। ऐसे में यह बैठक कर्नाटक कांग्रेस के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। इससे CM पद को लेकर जारी सस्पेंस भी खत्म हो सकता है।

गौरतलब है कि यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के 3 साल पूरे कर लिए हैं। इससे पहले सरकार बनने के समय से ही चर्चा है कि सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच पावर-शेयरिंग का फॉर्मूला तय हुआ था। इसके बाद जब सरकार ने ढाई साल पूरे किए, तब से ही शिवकुमार का खेमा लगातार उनको CM बनाने की मांग कर रहा है। बीते साल नवंबर में तनाव तब चरम पर पहुंच गया था जब शिवकुमार ने खुलकर अपनी मांग सामने रखी थी।

डीके शिवकुमार के लिए लगे पोस्टर्स
अब एक बार फिर कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में मैसूर में शिवकुमार के जन्मदिन के जश्न के दौरान उनके समर्थकों ने खास केक काटा, जिस पर लिखा था- ‘नेक्स्ट सीएम डी के बॉस’, यानी ‘अगले मुख्यमंत्री डीके बॉस।’ वहीं राजधानी बेंगलुरु से लेकर बेलगावी तक, पूरे कर्नाटक में शिवकुमार के बड़े-बड़े पोस्टरों और कट-आउट्स भी लगाए गए हैं जिनमें ऐसे ही नारे लिखे हैं।
दिल्ली दरबार में किन मुद्दों पर होगी बातचीत?

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस सूत्रों ने बताया है कि दिल्ली में होने वाली बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेता शामिल हो सकते हैं। इस दौरान दोनों गुटों के बीच जारी तनाव को कम करने की कोशिश की जाएगी। वहीं राज्य में कैबिनेट में भी बड़े फेरबदल पर चर्चा होने की संभावना है। सरकार के 3 साल पूरे होने पर कई मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है और नए और युवा चेहरों को मौका दिया जा सकता है, ताकि दोनों गुटों के विधायकों को संतुष्ट रखा जा सके।

फाल्टा में BJP की जीत का राज क्या? मुस्लिम वोट भी मिले या हिंदू वोटों का हुआ ध्रुवीकरण

कलकत्ता

पश्च‍िम बंगाल के फाल्टा व‍िधानसभा चुनाव का नतीजा आया और सब शॉक्‍ड रह गए. क्‍योंक‍ि यह सिर्फ एक सीट का रिजल्ट नहीं, मुस्‍ल‍िमों के वोट बैंक को अपना हक समझने वाली पार्टियों के ल‍िए मैसेज है. क्‍योंक‍ि यहां कुल वोट पड़े 2,10,192… और इसमें से 72% वोट अकेले बीजेपी के कैंड‍िडेट को म‍िल गए. सवाल ये क‍ि जब हिंदू आबादी यहां करीब 63से 65% के आसपास है, तो बीजेपी को 71% वोट कैसे मिल गए? व‍िपक्ष इसे ध्रुवीकरण कह सकता है, लेकिन नतीजे बताते हैं क‍ि या तो बीजेपी को एक-एक ह‍िन्‍दू वोट म‍िल गए और व‍िपक्ष को स‍िर्फ मुसलमानों के वोट म‍िले, एक भी ह‍िन्‍दू ने वोट नहीं क‍िया और या फ‍िर तमाम मुसलमानों ने भी खुलकर बीजेपी को सपोर्ट क‍िया. लेकिन असली कहानी इतनी सीधी नहीं है । 

फाल्टा विधानसभा में इस बार र‍िकॉर्ड 87% वोट‍िंग हुई थी. यानी लोगों ने इस बार वोट डालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. ये भी नहीं कह सकते क‍ि मुस्‍ल‍िम वोटर घर से नहीं न‍िकले. अब नतीजा भी देख लीजिए. वोटिंग पैटर्न को देखें तो यह मुकाबला कई उम्मीदवारों के बीच था, लेकिन असल बढ़त बीजेपी को तब मिली जब मैदान में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा होता दिखाझ बीजेपी ने लगभग हर बूथ पर मजबूत प्रदर्शन किया और बड़े वोट शेयर में तब्दील किया। 

क‍िसे क‍ितने वोट म‍िले

बीजेपी: 149666 वोट (71.2%)
सीपीएम: 40645 वोट (19.34%)
कांग्रेस: 10084 वोट (4.8%)
टीएमसी: 7778 वोट (3.7%)
अन्य/NOTA: बाकी हिस्सा

आप सोच रहे होंगे क‍ि इसमें क्‍या खास है. लेकिन ठहरिए! असली पेंच यहीं छुपा है. फाल्टा विधानसभा में हिंदू मतदाता करीब 62 से 65% हैं और मुस्लिम मतदाता लगभग 34% से 36% के बीच हैं। 

गणित के सामान्य नियम से भी देखें, तो अगर 100% हिंदू बीजेपी को वोट दे देता, जो कि आज तक कभी नहीं हुआ, तब भी बीजेपी का आंकड़ा 62-65% पर आकर थम जाना चाहिए था. लेकिन देवांग्शु पांडा को मिले हैं 71.2% वोट! यानी सीधे-सीधे हिंदू आबादी के कुल अनुपात से भी 10% से 11% ज्यादा वोट। 

तो क्या फाल्टा के मुस्लिमों ने भी चुपके से कमल के बटन पर उंगली दबाई? या फिर कांग्रेस और लेफ्ट का वोट बैंक पूरी तरह मटियामेट होकर बीजेपी में समा गया? और सबसे बड़ा सस्पेंस… दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान को सिर्फ 3.7% वोट क्यों मिले?

खेल हुआ कैसे? 

तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने ऐन वक्त पर मुकाबले से अपना नाम वापस ले लिया था या यूं कहें कि वे चुनावी रेस से तकनीकी या राजनीतिक कारणों से बाहर हो गए. लेकिन चूंकि तब तक बैलट पेपर प्रिंट हो चुके थे और ईवीएम सेट हो चुकी थी, इसलिए उनका नाम और सिंबल ‘दो फूल’ मशीन पर मौजूद रहा. नतीजा? मैदान में न होने के बावजूद जहांगीर खान के नाम पर 7,783 वोट (3.7%) पड़ गए. इसमें दिलचस्प बात ये है कि उन्हें ईवीएम से सिर्फ 6,257 वोट मिले, लेकिन पोस्टल बैलट से 1,526 वोट मिले, जो दिखाता है कि सरकारी कर्मचारियों या ड्यूटी पर तैनात लोगों का एक हिस्सा आंख मूंदकर टीएमसी के नाम पर बटन दबा गया। 

दीदी के कैंडिडेट का मैदान से हट जाना ही इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट बना. डायमंड हार्बर जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट के तहत आने वाले फाल्टा में टीएमसी का जमीन पर सक्रिय न होना एक बड़ा वैक्यूम पैदा कर गया. जब सत्ताधारी दल का मुख्य चेहरा ही गायब हो गया, तो टीएमसी का जो कोर वोटर था-विशेषकर मुस्लिम आबादी और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी… वे पूरी तरह असमंजस में आ गए। 

जहां पुरानी थ्योरी फेल हो गई
फाल्टा विधानसभा मुख्य रूप से एक ग्रामीण इलाका है. इसके सामाजिक ढांचे को समझने के लिए हमें इसके डेमोग्राफी के आंकड़ों को देखना होगा। 

    धार्मिक समीकरण: इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 52% से 65% के बीच है. वहीं मुस्लिम मतदाताओं की आबादी काफी निर्णायक है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 34% से 36% (कुछ अनुमानों में 38% तक) हिस्सा बनाती है. हासिमनगर, गोपालपुर, फतेहपुर, और भदुरा जैसे क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से टीएमसी की मजबूत पकड़ रही है। 
    जातीय समीकरण (SC फैक्टर): धार्मिक विभाजन के अलावा, यहां की स्थानीय जातियों में अनुसूचित जाति (SC) का बहुत बड़ा प्रभाव है. 2011 की जनगणना और मतदाता सूची के विश्लेषण के अनुसार, फाल्टा विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या लगभग 25.66% है. स्थानीय ग्रामीण अंचलों और गांवों (जैसे फाल्टा गांव) में कई जगह SC आबादी 80% से भी अधिक है. शेष लगभग 33% से 35% आबादी सामान्य और अन्य पिछड़ी जातियों जैसे कि महिष्य, सद्गोप व अन्य बंगाली हिंदू समुदाय की है। 

तो क्या मुस्लिमों ने भी बीजेपी को वोट दिया?

पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक धारणा बहुत मजबूत है कि मुस्लिम समुदाय कभी भी किसी भी परिस्थिति में बीजेपी को वोट नहीं देता. लेकिन फाल्टा में परिस्थितियां बिल्कुल जुदा थीं. जब टीएमसी का उम्मीदवार मैदान में सक्रिय नहीं था, तो मुस्लिम मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि उनका पारंपरिक ठिकाना गायब था. उनके पास दो ही रास्ते बचे थे या तो वे कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला या सीपीआई(एम) के शंभू नाथ कुर्मी की तरफ जाएं, या फिर स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का हिस्सा बन जाएं .

आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को मात्र 10,084 वोट (4.8%) मिले और सीपीआई(एम) को 40,645 वोट (19.34%) मिले. अगर मुस्लिम आबादी ने एकमुश्त लेफ्ट या कांग्रेस को वोट दिया होता, तो इन दोनों पार्टियों का योग बहुत बड़ा होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ग्राउंड रिपोर्ट इशारा करती है कि मुस्लिम बहुल पॉकेट्स (जैसे हासिमनगर और फतेहपुर) के कुछ हिस्सों में, विशेषकर युवा मुस्लिम मतदाताओं ने, रोजगार, स्थानीय विकास और केंद्रीय योजनाओं के प्रभाव में आकर पहली बार ‘कमल’ का बटन दबाया. हालांकि यह कोई सामूहिक बदलाव नहीं था, लेकिन इस ‘साइलेंट शिफ्ट’ ने बीजेपी के वोट शेयर को अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंचा दिया .

हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण

71.2% के जादुई आंकड़े के पीछे की जो दूसरी और सबसे सटीक थ्योरी है वह है हिंदू वोटों का शत-प्रतिशत कंसॉलिडेशन. जब किसी क्षेत्र में 87% मतदान होता है, तो इसका मतलब है कि सामान्य तौर पर घर पर बैठने वाला या न्यूट्रल रहने वाला वोटर भी पोलिंग बूथ तक पहुंचा है. फाल्टा की सामान्य जातियों (जैसे महिष्य समुदाय) और 25.66% दलित (SC) आबादी के बीच एक जबरदस्त राजनीतिक लामबंदी देखी गई. टीएमसी के स्थानीय नेताओं के खिलाफ जो गुस्सा था, वह इस चुनाव में ज्वालामुखी बनकर फटा. पारंपरिक रूप से जो हिंदू वोटर पहले लेफ्ट फ्रंट (CPIM) को वोट करता था, उसने इस बार अपना वोट खराब न करते हुए सीधे बीजेपी के देवांग्शु पांडा के पक्ष में ट्रांसफर कर दिया ताकि टीएमसी को करारी शिकस्त दी जा सके. यही कारण है कि सीपीआई(एम) का उम्मीदवार मजबूत काडर होने के बावजूद 19.34% पर सिमट गया .

ममता और राहुल के लिए यह शॉकिंग क्यों है?

ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका: डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र को टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता है. उनके ठीक बगल की विधानसभा सीट फाल्टा पर टीएमसी का इस तरह वॉकओवर दे देना और बीजेपी का 71% से ज्यादा वोट पा जाना यह दिखाता है कि सत्ताधारी दल का जमीनी संगठन अति-आत्मविश्वास या आंतरिक कलह का शिकार है. अगर दीदी का वोटर उनके उम्मीदवार के न होने पर लेफ्ट या कांग्रेस के बजाय सीधे बीजेपी की तरफ देख रहा है, तो यह 2026 के बाद की राजनीति के लिए खतरे का सायरन है .

राहुल गांधी के लिए बड़ा सबक: कांग्रेस ने यहां अब्दुर रज्जाक मोल्ला जैसे पुराने चेहरे को उतारा था, लेकिन जनता ने उन्हें पूरी तरह नकार दिया. राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’ और बड़े-बड़े दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर कांग्रेस पश्चिम बंगाल में केवल 4.8% वोटों पर सिमट कर रह गई है. अल्पसंख्यक बहुल माने जाने वाले इस क्षेत्र में भी कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रही .

 

राज्यसभा की याचिका समिति के अध्यक्ष बने राघव चड्ढा, पुनर्गठन के बाद नई जिम्मेदारी

नई दिल्ली

आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को राज्यसभा की याचिका समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने समिति का पुनर्गठन करते हुए इस संबंध में अधिसूचना जारी की है.

राज्यसभा की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि सभापति ने 20 मई से प्रभावी रूप से याचिका समिति का पुनर्गठन किया है. इसके तहत सदन के 10 सदस्यों को पैनल में नामित किया गया है. इसमें लिखा है, “राघव चड्ढा को अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.”

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के अलावा याचिका समिति में हर्ष महाजन, गुलाम अली, शंभू शरण पटेल, मयंककुमार नायक, मस्तान राव यादव बीधा, जेबी माथेर हिशाम, सुभाशीष खुंटिया, र्वंग्रा नारजरी और संतोष कुमार पी. को सदस्य बनाया गया है.

इसी के साथ राज्यसभा सचिवालय की ओर से जारी एक अन्य अधिसूचना में कहा गया कि राज्यसभा के सभापति ने 20 मई 2026 को राज्यसभा सदस्य डॉ. मेनका गुरुस्वामी को ‘कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’ पर बनी संयुक्त समिति का सदस्य नामित किया है.

वहीं लोकसभा सचिवालय की अलग अधिसूचना में कहा गया कि लोकसभा अध्यक्ष ने 21 मई से प्रभावी रूप से अरविंद गणपत सावंत को ‘कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक’ पर बनी संयुक्त समिति के लिए नामित किया है.

गौरतलब है कि राघव चड्ढा दो तिहाई ज्यादा AAP के राज्यसभा सांसदों के साथ बीजेपी में शामिल हुए थे. उनके साथ हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल सहित कई नेता शामिल रहे.

उस वक्त राघव चड्ढा ने कहा था, ‘पिछले कुछ वर्षों से मुझे यह महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं. हमने यह फैसला किया है कि हम संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को BJP में मिला लेंगे.”

उन्होंने कहा था कि जिस आम आदमी पार्टी को खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वो अब अपने सिद्धांतों, मूल्यों और मूल नैतिकता से भटक गई है. अब यह पार्टी देश के हित में नहीं, बल्कि अपने निजी फायदे के लिए काम करती है.

सिनेमा सुनामी’ वाली TVK सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी: एमके स्टालिन

चेन्नई

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम प्रमुख और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने नई नवेली टीवीके (तमिलगा वेत्री कझगम) सरकार पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने राज्य में विजय की पार्टी की जीत को ‘सिनेमा सुनामी’ करार देते हुए कहा कि ये उत्साह कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाएगा और लोग फिर डीएमके की ओर रुख करेंगे.

डीएमके प्रमुख ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि विजय की सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी. पूर्व सीएम ने ये भी दावा किया कि ये चुनाव नतीजे राजनीतिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि लोगों ने विजय को इस लिए वोट दिया, क्योंकि उनके पसंदीदा अभिनेता ने एक राजनीतिक पार्टी शुरू की है. ये कोई राजनीतिक सुनामी नहीं बल्कि महज एक ‘सिनेमा सुनामी’ थी.

उन्होंने स्पष्ट किया कि टीवीके बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटें भी नहीं जीत सकी है और वर्तमान में डीएमके की मेहरबानी से ये (टीवीके) सरकार सत्ता में है.

एमके स्टालिन ने टीवीके सरकार के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहा कि आठ और पांच मिलकर केवल 120 होते हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि टीवीके ने अन्नाद्रमुक (AIADMK) को तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन वे पूरी तरह असफल रहे. आज उनकी सरकार ‘दीवार पर बैठी बिल्ली’ की तरह है जो किसी भी दिन गिर सकती है.

‘पूरे घटनाक्रम पर है DMK की नजर’
स्टालिन ने तंज भरे लहजे में कहा कि कम्युनिस्ट, वीसीके (VCK) और आईयूएमएल (IUML) ने पहले केवल बाहर से समर्थन देने की बात कही थी, लेकिन अब वो सीधे कैबिनेट का हिस्सा बन चुके हैं, जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं. द्रमुक इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए है और सही वक्त का इंतजार कर रही है.

डीएमके अध्यक्ष ने आगे कहा कि जैसे कोई छोटा बच्चा अंत में अपनी मां को ही ढूंढता है, ठीक वैसे ही तमिलनाडु की जनता बहुत जल्द वापस हमारे पास आएगी. लोगों का जल्द ही इस राजनीतिक खिलौने (टीवीके सरकार) से मोहभंग हो जाएगा. जनता ने केवल उत्साह में आकर वोट दिया था, जिसे ये सरकार अपनी बड़ी कामयाबी मान रही है.

BJP की जीत के पीछे कांग्रेस
उधर, तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता (LOP) और द्रमुक (DMK) के वरिष्ठ नेता उदयनिधि स्टालिन ने अपनी पूर्व सहयोगी पार्टी कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लगातार उभार और जीत के लिए सीधे तौर पर उसे जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने चेन्नई में दिए अपने एक हालिया बयान में साफ शब्दों में कहा कि वह पहले सोचते थे कि देश में बीजेपी की लगातार हो रही जीतों के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह जिम्मेदार हैं, लेकिन अब वो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इसका असली और मुख्य कारण केवल कांग्रेस ही है.

उदयनिधि ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास न तो बुनियादी शिष्टाचार है और न ही कोई कृतज्ञता, इसलिए इस दल पर अब कभी-भी दोबारा भरोसा नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि उनके नेता कूटनीतिक रूप से ऐसी कांग्रेस का बोझ अपने कंधों पर उठाकर चुनाव लड़ रहे थे, जबकि उनके जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस उम्मीदवारों को भारी मतों से जिताने के लिए इस चुनाव में भी अपना खून-पसीना एक किया था.

आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में  अभिनेता विजय के नेतृत्व वाली नई पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK)सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. इसके बाद कांग्रेस और अन्य दलों के साथ सरकार बनाई. इसके बाद विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट में विजय की सरकार ने अभूतपूर्व समर्थन हासिल करते हुए 140 से ज्यादा वोट प्राप्त किए थे.

राज्यसभा चुनाव में सियासी गणित तेज, कांग्रेस के पास सिर्फ 4 विधायक ज्यादा; BJP खेल बिगाड़ने में जुटी

भोपाल
कांग्रेस मध्यप्रदेश से राज्यसभा की अपनी एक सीट बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह के दोबारा राज्यसभा जाने से इंकार करने के बाद से उम्मीदवार पर सहमति बनाने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस में दो स्तरों पर जद्दोजहद जारी है, पहला उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाना और दूसरा क्रॉस वोटिंग को रोकना। प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने पहले प्रदेश के दिग्गज नेताओं से रायशुमारी की, इसके बाद 5 मई को दिल्ली में हुई बैठक में उम्मीदवार का फैसला हो गया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी में राज्यसभा उम्मीदवार तय हो गया है। पार्टी, मध्यप्रदेश के ही सर्वस्वीकार्य और व्यापक जनाधार वाले नेता को आगे करेगी।

राज्यसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद प्रदेश कांग्रेस में सक्रियता बढ़ी है। संभावित उम्मीदवार के लिए जल्द बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें उम्मीदवारों नामों पर चर्चा कर प्रस्ताव एआइसीसी को भेजे जाएंगे।

कांग्रेस में सर्वसम्मति बनाने और क्रॉस वोटिंग रोकने पर पूरा जोर

कांग्रेस खेमे में अभी भी उम्मीदवार के नामों को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। इतना ही नहीं, बीजेपी भी उनका खेल बिगाड़ने की कवायद में जुटी हुई है। चर्चा यहां तक है कि कांग्रेस की सीट हासिल करने के लिए बीजेपी डमी प्रत्याशी उतार सकती है।

सिर्फ 4 विधायक ज्यादा, बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए

दरअसल कांग्रेस के पास अपनी राज्यसभा सीट बचाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या बल तो है पर वरिष्ठ नेताओं को इसमें सेंधमारी का डर सता रहा है। मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें हैं। एक सदस्य को राज्यसभा भेजने के लिए 58 विधायक जरूरी हैं। बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए हैं। पार्टी के पास वोट डालने वाले अब 62 विधायक ही बचे हैं जोकि एक सदस्य को जिताने की जरूरी संख्या से चार ही अधिक हैं।

क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे

हरियाणा-उड़ीसा में क्रॉस वोटिंग और बिहार में विधायकों की अनुपस्थिति के कारण कांग्रेस को झटका लग चुका है। अब मप्र में भी पार्टी को इसका डर सता रहा है। क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं।

राज्यसभा चुनाव में BJP का नया दांव! नए चेहरों पर मंथन, बंद लिफाफे में दिल्ली भेजे जाएंगे नाम

भोपाल 

केंद्रीय चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम जारी कर मध्यप्रदेश की तीन सीटों में होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। प्रदेश में तीन सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इनमें भाजपा से सांसद और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी है। कांग्रेस से दिग्विजय सिंह हैं। उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। नए उम्मीदवारों के चयन को लेकर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। बीजेपी सूत्रों के अनुसार पार्टी में नए चेहरे पर विचार किया जा रहा है। अंतिम चर्चा के बाद उम्मीदवारों के नाम बंद लिफाफे में केंद्रीय समिति को भेजे जाएंगे।

कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है
भाजपा राज्यसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस की थाह भी नाप सकती है। चर्चा है कि कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है।

हाल ही में वर्चुअली बैठक भी बुलाई गई थी। शुरुआती चर्चा पूरी हो गई है। राज्यसभा का चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद पार्टी द्वारा दिल्ली से मार्गदर्शन मांगकर पार्टी मुख्यालय में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक बुलाई जाएगी।

केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, चुनाव हारने के कारण बदले समीकरण
केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा दोबारा उन्हें मप्र से उच्च सदन में भेजने पर विचार कर रही है। वजह यह भी है कि वे केंद्र में मत्स्य पालन, पशुपालन, डेयरी और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं में शुमार हैं। यदि मध्यप्रदेश मूल के व्यक्ति को भेजने की बात का मुद्दा उठा तो तस्वीर बदल सकती है।

सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ लेकिन उनके नाम पर संशय के बादल
इतिहास के प्रोफेसर से राज्यसभा तक का सफर तय करने वाले बड़वानी के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी की जगह पार्टी किसी अन्य युवा चेहरे पर विचार कर सकती है। शीर्ष नेताओं का मानना है कि भाजपा के पास कई अन्य चेहरे हैं जिन्हें अवसर मिलना चाहिए।

राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा, सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है

हालांकि यह काम इतना आसान भी नहीं है। सांसद सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा था। सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता रहा है।

BJP में शामिल होते ही राघव चड्ढा को बड़ी जिम्मेदारी, राज्यसभा की अहम समिति के बने अध्यक्ष

नई दिल्ली

हाल ही में आम आदमी पार्टी को छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें राज्यसभा की याचिका समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। समिति का पुनर्गठन करने के बाद सदन के 10 सदस्यों को इस पैनल के लिए नामित किया गया है।

याचिका समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया
राज्यसभा की एक अधिसूचना में कहा गया है कि राघव चड्ढा को याचिका समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। इसमें यह भी बताया गया कि राज्यसभा के सभापति ने 20 मई से प्रभावी रूप से इस पैनल का पुनर्गठन किया है। राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने याचिका समिति का पुनर्गठन करने के बाद सदन के 10 सदस्यों को इस पैनल के लिए नामित किया।

चड्ढा के अलावा पैनल के सदस्यों में हर्ष महाजन, गुलाम अली, शंभू शरण पटेल, मयंककुमार नायक, मस्तान राव यादव बीधा, जेबी माथेर हिशाम, सुभाशीष खुंटिया, रंगव्रा नारज़ारी और संदोश कुमार पी शामिल हैं।

एक अन्य अधिसूचना में राज्यसभा सचिवालय ने कहा कि राज्यसभा के सभापति ने 20 मई 2026 को राज्यसभा के सदस्य डॉ. मेनका गुरुस्वामी को कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पर संयुक्त समिति के सदस्य के रूप में नामित किया है।

आप के 7 सांसदों ने थामा था बीजेपी का हाथ
बता दें कि आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं में एक रहे राघव चड्ढा ने राज्यसभा के छह अन्य सांसदों के साथ पार्टी को अलविदा कह दिया था। सभी सात सांसदों ने 27 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली। राज्यसभा में 10 सांसदों वाली आप के अब केवल 3 सांसद बचे हैं।

आप ने की थी बर्खास्त करने की मांग
इन नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के बाद आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन से उन्हें बर्खास्त करने की मांग की थी। बीजेपी में शामिल होने वाले सांसदों में राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
इस बीच राघव चड्ढा की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर किया गया है। इसमें सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर उनके बारे में प्रसारित किए जा रहे फर्जी, एआई-जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट को तत्काल हटाने और ब्लॉक करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि संबंधित सामग्री दुर्भावनापूर्ण, मनगढ़ंत और राघव चड्ढा की प्रतिष्ठा व व्यक्तित्व अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाली है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि एआई और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर छेड़छाड़ की गई सामग्री तैयार करना और प्रसारित करना न केवल कानूनी और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इससे अपूरणीय प्रतिष्ठात्मक क्षति भी हो रही है।

कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
दिल्ली हाई कोर्ट में दायर इस याचिका पर जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद की बेंच ने सुनवाई की। जस्टिस प्रसाद ने कहा कि यह राघव चड्ढा के व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन का मामला नहीं बनता। उनकी आलोचना उनके राजनीतिक फैसले को लेकर और बीजेपी में जाने को लेकर की जा रही है। हाई कोर्ट ने कहा कि व्यक्तित्व अधिकारों का व्यवसायिक इस्तेमाल और आलोचना करने में अंतर है। कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

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