TMC के 9 दिग्गजों को अपने ही बूथ पर नहीं मिले वोट, चुनाव आयोग की रिपोर्ट से मचा सियासी बवाल

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई मजबूत किलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी बूथ स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि टीएमसी के प्रमुख 36 नेताओं में से केवल 14 नेता ही अपनी सीट बचा पाए हैं। टीएमसी 22 दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा है।

हैरान करने वाली बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई मौजूदा मंत्रियों को अपने ही घरेलू वॉर्डों और उन सीटों पर शिकस्त झेलनी पड़ी है, जिन्हें कभी टीएमसी का अभेद्य गढ़ माना जाता था। 16 वरिष्ठ टीएमसी नेता अपनी सीटों के महज एक-तिहाई या उससे भी कम पोलिंग बूथों पर जीत दर्ज कर सके।

भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी का दबदबा
भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी ने 2021 के उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। वहां इस बार भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें करारी शिकस्त दी। यह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव है जब शुभेंदु ने ममता बनर्जी को पराजित किया है। भवानीपुर के कुल 270 पोलिंग बूथों में से ममता बनर्जी केवल 62 बूथों पर ही बढ़त बना सकीं।

ममता बनर्जी ने अपने घरेलू पोलिंग स्टेशन बूथ संख्या 207 पर 63.33% वोट शेयर के साथ जीत जरूर दर्ज की, लेकिन वह पूरी सीट बचाने के लिए नाकाफी रहा। ममता केवल 54 बूथों पर 50% से अधिक वोट हासिल कर पाईं। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के 197 बूथों पर 50% से अधिक वोट शेयर के साथ एकतरफा जीत हासिल की, जिसमें 44 बूथ ऐसे थे जहां उन्हें 80% से अधिक वोट मिले।

3 मंत्रियों को नहीं मिला 15% बूथों पर भी समर्थन
टीएमसी के चार प्रमुख चेहरे और मंत्री सुजीत बोस, ब्रात्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य और प्रदीप मजूमदार अपनी सीटों के कुल पोलिंग बूथों में से 15% बूथों पर भी जीत हासिल नहीं कर सके। इन चारों ही मंत्रियों को भाजपा उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से हराया। केवल तीन टीएमसी मंत्री मोहम्मद गुलाम रब्बानी, अखरुज्जमां और सबीना यास्मिन ही ऐसे रहे जिन्होंने अपनी सीटों के 80% से अधिक पोलिंग बूथों पर शानदार जीत दर्ज की।

अपने ही घर में घिरे नेता
आंकड़ों के मुताबिक, इन 36 प्रमुख नेताओं में से 25 नेता उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड थे, जहां से वे चुनाव लड़ रहे थे। इन 25 नेताओं में से केवल 9 नेता अपने घरेलू पोलिंग बूथ पर जीत दर्ज कर सके, जिनमें से 6 अंततः अपनी पूरी सीट हार गए और केवल 3 को ही अंतिम जीत मिली। कुल मिलाकर, अपने घरेलू बूथ पर जीतने वाले 16 वरिष्ठ टीएमसी नेताओं में से सिर्फ 6 ही अपनी विधानसभा सीट जीत पाए।

भाजपा की रणनीति रही सफल
आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी के दिग्गजों को बेदखल करने के लिए भाजपा ने बेहद रणनीतिक जीत दर्ज की। जिन 22 सीटों पर टीएमसी के बड़े नेता हारे उनमें से 15 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा ने कुल बूथों के 30% से भी कम हिस्से पर 50% से अधिक वोट शेयर हासिल किया था, फिर भी वे सीट जीतने में कामयाब रहे। भाजपा के सौरव सिकदार ने पूर्व वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को हरा दिया, जबकि सिकदार केवल 3.78% बूथों पर ही 50% से अधिक वोट शेयर हासिल कर पाए थे।

जीत का बड़ा अंतर
जिन 22 सीटों पर टीएमसी के दिग्गज हारे, उनमें से 16 सीटों पर आधे से अधिक पोलिंग बूथों में भाजपा उम्मीदवार और टीएमसी उम्मीदवार के बीच 10 प्रतिशत से अधिक वोटों का फासला था। दूसरी तरफ, टीएमसी के जो 14 प्रमुख नेता चुनाव जीते हैं उनमें पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चंद्रनाथ सिन्हा (बोलपुर) और पुलक रॉय (उलूबेरिया दक्षिण) शामिल हैं। ये दोनों नेता अपनी सीटों के आधे से अधिक बूथों पर भाजपा से 10% से अधिक वोटों से पिछड़ने के बावजूद अंतिम रूप से सीट जीतने में सफल रहे। टीएमसी के लिए सबसे एकतरफा और बड़ी जीत गोलपोखर में मोहम्मद गुलाम रब्बानी और सुजापुर में सबीना यास्मिन की सीटों पर दर्ज की गई।

कर्नाटक कांग्रेस में नए सत्ता समीकरण की तैयारी, 4 डिप्टी CM फॉर्मूले पर मंथन तेज

बेंगलुरु 
मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के इस्तीफे के बाद से कर्नाटक की राजनीति में बड़ा उलफेर देखने को मिल रहा है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बनने जा रही नई सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए चार डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार आज दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलकर राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल पर चर्चा करेंगे। जिसमें चार डिप्टी सीएम को लेकर भी मंथन होगा।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक के पूर्व सीएम सिद्दरमैया, डीके शिवकुमार और AICC के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ चर्चा करेंगे। सूत्रों ने बताया कि इस बैठक के दौरान राज्यसभा उम्मीदवारों, MLC उम्मीदवारों और मंत्रिमंडल में फेरबदल पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाएगा।

चार डिप्टी सीएम बनाने की संभावना
सूत्रों ने आगे बताया कि सिद्दरमैया के मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों को डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में जगह मिलने की संभावना कम है। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया कि सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए चार उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं।

सिद्दरमैया के बेटे को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी
सूत्रों के अनुसार, सिद्दरमैया के बेटे और विधान परिषद के सदस्य यतींद्र को डीके शिवकुमार की कैबिनेट में शामिल किए जाने की पूरी उम्मीद है। उन्हें कोई अहम मंत्रालय मिलने की संभावना है, ताकि सिद्दरमैया की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश दिया जा सके।

कांग्रेस विधायक दल की बैठक की तारीख आज तय की जाएगी जो कि अब महज एक औपचारिकता ही लगती है। इसके बाद, कर्नाटक के मुख्यमंत्री के तौर पर डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण समारोह की तारीख तय की जाएगी।

कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों पर होने हैं चुनाव
कर्नाटक में राज्यसभा की जिन चार सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से कांग्रेस दो सीटें आसानी से जीतती दिख रही है। तीसरी सीट पर भी उसे बढ़त हासिल है, जिसके लिए उसे बस कुछ और वोटों की जरूरत है। सूत्रों ने बताया कि AICC के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला तीन में से दो राज्यसभा सीटों के लिए नामों का पैनल पेश करेंगे, और खड़गे को राज्यसभा में दोबारा मौका दिया जाएगा।

इसके अलावा, राज्य में विधान परिषद (MLC) की सात सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए भी संभावित नामों का एक पैनल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सौंपा जाएगा।

राज्यपाल ने स्वीकार किया इस्तीफा
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने बीते गुरुवार अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने गुरुवार दोपहर तीन बजे लोकभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन राज्यपाल की अनुपस्थिति के कारण उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ था। आज राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सिद्दरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।

राज्यपाला ने इस्तीफा स्वीकार करते हुए लिखा, “मैं थावरचंद गहलोत भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।” 

डीके शिवकुमार के सामने बड़ी चुनौती! 24 महीने में खुद को साबित नहीं किया तो टूट सकता है राहुल गांधी का बड़ा सपना

बेंगलुरु

कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब पार्टी दक्षिण भारत में अपनी सबसे मजबूत सरकार को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहती है. राहुल गांधी की रणनीति साफ है. कर्नाटक को 2028 चुनाव तक कांग्रेस का मॉडल राज्य बनाना है. लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले चार दशक में यहां कोई भी सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है. ऐसे में शिवकुमार के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें इतिहास बदलने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यही वजह है कि दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक इस बदलाव को कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है। 

डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत खिलाड़ी माना जाता है. संकट के समय विधायकों को संभालने से लेकर पार्टी को टूटने से बचाने तक उन्होंने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. अब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष को भी साधना होगा. सिद्धारमैया भले ही कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर यह संकेत दे दिया है कि वह अभी भी कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. इसका मतलब साफ है कि शिवकुमार को हर फैसले में राजनीतिक संतुलन बनाकर चलना होगा. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि अगर जातीय समीकरण बिगड़े तो भाजपा और जेडीएस इसका बड़ा फायदा उठा सकते हैं। 

40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती
    कर्नाटक में पिछले 40 सालों से कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में नहीं लौटी है. कांग्रेस चाहती है कि डीके शिवकुमार इस मिथक को तोड़ें. पार्टी का मानना है कि उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ आगामी चुनावों में फायदा दिला सकती है. लेकिन यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर को रोकना सबसे मुश्किल काम माना जाता है। 

    सिद्धारमैया के हटने से कुरुबा समुदाय में नाराजगी की संभावना जताई जा रही है. कांग्रेस इसे संतुलित करने के लिए उनके बेटे यतींद्र को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. दूसरी ओर, वोक्कालिगा समुदाय में डीके शिवकुमार की मजबूत पकड़ पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ बन सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि जेडीएस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे उसकी तरफ शिफ्ट होगा। 

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘फाइटर’ वाली छवि है. वह जमीनी नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार के बेहद करीबी भी हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी उन्हें भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रहे हैं. हालांकि भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित खींचतान को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है। 

सिद्धारमैया की मौजूदगी बनेगी दबाव?
सिद्धारमैया का दिल्ली राजनीति से दूरी बनाना कई संकेत देता है. वह बेंगलुरु में रहकर अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते. इससे डीके शिवकुमार पर लगातार दबाव बना रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व भले इसे सहज परिवर्तन बता रहा हो, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। 

डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2028 विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकंबेंसी को नियंत्रित करना होगी. कर्नाटक में पिछले चार दशक से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. ऐसे में उन्हें विकास, संगठन और जातीय संतुलन तीनों मोर्चों पर सफल होना पड़ेगा. अगर सरकार के खिलाफ माहौल बनता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान पर भी पड़ेगा। 

सिद्धारमैया का सक्रिय रहना कांग्रेस के लिए फायदा है या नुकसान?
यह दोनों तरह से असर डाल सकता है. सिद्धारमैया का अनुभव और AHINDA वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत है. लेकिन अगर उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ता है तो डीके शिवकुमार के लिए फैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हाईकमान को दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा। 

राहुल गांधी के लिए कर्नाटक इतना अहम क्यों है?
कर्नाटक इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है. पार्टी इसे 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ‘गवर्नेंस मॉडल’ के तौर पर पेश करना चाहती है. अगर कांग्रेस यहां दोबारा सत्ता में लौटती है तो राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को बड़ी मजबूती मिलेगी. इसलिए मुख्यमंत्री परिवर्तन को भविष्य की बड़ी चुनावी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। 

वोक्कालिगा समीकरण से कांग्रेस को उम्मीद
डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. कांग्रेस को भरोसा है कि इससे जेडीएस का प्रभाव कमजोर होगा. दक्षिण कर्नाटक की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि पार्टी इस बदलाव को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के रूप में भी देख रही है 

भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर
भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित गुटबाजी को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद असंतोष बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस अंदरूनी संतुलन नहीं संभाल पाई तो भाजपा इसे अगले चुनाव में बड़ा हथियार बना सकती है। 

 

पंकज चौधरी के बाद हर्ष मल्होत्रा को बड़ी जिम्मेदारी, क्या मोदी कैबिनेट में होने वाला है बड़ा फेरबदल?

नई दिल्ली

बीजेपी ने एक बार फिर चौंकाते हुए केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्‍होत्रा को प्रदेश की कमान सौंप दी है. उन्‍हें द‍िल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया गया है. दिल्ली से पहले बीजेपी ने यूपी में भी भाजपा ने यही फॉर्मूला अपनाते हुए केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी थी. यानी अब दो-दो केंद्रीय मंत्री सीधे राज्यों में संगठन की कमान संभाल रहे हैं. इस बदलाव के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा है क‍ि क्या अब मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा. क्‍योंक‍ि बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’के सिद्धांत को मानतीहै. ऐसे में मंत्रियों को संगठन में भेजे जाने का सीधा मतलब है कि केंद्रीय कैबिनेट में कई महत्वपूर्ण कुर्सियां खाली होने वाली हैं। 

हर्ष मल्होत्रा पूर्वी दिल्ली से सांसद हैं और मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. दिल्ली में अगले कुछ समय में होने वाले एमसीडी चुनाव को देखते हुए उनकी न‍ियुक्‍त‍ि काफी मायने रखती है. द‍िल्‍ली में बीजेपी को एक ऐसे जमीन से जुड़े पंजाबी और वैश्य चेहरे की जरूरत थी, जिसकी प्रशासनिक पकड़ मजबूत हो. केंद्रीय मंत्री को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ने वाली. इसके साथ ही बीजेपी ने पंजाबी चेहरे को मौका देकर पंजाब में भी पैठ बनाने की कोश‍िश की है। 

‘एक व्यक्ति, एक पद’ का सिद्धांत
बीजेपी की कार्यशैली दूसरी पार्टियों से थोड़ी अलग है. बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का नियम बेहद कड़ाई से लागू करती है. पार्टी का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी नेता को संगठन से सरकार में या सरकार से संगठन में लाया गया है, उसने बड़े बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया है। 

जेपी नड्डा का उदाहरण
जब जेपी नड्डा को मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, तो उन्होंने तुरंत राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से दूरी बनाई और पार्टी ने सांगठनिक निरंतरता के लिए नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना. ठीक यही नियम अब राज्यों के स्तर पर भी लागू होने जा रहा है। 

उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी
कुछ समय पहले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था. तब भी यह सवाल उठा था कि क्या वे दोनों पद संभालेंगे? भाजपा की नीति के अनुसार, जब कोई मंत्री संगठन के पूर्णकालिक काम में उतरता है, तो उसे सरकारी जिम्मेदारी से मुक्त किया जाता है ताकि वह शत-प्रतिशत समय संगठन को दे सके। 

अब हर्ष मल्‍होत्रा
अब यही इतिहास दिल्ली में हर्ष मल्होत्रा के साथ दोहराया जा रहा है. हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी दोनों केंद्रीय मंत्रालयों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. चूंकि दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में संगठन का काम 24 घंटे और 365 दिन का होता है, इसलिए इन दोनों मंत्रियों का कैबिनेट से बाहर होना तय माना जा रहा है. यह कदम ही इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि मोदी कैबिनेट में जल्द ही नए चेहरों की एंट्री होने वाली है। 

जब-जब संगठन बदला, तब-तब बदली कैबिनेट
यदि हम मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों के इतिहास और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के दौर के इतिहास पर नजर डालें, तो काफी कुछ क्‍ल‍ियर हो जाता है। 

    साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब राजनाथ सिंह सरकार में गृहमंत्री बने. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत के तहत राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष पद छोड़ा और अमित शाह को संगठन की कमान मिली. इसके बाद संगठन का पूरी तरह कायाकल्प हुआ और कैबिनेट का भी विस्तार हुआ। 

    जुलाई 2021 में मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का सबसे बड़ा कैबिनेट फेरबदल किया था. उस समय रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, डॉ. हर्षवर्धन और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे 12 बड़े मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई थी. इनमें से कई नेताओं को बाद में संगठन के काम में लगाया गया था, जबकि भूपेंद्र यादव, अश्विनी वैष्णव और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नए चेहरों को कैबिनेट में एंट्री मिली थी। 

    अटल जी के समय भी कुशाभाऊ ठाकरे और जन कृष्णमूर्ती जैसे संगठन के दिग्गजों को सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए इस्तेमाल किया गया था. प्रमोद महाजन और वेंकैया नायडू जैसे नेताओं को कई बार संगठन से सरकार और सरकार से संगठन में भेजा गया। 

 

कर्नाटक में बड़ा सियासी उलटफेर! राज्यपाल ने स्वीकार किया सिद्धारमैया का इस्तीफा, डीके शिवकुमार का रास्ता साफ

बेंगलुरु
 कर्नाटक सरकार में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता शुक्रवार सुबह साफ हो गया है. राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने आज सुबह सीएम सिद्दारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है. बता दें, सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने आवास ‘कावेरी’ पर आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग में इस मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया था. राज्यपाल अभी कर्नाटक से बाहर इंदौर में हैं. इसके बाद दोपहर 3 बजे वे लोकभवन गए और राज्यपाल के सचिव को अपना त्यागपत्र सौंपा. इस्तीफा स्वीकार करते ही राज्य में नई सरकार के गठन होने का रास्ता बिल्कुल साफ हो गया है। 

कर्नाटक में आज 29 मई को कांग्रेस विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें नए नेता का चुनाव होगा. जानकारी के मुताबिक यह बैठक शाम 5 बजे के करीब होनी है. नई सरकार को लेकर नई दिल्ली में भी कवायद शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पूर्व सीएम सिद्धारमैया दिल्ली पहुंच चुके हैं। 

राज्य के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार भी दिल्ली पहुंचे हैं. जहां दोनों नेता पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मुलाकात करेंगे. ऐसा माना जा रहा है कि सरकार में किन नेताओं को मंत्रिपद मिलेगा, इसकी मंत्रणा की जाएगी। 

इससे पहले सिद्धारमैया के आवास पर आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग में पूरी कैबिनेट शामिल हुई थी, जहां सिद्धारमैया ने पद से हटने की घोषणा की. वहीं, डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के पहले गले मिले और उसके बाद पैर छूकर आर्शीवाद लिया. आपको बता दें, राज्य में काफी दिनों से नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही थी, जिसका अब पटाक्षेप हो गया है. सूत्रों से जानकारी मिली है कि रविवार को नई सरकार का शपथ ग्रहण कार्यक्रम हो सकता है। 

राज्यसभा चुनाव में बढ़ेगा सियासी रोमांच, क्रॉस वोटिंग हुई तो कई सीटों पर फंस सकता है खेल

नई दिल्ली

राज्यसभा की 24 सीटों के चुनाव में संख्याबल के बावजूद विपक्षी दलों में अपने उम्मीदवार की जीत का भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है। पिछले कई मौकों पर बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग ने भाजपा विरोधी खेमे को कई बड़े झटके दिए हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश, झारखंड एवं कर्नाटक में काग्रेस और उसके सहयोदी दलों को क्रॉस वोटिंग की चिंता सता रही है।

झारखंड की 2 सीटों पर चुनाव
झारखंड में सत्तारूढ़ झामुमो और उसकी सहयोगी कांग्रेस के पास खाली हो रही दोनों सीट जीतने के लिए पर्याप्त नंबर हैं, लेकिन भाजपा के द्वारा चुनाव लड़ने की तैयारी से समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में दो राज्यसभा सीटों के चुनाव में एक सीट की जीत के लिए 28 वोट चाहिए। झामुमो के नेतृत्व वाली INDIA गठबंधन की सरकार के पास 56 विधायक हैं। यानी दोनों सीटें जीती जा सकती हैं।

भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 24 विधायक हैं। यानी चार सीटों की क्रॉस वोटिंग से तो मामला पलट ही सकता है, एक दो वोट इधर उघर होने पर दूसरी वरीयता से दूसरी सीट का फैसला होगा।

कर्नाटक में रोचक हुआ चुनाव
कर्नाटक में कांग्रेस में सरकार के भीतर खींचतान जारी है। ऐसे में, वहां की चार सीटों का चुनाव रोचक है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास 135 व भाजपा-जदएस के पास 85 विधायक हैं। एक सीट के लिए 45 वोट की जरूरत है। इसमें कांग्रेस तीन एवं भाजपा के एक सीट जीतने के आंकड़े हैं, लेकिन भाजपा दूसरी सीट के लिए उतरती है तो उसे बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग करानी पड़ेगी या फिर मामला दूसरी वरीयता के वोटों पर जा सकता है।

मध्य प्रदेश में चाहिए 58 वोट
मध्य प्रदेश में तीन सीटों के चुनाव में एक सीट के लिए 58 वोट की जरूरत है। भाजपा के पास दो सीट जीतने के बाद भी 48 वोट अतिरिक्त हैं। यानी उसे एक और सीट जीतने के लिए दस और वोटों का जुगाड़ करना होगा। कांग्रेस के पास 62 वोट हैं। यानी आसानी से एक सीट आ सकती है, लेकिन अगर भाजपा एक ज्यादा उम्मीदवार उतारती है तो क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा।

गौरतलब है कि इस बार कांग्रेस से दिग्विजय सिंह की सीट खाली हो रही है। वह फिर से लड़ते हैं तो भाजपा दांव खेल सकती है। पिछली बार दिग्विजय सिंह के चलते हुए राज्यसभा सीट के विवाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी थी। सिंधिया अब भाजपा में हैं। भाजपा यहां पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है।

इन राज्यों में चुनाव
18 जून को होने वाले चुनाव में आंध्र प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक की चार-चार सीट, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तीन-तीन सीट, झारखंड की दो सीट तथा मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम की एक-एक सीट शामिल हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु से राज्यसभा की एक-एक सीट के लिए उपचुनाव भी होगा।

जिन 26 सीटों के लिए चुनाव और उपचुनाव हो रहा है उनमें एनडीए के पास 18 सीटें हैं और इनमें भी 12 सीटें भाजपा की हैं। इसके अलावा चार सीटें कांग्रेस, तीन वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और एक झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास हैं। भाजपा की खाली होने वाली सीटों में गुजरात से तीन, कर्नाटक, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान से दो-दो और अरुणाचल प्रदेश, झारखंड और मणिपुर से एक-एक सीट शामिल हैं।

दिग्विजय सिंह के बयान पर सियासी बवाल, BJP ने कांग्रेस को बताया ‘एंटी-हिंदू’

भोपाल
 मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण की तीखी जंग छिड़ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर दिए गए एक बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा ने दिग्विजय सिंह और कांग्रेस पार्टी को सीधे तौर पर हिंदू विरोधी करार देते हुए आरोप लगाया है कि जवाहरलाल नेहरू के जमाने से लेकर आज तक कांग्रेस नेताओं ने हमेशा हिंदुओं को एक आंख नहीं भाया और उन्हें हमेशा दुश्मनों की तरह देखा है।

दिग्विजय सिंह के किस बयान पर मचा बवाल?
दरअसल, कांग्रेस कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दिग्विजय सिंह ने नेहरू के विचारों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि देश में इस समय बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का खतरनाक उभार देखा जा रहा है। नेहरू ने सांप्रदायिकता को एक ऐसा जहरीला तत्व बताया था जो देश के भीतर नफरत फैलाता है। दिग्विजय सिंह ने आगे जोड़ा कि नेहरू के मुताबिक, अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता की तुलना में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता देश के लिए कहीं अधिक खतरनाक होती है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति और अर्थव्यवस्था की दिशा पर भी तीखे सवाल उठाए।

भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस हमेशा बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाती है। कांग्रेस पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता का बचाव किया है। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने केवल वही बात दोहराई है, जो देश की वास्तविक चिंता है।

उन्होंने भाजपा पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव आते ही वोट बैंक के लिए समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलती है।

कुछ दिन पहले इंदौर में भाजपा नेत्री उषा ठाकुर के सामने खुद को दिग्विजय ने घोर सनातनी बताया था। इस पर भाजपा नेता रजनीश अग्रवाल कहते हैं कि दिग्विजय का सनातनी रूप केवल चुनाव और राजनीतिक लाभ के लिए एक ढोंग है। वह वोट बैंक की राजनीति के तहत बहुसंख्यक समाज (हिंदुओं) को निशाना बनाते हैं।

बीजेपी का तीखा पलटवार: दागे कई सवाल
दिग्विजय सिंह के इस बयान पर भोपाल से भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक राजनीति के नाम पर अलगाववाद व कट्टरपंथ फैलाने का आरोप लगाया। शर्मा ने इतिहास का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या 1947 में भारत के विभाजन के लिए हिंदू जिम्मेदार थे? क्या मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू थे? उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस तब भी विभाजनकारी ताकतों के साथ खड़ी थी और आज भी देश को बांटने वाले तत्वों को संरक्षण दे रही है।

‘आलाकमान का फैसला मंजूर’, इस्तीफे के बाद बोले सिद्धारमैया; DK शिवकुमार संभालेंगे कर्नाटक की कमान

बेंगलुरु

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर अपने पद से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया है. बेंगलुरु में मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया है और उन्हें पूरा भरोसा है कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राज्यपाल इसे जल्द ही स्वीकार कर लेंगे. सत्ता परिवर्तन के इस बड़े कदम के बीच सिद्धारमैया ने यह भी साफ किया कि राज्य में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत बरकरार है, इसलिए संविधान के अनुसार नई सरकार बनाने का अधिकार भी उनकी पार्टी को ही मिलना चाहिए. इस बड़े सियासी उलटफेर के दौरान उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें राज्य का नेतृत्व करने का यह अवसर प्रदान किया था. अब पूरे राज्य की नजरें राजभवन और अगले मुख्यमंत्री के चेहरे पर टिक गई हैं।

कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से चल रहे सत्ता हस्तांतरण के विवाद पर आखिरकार कांग्रेस हाईकमान ने निर्णायक कदम उठा लिया है. सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में चली कई दौर की मैराथन बैठकों के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर पद छोड़ने का दबाव बनाया, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा देने पर सहमति जता दी. बताया जा रहा है कि सिद्दारमैया ने शुरुआत में दो सप्ताह का समय मांगा था, ताकि वह जातीय जनगणना रिपोर्ट को कैबिनेट में पेश कर सकें, लेकिन पार्टी नेतृत्व तत्काल नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में था. कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें याद दिलाया कि 2023 में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के साथ ढाई-ढाई साल के सत्ता साझेदारी फार्मूले पर सहमति बनी थी और सिद्दारमैया पहले ही तय अवधि से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं. ‘डेक्‍कन हेराल्‍ड’ की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने बंद कमरे में हुई बैठकों के दौरान सिद्दारमैया से कहा कि पार्टी की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पुराने वादे का सम्मान जरूरी है. इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में बताए जा रहे हैं. राहुल गांधी ने दोनों नेताओं (सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार) से संयुक्त और अलग-अलग बैठकें कर पार्टी एकता बनाए रखने की अपील की।

बताया जाता है कि बैठक के दौरान सिद्दारमैया ने यह तर्क दिया कि 2025 में पद छोड़ने को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ था, लेकिन राहुल गांधी अपने रुख पर कायम रहे. पार्टी नेतृत्व ने यह भी कहा कि सिद्दारमैया पहले ही आठ वर्षों से अधिक समय तक मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं, इसलिए अब दूसरे नेताओं को अवसर देने का समय है. सूत्रों के मुताबिक, बाद में सिद्दारमैया ने वरिष्ठ नेताओं केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला से चर्चा की, जिन्होंने भी हाईकमान के निर्देश को मानने की सलाह दी. शाम को सिद्दारमैया ने ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज के आवास पर अपने करीबी सहयोगियों से मुलाकात की। कुछ मंत्रियों ने उन्हें जल्दबाजी में फैसला न लेने की सलाह दी, लेकिन सिद्धारमैया ने साफ कहा कि वह अब और इंतजार नहीं करेंगे. सूत्रों के अनुसार, सिद्दारमैया ने अपने सहयोगियों से कहा, ‘मैं शुरू से कहता आया हूं कि राहुल गांधी जब कहेंगे, मैं इस्तीफा दे दूंगा. अब जब उन्होंने कहा है, तो मैं तुरंत पद छोड़ दूंगा।

कांग्रेस के लिए अहम
कांग्रेस नेतृत्व इस फैसले को पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक नियंत्रण के लिहाज से अहम मान रहा है. 2014 के बाद कांग्रेस कई राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं पर नियंत्रण बनाए रखने में संघर्ष करती रही है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता साझा करने के वादों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन नहीं हो सका था. ऐसे में कर्नाटक में हाईकमान का यह कदम पार्टी के भीतर स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व के फैसले सर्वोपरि होंगे।

 इस्तीफा देने के प्रेस को संबोधित करते हुए भावुक हुए सिद्धारमैया
सीएम सिद्दारमैया का इस्तीफा: कर्नाटक के राजनीति में एक बड़ा बदलाव हुआ है. कांग्रेस आलाकमान के निर्देशानुसार, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए सिद्धारमैया काफी भावुक नजर आए. उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, ‘हाई कमान के पहले ही इस्तीफा देने के लिए कहने के बाद, मैंने आज अपना इस्तीफा सौंप दिया है. मुझे पूरा भरोसा है कि जब राज्यपाल आएंगे, तो वे इसे स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि यह संविधान के अनुसार ही किया जाना है.’ सिद्धारमैया ने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत है और संवैधानिक रूप से नई सरकार बनाने का अधिकार भी कांग्रेस को ही मिलना चाहिए. इस अवसर पर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उन्हें राज्य का नेतृत्व करने का मौका दिया।

BJP का बड़ा संगठनात्मक फेरबदल, दिल्ली-हरियाणा समेत 4 राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त

नई दिल्ली

बीजेपी संगठन में बड़ा फेरबदल हुआ है. पार्टी ने गुरुवार (28 मई) को चार राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष बदलने का ऐलान किया है. दिल्ली में वीरेंद्र सचदेवा की जगह केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को कमान सौंपी गई है. इसके अलावा, भाजपा ने पंजाब, हरियाणा और त्रिपुरा के नए प्रदेश अध्यक्ष के नामों का ऐलान किया है. इसको लेकर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव ने नोटिफिकेशन जारी किया है।

बीजेपी राष्ट्रीय महासचिव ने कहा, ‘भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, भारतीय जनता पार्टी दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष नियुक्त किया है. उनकी नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी।

कौन हैं दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा?
हर्ष मल्होत्रा बीजेपी के सीनियर नेता और दिल्ली से सांसद हैं. वह अभी तक केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाल रहे हैं. लंबे समय से संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय मल्होत्रा ने दिल्ली भाजपा में कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं. वह जनसंपर्क, संगठन क्षमता और विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका के लिए जाने जाते हैं।

अर्चना गुप्ता बनीं हरियाणा की प्रदेश अध्यक्ष
डॉ. अर्चना गुप्ता को हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है, जबकि सरदार केवल सिंह ढिल्लो को पंजाब और अभिषेक देबरॉय को त्रिपुरा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

कौन हैं पंजाब बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष
केवल सिंह ढिल्लों बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं. उन्होंने 2022 की संगरूर लोकसभा की उपचुनाव और 2024 में बरनाला विधानसभा की उपचुनाव बीजेपी के टिकट पर लड़ा था. ढिल्लों देश और पंजाब के एक बड़े उद्योगपति हैं. वह कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी रहे हैं, उन्हें बरनाला के लोग विकास पुरुष के तौर पर जानते हैं, उन्होंने अपनी राजनीति हमेशा विकास के मुद्दे पर लड़ी है, जबकि विरोधी खेमे के नेताओं के साथ कभी भी विवाद की राजनीति में वह नहीं पड़े।

पंजाब बीजेपी की कमान केवल सिंह ढिल्लों को
सरदार केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। वह बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने 2022 में संगरूर लोकसभा उपचुनाव और 2024 में बरनाला विधानसभा उपचुनाव बीजेपी के टिकट पर लड़ा था।

उद्योगपति से नेता तक का सफर
केवल सिंह ढिल्लों पंजाब के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी भी रहे हैं। बरनाला में लोग उन्हें विकास कार्यों के लिए जानते हैं।

हरियाणा, दिल्ली और त्रिपुरा में भी नए चेहरे को मौका मिला है। बीजेपी ने अर्चना गुप्ता को हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली बीजेपी की जिम्मेदारी मिली है। वहीं, अभिषेक देवराय को त्रिपुरा बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया है।

कर्नाटक में बड़ा सत्ता परिवर्तन! डीके शिवकुमार होंगे नए CM, सिद्धारमैया 3 बजे देंगे इस्तीफा

बेंगलुरु

 कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस्तीफे का ऐलान कर दिया है. सीएम सिद्धारमैया ने मंत्रियों के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग में यह ऐलान किया। सिद्धारमैया ने राज्यपाल से मुलाकात के लिए तीन बजे का समय मांगा है. सिद्धारमैया तीन बजे लोकभवन पहुंचकर सीएम पद से अपना इस्तीफा सौंपेंगे. लेकिन इस बीच एक नया ट्विस्ट आ गया है. राज्यपाल बेंगलुरु में मौजूद ही नहीं हैं. ऐसे में सिद्धारमैया अपना इस्तीफा राज्यपाल के प्राइवेट सेक्रेटरी को सौंपेंगे।

डीके शिवकुमार होंगे कर्नाटक के सीएम, सिद्धारमैया ने प्रस्तावित किया नाम
कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार की विदाई का वक्त तय हो गया है. सिद्धारमैया शाम तीन बजे लोकभवन पहुंचकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे. सिद्धारमैया ने इस्तीफे से पहले अगले मुख्यमंत्री के रूप में डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखा है. डीके शिवकुमार कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होंगे।

सिद्धारमैया ने सहयोगियों का किया धन्यवाद
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पद छोड़ने का ऐलान कर दिया है. सीएम सिद्धारमैया ने सभी मंत्रियों का सहयोग के लिए धन्यवाद किया और सूबे की वित्तीय स्थिति को लेकर भी चर्चा की. सीएम ने सहयोगियों को बताया कि पिछले तीन वर्षों में उनकी अगुवाई वाली सरकार ने क्या-क्या किया, कांग्रेस की चुनावी गारंटियां पूरी करने के लिए योजनाएं किस तरह से लागू कीं और सामने आई चुनौतियों से किस तरह पार पाया।

डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया मिले गले
इससे पहले, बृहस्पतिवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने आधिकारिक आवास पर अपने कैबिनेट सहयोगियों के लिए नाश्ते की मेजबानी की। इस बैठक में डी.के. शिवकुमार सहित कई अन्य मंत्री शामिल हुए। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा साझा की गई तस्वीरों में सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच की दूरियां मिटती दिखीं। एक तस्वीर में सिद्धारमैया शिवकुमार को गले लगाते नजर आ रहे हैं, जबकि एक अन्य तस्वीर में भावी मुख्यमंत्री माने जा रहे शिवकुमार, सिद्धारमैया के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि इसी बैठक के दौरान सिद्धारमैया ने शिवकुमार के लिए रास्ता साफ करने और अपने इस्तीफे की घोषणा करने की योजना बनाई थी।

कांग्रेस हाईकमान का निर्देश और राहुल गांधी की भूमिका
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के लिए अपना पद छोड़ने को कहा है। पार्टी ने 77 वर्षीय दिग्गज नेता सिद्धारमैया को राज्यसभा सीट के साथ दिल्ली में कोई अहम भूमिका देने की पेशकश की है। हालांकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने इस प्रस्ताव को तत्काल स्वीकार नहीं किया है।

राहुल गांधी का संदेश
बताया जा रहा है कि इस्तीफा देने का यह संदेश सीधे राहुल गांधी की ओर से आया है। सिद्धारमैया पहले भी कई बार कह चुके हैं कि अगर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (राहुल गांधी) उन्हें पद छोड़ने के लिए कहेंगे, तो वह सहर्ष ऐसा करेंगे। इससे पहले मंगलवार को सिद्धारमैया और शिवकुमार को दिल्ली बुलाया गया था। वहां कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और महासचिव के.सी. वेणुगोपाल व रणदीप सिंह सुरजेवाला के बीच लगातार अहम बैठकें हुईं।

राज्यपाल की अनुपस्थिति से इस्तीफे में देरी
तय कार्यक्रम के अनुसार, सिद्धारमैया को बृहस्पतिवार को ही राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मिलकर अपना इस्तीफा सौंपना था। उन्होंने इसके लिए राजभवन से समय भी मांगा था। हालांकि, राजभवन के सूत्रों के मुताबिक, राज्यपाल व्यक्तिगत कारणों से इंदौर गए हुए हैं और फिलहाल शहर में नहीं हैं।

 शाम तीन बजे लोकभवन जाएंगे सिद्धारमैया
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया शाम तीन बजे लोकभवन जाएंगे. सीएम सिद्धारमैया लोकभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंपेंगे. राज्यपाल बेंगलुरु में नहीं हैं, ऐसे में वह अपना इस्तीफा राजभवन सचिवालय को सौंपेंगे. गौरतलब है कि राज्यपाल रात के 10.30 बजे निकल गए थे।

कर्नाटक के प्रभारी एआईसीसी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मीडिया से अटकलें न लगाने की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी तक राज्य में कांग्रेस विधायक दल (CLP) की कोई बैठक नहीं बुलाई गई है और न ही कोई अंतिम निर्णय लिया गया है। आमतौर पर विधायक दल ही अपने नेता (मुख्यमंत्री) का चुनाव करता है।

समर्थकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं (जश्न और विरोध)
इस संभावित बदलाव को लेकर राज्य में सियासी पारा काफी चढ़ गया है और दोनों नेताओं के समर्थकों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। डी.के. शिवकुमार के अगले मुख्यमंत्री बनने की पक्की होती खबरों के बीच बेंगलुरु और रामनगर सहित राज्य के कई हिस्सों में उनके समर्थकों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया है। वहीं मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की अटकलों के बीच उनके समर्थक भारी संख्या में उनके आधिकारिक आवास के बाहर जमा हो गए और विरोध प्रदर्शन किया।

पिछड़ा वर्ग महासंघ की चेतावनी
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग समुदाय महासंघ ने कांग्रेस और हाईकमान को चेतावनी दी है कि यदि सिद्धारमैया को हटाया गया तो पार्टी को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। महासंघ का तर्क है कि कांग्रेस सत्ता में ‘अहिंदा’ (AHINDA – अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों का कन्नड़ संक्षिप्त नाम) के समर्थन से आई है और पार्टी में सिद्धारमैया के कद का कोई दूसरा नेता नहीं है।

क्या है ‘रोटेशनल सीएम’ फॉर्मूला?
मई 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच कड़ी टक्कर थी। उस समय पार्टी ने शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर विवाद सुलझाया था। उस दौरान ऐसी खबरें थीं कि दोनों नेताओं के बीच ‘रोटेशनल चीफ मिनिस्टर’ (ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहने) के फॉर्मूले पर समझौता हुआ है। 20 नवंबर 2025 को कांग्रेस सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल का आधा (ढाई साल) समय पूरा कर लिया था, जिसके बाद से ही इस नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई थी। हालांकि, पार्टी ने कभी इस फॉर्मूले की आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी।

 
गवर्नर राज्य में नहीं फिर भी इस्तीफा दे सकते सिद्धारमैया, जानिए ऑप्शन
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पद से इस्तीफा देने वाले हैं और राज्यपाल बेंगलुरु से बाहर हैं. ऐसे में प्रक्रिया और संविधान के प्रावधान क्या कहते हैं?

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