दिल्ली की एक मुलाकात से विधानसभा तक मचा सियासी भूचाल, 13 दिन में ऐसे बिखरी TMC

कोलकाता

दिल्ली में ‘संयोगवश’ हुई एक मुलाकात, हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया। बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई ‘संयोगवश’ मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे।
हार के बाद उभरने लगी थी कलह

विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
जहांगीर को अभिषेक ने क्यों नहीं किया निष्कासित?

पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन: चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया।
22 मई को ऋतब्रत ने की शुभेंदु से मुलाकात

वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया। घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी

हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई।
अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला

अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था।
ममता की बैठक में पहुंचे कम विधायक

इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया।
‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’

देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय ‘नबान्न’ में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए।
अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार

दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई के सहारे रफ्तार पकड़ी थी, उसका अंतिम और निर्णायक अध्याय आखिरकार विधानसभा के भीतर ही लिखा गया। ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक प्रभुत्व के इर्द-गिर्द खड़ी हुई पार्टी ने महज 13 दिन में अपने अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार देखी।

BJP नेता सतर्क रहें, मंत्री स्वपन दासगुप्ता का TMC पर बड़ा हमला; बोले- पुराने पाप धोने की कोशिश

कलकत्ता

तृणमूल कांग्रेस आंतरिक कलह के कारण बिखर रही है. ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी फिसलती हुई दिख रही है. इस बीच सीएम शुभेंदु सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने अपनी ही पार्टी को चेतावनी दी है. स्वपन दास गुप्ता ने टीएमसी के वैसे नेताओं की ओर इशारा किया है जो बीजेपी के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि उन्हें यही उम्मीद है कि तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे. उन्होंने कहा है कि वे TMC के विनाश पर कोई भी आंसू नहीं बहा रहे हैं। 

TMC के 58 विधायकों के ऐसे गुट के नेता को प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है, जिसे ममता बनर्जी का समर्थन प्राप्त नहीं है. इस गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी हैं. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है। 

कोलकाता के रासबिहारी से विधायक स्वपन दासगुप्ता ने एक्स पर लिखा, “TMC के आत्म-विनाश पर मैं कोई आंसू नहीं बहा रहा हूं. मेरी एकमात्र आशा यही है कि इन तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे। 

बंगाल बीजेपी को आगाह करते हुए स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, “हमें झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहना होगा जो आज हमारे करीब आ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने पिछले पाप धोने की जरूरत है। 

मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, “बंगाल की शुद्धिकरण प्रक्रिया अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती। पत्रकार के रूप में सक्रिय रहने वाले स्वपन दासगुप्ता को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया है। 

TMC में इतिहास की सबसे बड़ी टूट
3 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूकंप आया. तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में पहली बड़ी टूट हुई. विधानसभा स्पीकर रथींद्रनाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी। 

 ऋतब्रत को ममता ने हाल ही में पार्टी से निष्कासित किया था. उन्होंने अपने पास 58 TMC विधायकों का हस्ताक्षर दिखाया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया. स्पीकर ने अभिषेक बनर्जी द्वारा नामित शोभनदेब चट्टोपाध्याय के दावे को खारिज कर दिया। 

ऋतब्रत ने खुद को ‘असली TMC’ का प्रतिनिधि बताया और ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव रखा और कहा कि वे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. उनके गुट में संदीपन साहा, जावेद खान, शिउली साहा समेत कई प्रमुख विधायक शामिल हैं। 

इस घटनाक्रम से TMC में गहरा संकट पैदा हो गया है. ममता-अभिषेक गुट ने सभी पार्टी कमेटियों को भंग कर दिया है। 

 

कांग्रेस के लिए 2028 बना ‘करो या मरो’ का साल, दिग्गज नेता बोले- BJP नहीं, अपने ही कमजोर करते हैं पार्टी

भोपाल 

मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने हरदा में कार्यकर्ताओं के बीच संगठन को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि 2028 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए आखिरी मौका साबित हो सकता है, इसलिए पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर संगठन के लिए त्याग और समर्पण दिखाना होगा।कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अजय सिंह ने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भी खुलकर गिनाई। उन्होंने कहा कि चुनाव आते ही पार्टी में हर कोई दावेदार बन जाता है या फिर किसी गुट का समर्थक बनकर खड़ा हो जाता है। यही वजह है कि कांग्रेस कई बार भाजपा से नहीं, बल्कि अपनी ही अंदरूनी खींचतान से चुनाव हार जाती है।

उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि कांग्रेस 2028 में सत्ता में वापसी नहीं कर पाई, तो पार्टी के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए अभी से संगठन को मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने की जरूरत है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर की गई टिप्पणी को लेकर भी अजय सिंह ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुरूप भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए और राजनीतिक विरोध के बावजूद मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है।

इस दौरान अजय सिंह ने केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं, जबकि कांग्रेस की राजनीति हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति के हितों को केंद्र में रखकर चलती रही है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से राहुल गांधी के संघर्ष और जनसरोकारों से प्रेरणा लेने की अपील की।

कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं के बीच हल्की-फुल्की राजनीतिक नोकझोंक भी देखने को मिली। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पूर्व नपाध्यक्ष सुरेंद्र जैन ने कहा कि भाजपा में रहते हुए वे कांग्रेस की एकजुटता तोड़कर चुनावी लाभ दिलाते थे। इस पर कांग्रेस नेता हेमंत टाले ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि अब वही रणनीति भाजपा के खिलाफ अपनाने का समय आ गया है।

कुल मिलाकर हरदा का यह संवाद कार्यक्रम कांग्रेस के भीतर एकजुटता, संगठनात्मक मजबूती और 2028 की चुनावी तैयारी को लेकर गंभीर संदेश देने वाला साबित हुआ, जहां अजय सिंह ने साफ कर दिया कि सत्ता में वापसी का रास्ता पहले पार्टी के अंदर से होकर गुजरता है।

क्या टीएमसी में होगा ‘शिंदे मॉडल’? ऋतब्रत बनर्जी को लेकर बंगाल की राजनीति में हलचल

  कोलकाता

पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलते ही ममता बनर्जी के सामने सियासी संकट गहराता जा रहा है. चुनाव में मिली करारी हार के बाद एक-एक करके टीएमसी के पत्ते झड़ते जा रहे हैं. टीएमसी के एक के बाद एक नेता बागी तेवर अपनाता जा रहा है. ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. टीएमसी से निष्कासित विधायक रि ऋतब्रत बनर्जी क्या अब टीएमसी के ‘एकनाथ शिंदे’ साबित होंगे? 

साल 2022 का महाराष्ट्र में जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से बगावत कर उद्धव ठाकरे के हाथों से सरकार और सियासत दोनों ही छीन ली थी. अब ठीक वैसी ही सियासी स्क्रिप्ट अब पश्चिम बंगाल में लिखे जाने की सुगबुगाहट है. इसके केंद्र में टीएमसी से निष्कासित विधायक  ऋतब्रत बनर्जी हैं। 

 ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बीती रात कोलकाता स्थित विधायक हॉस्टल में टीएमसी के कई विधायकों से मुलाकात की. टीएमसी के 80 विधायकों में से 60 विधायकों ने ममता बनर्जी की बैठक से दूरी बना ली थी. अब उन्हीं विधायकों से ऋतब्रत बनर्जी की मुलाकात ने बंगाल में सियासी हलचल बढ़ा दी है.  ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई बड़ा खेला होने जा रहा है? 

टीएमसी में बगावत के बढ़ते आसार 
बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की सियासी चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही है. टीएमसी के कार्यकर्ता से लेकर नेता तक का मोहभंग हो रहा है. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर विरोध के सुर टीएमसी में तेज होते जा रहे हैं.  टीएमसीके कई नेता और विधायक पार्टी की इस हालत के लिए खुले तौर पर उन्हें ही दोषी ठहरा रहे हैं. वे उन पर भ्रष्टाचार, घमंड, परिवारवाद, सीनियर नेताओं को किनारे करने और I-PAC के प्रोफेशनल्स के ज़रिए पार्टी को अपनी जागीर की तरह चलाने का आरोप लगा रहे हैं। 

टीएमसी के कुछ नेता खुले तौर पर पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं कि 15 साल सत्ता में रहने के बाद पार्टी जमीनी हकीकत से कट गई है. सिंडिकेट और ‘कट-मनी’ (कमीशन) की आदी हो गई है, और हिंसक रूप से अहंकारी हो गई है. वे जवाबदेही और आत्म-मंथन की मांग कर रहे हैं, जिसका ममता बनर्जी ने जिद के साथ विरोध किया है.  टीएमसी में टूटने का सबसे खतरा वहीं से आ रहा है जहां से तृणमूल कांग्रेस खड़ी हुई थी, मतलब जमीनी स्तर से विरोध तेज हो गया है। 

ममता बनर्जी ने रविवार को टीएमसी विधायकों की  पीशी-भाईपो की बुलाई थी, जिसमें 80 में से सिर्फ टीएमसी 20 विधायक ही शामिल हुए. इससे पहले विभिन्न नगर निकायों के लगभग 100 TMC पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है. कई टीएमसी नेता की बीजेपी के साथ बातचीत कर रहे हैं. कुछ लोग, जैसे फिल्म निर्माता और पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती, चुनाव में हार के बाद पूरी तरह से राजनीति छोड़ चुके हैं. इस तरह टीएमसी से नेताओं को मोहभंग हो रहा है, जो ममता बनर्जी के लिए सियासी टेंशन का सबब बनता जा रहा है। 

 ऋतब्रत बनर्जी बनेंगे टीएमसी के ‘शिंदे’
टीएमसी के टिकट पर विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिसके चलते ममता बनर्जी ने दोनों विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. अब इन्हीं दोनों विधायकों ने टीएमसी के साथ खेला करने की कवायद में जुट गए हैं.  टीएमसी के कई विधायकों के साथ  ऋतब्रत बनर्जी ने देर रात मुलाकात की है. इससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि टीएमसी के भीतर एक नया समूह आकार ले सकता है। 

विधायक हॉस्टल में  ऋतब्रत बनर्जी से मिलने वालों में पश्चिमी मिदनापुर की एक महिला विधायक भी शामिल थीं.  ऋतब्रत और संदीपन से मिलने वाले टीएमसी के एक विधायक के मुताबिक हम पार्टी तोड़कर कोई अलग दल बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, हम टीएमसी के झंडे तले ही काम करेंगे. ऐसे में साफ है कि टीएमसी के अंदर कुछ सियासी खिचड़ी जरूर पक रही है.  टीएमसी से निष्कासित विधायक जिस तरह से एक्टिव हैं और अभिषेक पर पार्टी को हाईजैक करने का आरोप लगाया, उससे सियासत तेज हो गई है। 

 ऋतब्रत बनर्जी ने खोला सियासी मोर्चा
 ऋतब्रत बनर्जी ने आजतक से बात करते हुएअभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को सीधे तौर पर चुनौती दी है. मुख्य मुद्दा पार्टी में IPAC के संबंध में जूनियर बनर्जी की भूमिका अहम थी. TMC विधायक कुणाल घोष ने आरोप लगाया था कि निकाले गए ये दोनों विधायक पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता के एक होटल में कुछ विधायकों के साथ एक गुप्त बैठक की थी, बाद में ऋतब्रत ने इस आरोप से इनकार कर दिया। 

अभिषेक बनर्जी की घटना ने बढ़ाई टेंशन
अभिषेक बनर्जी को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा. वह सोनारपुर गए थे., उनके ऊपर अंडे और जूते फेंके गए। कल्याण बनर्जी ने अगले दिन आरोप लगाया कि उनके सिर पर एक पत्थर लगा था, लेकिन इन सबसे ऊपर, जहां भी वे गए, चोर, चोर के नारे लगे. इस तरह का दृश्य हर टीएमसी विधायक और सांसद को सियासी तौर पर चिंतित कर रहा है। 

टीएमसी के कई नेताओं को डर सता रहा है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के साथ जुड़ाव उनका राजनीतिक करियर बर्बाद कर सकता है.  इसके चलते ही टीएमसी के नेता ममता बनर्जी की बैठक में शामिल नहीं हुए. इससे ममता बनर्जी की सियासी टेंशन बढ़ गई है, क्योंकि जो विधायक बैठक में नहीं आए, लेकिन उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी से मुलाकात की है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि कोई बड़ा खेला होने जा रहा है। 

कुणाल घोष की अपील डूबते जहाज न छोड़े
टीएमसी के 80 विधायकों और 29 सांसदों में से आधे से ज्यादा (लगभग 40-45 विधायक और 15-18 सांसद) ममता बनर्जी से अलग होकर ‘दो घास-फूल’ वाले चुनाव चिह्न के लिए चुनाव आयोग से संपर्क करते हैं, तो यह ममता बनर्जी और उनके भतीजे के पार्टी पर दावे को खारिज करने के लिए काफी हो सकता है. सोमवार को MLA कुणाल घोष ने टीएमसी नेताओं से हाथ जोड़कर गुज़ारिश की कि वे डूबते जहाज को छोड़कर न भागें, लेकिन ऐसे मुश्किल समय में, उनके नेता को उन पर भी यह भरोसा नहीं है कि वे कोई लाइफबोट छीनकर कूद न जाएं। 

बंगाल चुनाव के बाद हुई समीक्षा बैठक में कम से कम तीन चुने हुए विधायकों ने खुलकर पार्टी नेतृत्व का विरोध किया. उन्होंने चुनाव में मिली करारी हार के लिए अभिषेक बनर्जी की पसंद को जबरदस्ती थोपे जाने को जिम्मेदार ठहराया. कआलोचना करने वालों में वे दो विधायकों निकाल दिया गया है. तीसरे विधायक, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे कुणाल घोष हैं। 

दरअसल, ममता बनर्जी जिन्हें कभी जमीनी संघर्ष का चेहरा माना जाता था, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही धीरे-धीरे अपना नियंत्रण खोती जा रही हैं.  टीएमसी अध्यक्ष के तौर पर और संगठन पर, दोनों पर ही उन्होंने अपना नियंत्रण लगभग खो दिया है. ऐसे में पार्टी के भीतर की उथल-पुथल से ममता बनर्जी के लिए सियासी टेंशन खड़ी कर दी है, पार्टी में जिस तरह से विरोध के सुर उठ रहे हैं, उससे साफ है कि महाराष्ट्र की तरह सियासी खेला होने जा रहा है। 

बंगाल राजनीति में बड़ा उलटफेर, 58 विधायकों ने ऋतब्रत को अपना नेता माना

कोलकाता
विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। इसी कड़ी में बुधवार को टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मानते हुए विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। सूत्रों ने बताया कि ऋतब्रत बनर्जी ने संदीपन साहा और कई अन्य बागी विधायकों के साथ विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र सौंपे। उन्होंने एक नई नेतृत्व टीम का प्रस्ताव भी रखा, जिसमें ऋतब्रत को विधायक दल का नेता, जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप-नेता और रघुनाथगंज के विधायक अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाया है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है. ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष घोषित किया था. इसके बाद पार्टी में बगावत हो गई है. 80 में से 60 विधायकों ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस से मुलाकात कर उनसे कहा कि वे TMC के असली गुट हैं और ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी जाए. विधायकों की अपील पर विचार करते हुए स्पीकर ने  ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है। 

गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से चुनाव नतीजे आने के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को TMC से निलंबित कर दिया था। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत कर दिया। 

स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के कमरे की चाबी दे दी है. टीएमसी के इस गुट में चार उप नेता प्रतिपक्ष बनाए गए हैं. इनके नाम हैं- जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू साह, और संदीपन साह. अकीरजम्मा सदन में टीएमसी के चीफ व्हिप होंगे। 

स्पीकर के इस फैसले से साफ हुआ है उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी की अगुआई वाली टीएमसी को असली तृणमूल कांग्रेस माना है।  

यह घटनाक्रम विधानसभा में बागी विधायकों की एक बैठक के बाद सामने आया। विधानसभा में हुई इस बैठक में शामिल कोई भी विधायक मंगलवार को मध्य कोलकाता में पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के धरने में मौजूद नहीं था। दूसरी ओर, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बंद्योपाध्याय, मदन मित्रा और कुणाल घोष जैसे नेता बागी विधायकों की बैठक से दूर रहे।बागियों ने ममता को माना पार्टी सुप्रीमोबागी विधायकों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में ममता बनर्जी को पार्टी का अध्यक्ष बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि बागी विधायक अपनी लड़ाई को टीएमसी सुप्रीमो के खिलाफ नहीं, बल्कि मौजूदा विधायक दल के नेतृत्व के खिलाफ पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। बागी गुट के सूत्रों ने बताया कि विधायकों ने यह भी साफ कर दिया है कि वे विधायक दल के मामलों पर फैसले लेने के संबंध में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं।पार्टी के साथ विश्वासघात हुआ।

टीएमसीटीएमसी नेतृत्व ने इस पूरी कवायद को विश्वासघात करार देते हुए खारिज कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक कुणाल घोष ने कहा कि संगठन के भीतर बातचीत से किसी भी मतभेद को सुलझाया जा सकता था। अगर उन्हें कोई समस्या थी, तो वे पार्टी के भीतर इस पर चर्चा कर सकते थे। इसके बजाय उन्होंने पार्टी को धोखा देना चुना। बागी विधायकों और उनके समर्थकों को गद्दार बताते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि टीएमसी इस संकट से उबर जाएगी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट रहेगी।अयोग्य होने से बच जाएंगे बागी विधायकदल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी अलग हुए गुट को अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। चूंकि, विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायक हैं, इसलिए यह सीमा 54 विधायकों की है। यदि बागी गुट का दावा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वे आसानी से इस आंकड़े को पार कर लेंगे और सदन में एक अलग गुट के रूप में मान्यता पाने के अपने दावे को मजबूत करेंगे।

यह है मामलाघटनाक्रम की जड़ें छह मई को ममता बनर्जी के आवास पर चुने गए विधायकों की एक बैठक में थीं, जहां विधायकों ने कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व को विपक्ष के नेता, उप-नेता और मुख्य सचेतक के नामों पर फैसला करने का अधिकार दिया था। इसके बाद टीएमसी ने विधानसभा को सूचित किया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय विपक्ष के नेता होंगे, नयना बंद्योपाध्याय और आशिमा पात्रा उप-नेता होंगी और फिरहाद हकीम मुख्य सचेतक होंगे। हालांकि, विधानसभा सचिवालय ने इस सूचना पर कोई कार्रवाई नहीं की और प्रक्रियागत जरूरतों का हवाला दिया कि ऐसे पदाधिकारियों का चुनाव विधायक दल की एक औपचारिक बैठक में होना चाहिए।हस्ताक्षर पर उठे थे सवालविवाद तब और बढ़ गया जब बागी विधायकों ने आरोप लगाया कि विधानसभा सचिवालय को भेजे गए पत्र पर किए गए हस्ताक्षर सही नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व ने इस आरोप को खारिज कर दिया और बागियों पर चुनावी झटके के बाद संगठन को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। इसी क्रम में टकराव तब और तेज हो गया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया गया।

TMC में बगावत से मचा भूचाल! 59 विधायकों के साथ ऋतब्रत बनर्जी की एंट्री, ममता पर संकट?

कोलकत्ता 
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के महज एक महीने के भीतर राज्य की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित भूचाल आ चुका है. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आधिकारिक तौर पर दोफाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है. कोलकाता के सियासी गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर की गुटबाजी अब एक खुली जंग में तब्दील हो चुकी है, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस का आड़ा-तिरछा विभाजन तय माना जा रहा है. इस बड़े उलटफेर ने राज्य से लेकर देश भर के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। 

59 विधायक हुए बागी?
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, बुधवार सुबह ठीक 10 बजे ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा के नेतृत्व में टीएमसी के बागी विधायकों का एक बहुत बड़ा हुजूम अचानक विधानसभा पहुंच गया. सूत्रों का दावा है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई से कहीं अधिक, यानी कुल 59 नाराज विधायक अब ऋतब्रता बनर्जी के पाले में खड़े हो चुके हैं. इन सभी विधायकों ने एक संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बसु को सौंपने की तैयारी की जा चुकी है। 

ममता के धरने में दिखी कम संख्या
इस अभूतपूर्व टूट के बीच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा ममता बनर्जी के खेमे का सामने आया है. राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि अब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ महज 21 विधायक ही शेष बचे हैं. इस दावे को मंगलवार को तब और हवा मिल गई जब कोलकाता के वाई चैनल पर आयोजित ममता बनर्जी के धरने में पूरी पार्टी से सिर्फ 6 विधायक और 5 सांसद ही शामिल होने पहुंचे. विधायकों की इस बेहद कम संख्या ने खुद टीएमसी नेतृत्व को भी गहरे संकट में डाल दिया है। 

ऋतब्रता को विपक्ष का नेता बनाने का दांव
ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाला यह बागी गुट अब पूरी ताकत के साथ विधानसभा में खुद को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है. बागी विधायकों के दस्तखत वाले पत्र के जरिए विधानसभा अध्यक्ष से मांग की जा रही है कि ऋतब्रता बनर्जी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का नेता घोषित किया जाए. इसके साथ ही संदीपान साहा को उप-विपक्ष का नेता और मुर्शिदाबाद के विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। 

ममता के पास सिर्फ 21 विधायक?
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 59 विधायकों के बागी रुख अख्तियार कर लेने के बाद अब आधिकारिक तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास सिर्फ 21 विधायक बचे हैं. विधायकों का ये नंबर गेम बताता है कि टीएमसी इस वक्त पूरी तरह से मुश्किलों में घिरी हुई। 

बताया जा रहा है कि टीएमसी के ये बागी विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं, जहां वह विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मुलाकात करेंगे. इसके लिए स्पीकर भी सदन पहुंच गए हैं. बताया जा रहा है कि स्पीकर से मुलाकात के दौरान ऋतब्रत नेता प्रतिपक्ष के लिए अपनी बात रखेंगे। 

क्या है बागी विधायकों की मांग
टीएमसी के इन बागी विधायकों की मांग है कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी के किसी अन्य बेहद वरिष्ठ नेता को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (लीडर ऑफ अपोजिशन) की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाए, जिसके लिए उन्होंने ये कड़ा रुख अपनाया है। उधर, टीएमसी के बागी विधायकों में शामिल मुस्तफिजुर रहमान ने कहा कि टीएमसी के 59 विधायकों ने हस्ताक्षर किया है. हम सभी ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि किसी वरिष्ठ नेता को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए। विधानसभा के मौजूदा समीकरणों को देखें तो इस अभूतपूर्व बगावत के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास अब केवल 21 वफादार विधायक ही बचे हैं, जिससे पार्टी के पूरी तरह विभाजित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए बंगाल विधानसभा में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 207 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर टीएमसी को सत्ता से बेदखल कर दिया। 

दिग्गज और अल्पसंख्यक नेताओं की बड़ी बगावत
इस विद्रोह की सबसे खास बात यह है कि इसमें ममता बनर्जी के पुराने और सबसे भरोसेमंद सिपहसालार शामिल हैं. बागी गुट में पूर्व मंत्री जावेद खान, शूलि साहा, वीरभूम के कद्दावर नेता काजल शेख, पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा, मुर्शिदाबाद के विधायक नियामत शेख, सामशेरगंज के विधायक मोहम्मद नूर आलम, उत्तर दिनाजपुर के विधायक गुलाम रब्बानी, डोमजूर के विधायक तापस मैती और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं. मालदा की विधायक और पूर्व मंत्री साबीना यास्मीन ने खुलेआम ऋतब्रता बनर्जी का समर्थन कर दिया है. इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों के अधिकांश अल्पसंख्यक विधायक भी इसी बागी गुट के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। 

फर्जी हस्ताक्षर पर छिड़ी कानूनी जंग
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा
कानूनी मोड़ तब आया, जब अभिषेक बनर्जी की तरफ से विधानसभा भेजे गए एक पत्र पर बागी विधायकों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगा दिया. ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा ने स्पीकर से लिखित शिकायत की है कि विधायकों की मर्जी के बिना उनके दस्तखत का गलत इस्तेमाल किया गया है. इस गंभीर शिकायत के बाद राज्य की सीआईडी (CID) ने मामले की जांच शुरू कर दी है। 

TMC में बगावत की अटकलों के बीच ममता बनर्जी का बड़ा फैसला, सभी कमेटियां भंग

कोलकत्ता 
 पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टूटने और महाराष्ट्र की तरह पार्टी के सिंबल पर कब्जे की खबरों के बीच ममता बनर्जी के सबसे वफादार शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने मोर्चा संभाल लिया है. टीएमसी के पहले निर्वाचित विधायक और विधानसभा में मनोनीत नेता प्रतिपक्ष (LoP) चट्टोपाध्याय ने मंगलवार को दल-बदल और बगावत की सभी अटकलों को खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस का बहुमत आज भी ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ा है. संगठन पर पार्टी के पुराने वफादारों का ही नियंत्रण रहेगा। 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने बड़ा एक्शन लेते हुए तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियों, पार्टी से जुड़े संगठनों को तत्काल प्रभाव से विलय कर दिया है. टीएमसी ने कहा है कि सभी कमेटियों और फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन का पुनर्गठन किया जाएगा। 

टीएमसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा है कि गहन विचार-विमर्श के बाद, यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां, साथ ही इसके सभी अनुषांगिक संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे। 

TMC ने कहा कि पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कार्य-निष्पादन समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन की एक व्यापक प्रक्रिया चलाएगी. इस प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर मुख्य संगठन और सभी अनुषांगिक संगठनों की संगठनात्मक संरचना का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी। 

पार्टी अपने संगठन को सुदृढ़ बनाने और उसे नए उत्साह तथा उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने हेतु पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बता दें कि बंगाल विधानसभा में हार के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को TMC में फूट का सामना करना पड़ रहा है. कुछ आनुषांगिक संगठन आलाकमान के फैसले से इतर दूसरे गुट के फैसलों के साथ सहमति जता रहे हैं।

टीएमसी ने भंग की सारी कमेटियां और संगठन
तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी कमेटियों के साथ-साथ अपने सभी फ्रंटल संगठनों को भी तत्काल प्रभाव से भंग करने का फैसला किया है. पार्टी ने कहा कि अब वह एक विस्तृत आंतरिक समीक्षा करेगी, जिसमें सभी स्तरों पर कामकाज और संगठनात्मक कार्यप्रणाली का मूल्यांकन शामिल होगा. इस प्रक्रिया के नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और उससे जुड़े सभी विंग्स के लिए एक नए सिरे से तैयार संगठनात्मक ढाँचे की घोषणा बाद में की जाएगी। 

पार्टी ने एक बयान में कहा, ‘गहन विचार-विमर्श के बाद, यह फैसला किया गया है कि पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियां, और साथ ही उसके सभी फ्रंटल संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएँगे. पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कामकाज की समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन का एक व्यापक अभियान चलाएगी. इस प्रक्रिया से सामने आए नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और सभी फ्रंटल संगठनों के संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी। 

उन्होंने आगे कहा, ‘पार्टी अपने संगठन को मज़बूत करने और उसे नए जोश और उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। 

TMC के 16 फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन हैं.
टीएमसी की फ्रंटल संगठन की संख्या लगभग 16 है. आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ये संगठन पार्टी के विभिन्न वर्गों जैसे युवा, महिला, छात्र, मजदूर आदि को संगठित करते हैं।  

कमेटियों की बात करें तो इसमें TMC की मुख्य कार्यकारी कमेटी है. इसके अलावा कोर कमेटी, स्टेट कमेटी, जिला और ब्लॉक कमेटी और अनुशासन समिति है. अब इन सभी का विलय कर दिया गया है और कमेटियों का गठन किया जाएगा।  

पैसे और सत्ता के दम पर बगावत कराने की कोशिश : शोभनदेव
शोभनदेव चट्टोपाध्याय का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब निष्कासित और बागी नेताओं (ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा) के गुट 20 से 50 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं. शोभनदेव ने इन दावों के पीछे की इनसाइड स्टोरी को उजागर करते हुए गंभीर आरोप लगाये। 

नेता विपक्ष के पद के लिए 58 विधायकों ने रीताब्रता बनर्जी का समर्थन किया
टीएमसी विधायकों की बैठक के बाद 58 सदस्यों के हस्ताक्षरों वाला एक संयुक्त पत्र विधानसभा स्पीकर को सौंपा गया है, जिसमें विपक्ष के नेता के तौर पर रीतातब्रता बनर्जी के नाम का प्रस्ताव किया गया है। 

 टीएमसी के करीब 60 विधायक बैठक के लिए विधानसभा पहुंचे
टीएमसी के 80 विधायकों में से लगभग 60 विधायक बैठक के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे, जिससे इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं कि वे शायद विधायक दल पर नियंत्रण हासिल करने और विपक्ष के नेता के पद पर दावा ठोकने की कोशिश कर सकते हैं। 

तो ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 टीएमसी विधायकों का सपोर्ट?
रिताब्रता बनर्जी ने 59 टीएमसी विधायकों के समर्थन का दावा किया है. ऐसे में अगर बनर्जी के बताए नंबर सही हैं, तो इससे विधानसभा के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव दिखेगा, जिससे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 MLAs का सपोर्ट बचेगा. हालांकि, इन दावों को अलग से वेरिफाई नहीं किया गया है, और तृणमूल कांग्रेस ने भी अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। 

बंगाल की राजनीति में बड़ा ‘खेला’! ममता बनर्जी को लग सकता है बड़ा झटका, 60 विधायक आज उठाएंगे बड़ा कदम

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल के सियासी अखाड़े से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और बड़ी खबर सामने आ रही है. मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ी टूट की स्क्रिप्ट लगभग पूरी लिखी जा चुकी है. तृणमूल के करीब 60 असंतुष्ट और बागी विधायक आज यानी बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर रथींद्र बोस को एक सामूहिक आवेदन सौंप सकते हैं. इस बड़े कदम के साथ बागी गुट खुद को ‘असली टीएमसी’ बताने और पार्टी के सिंबल पर दावा ठोकने की फिराक में है, जिससे बंगाल में ‘महाराष्ट्र मॉडल’ का खेल अब हकीकत बनता नजर आ रहा है। 

60 विधायकों का आज स्पीकर दफ्तर में महाधमाका
कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में इस बात की भयंकर चर्चा है कि बागी विधायकों ने अंदरखाने अपनी पूरी तैयारी मुकम्मल कर ली है. बागी गुट के नेताओं का दावा है कि उन्होंने 80 में से करीब 60 विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक गुप्त आवेदन तैयार किया है. ये विधायक आज ही स्पीकर से मिलकर उन्हें यह दस्तावेज सौंपेंगे. इस आवेदन में साफ तौर पर हाल ही में पार्टी से निष्कासित किए गए कद्दावर नेता और विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नया नेता (नेता प्रतिपक्ष) मानने की बात कही गई है. इस बड़े घटनाक्रम से ममता बनर्जी कैंप में भारी हड़कंप मच गया है। 

दो-तिहाई बहुमत जुटाकर दल-बदल कानून को मात
किसी भी क्षेत्रीय दल में बगावत के वक्त सबसे बड़ा रोड़ा दल-बदल विरोधी कानून होता है. कानून के मुताबिक, बगावत करने वाले गुट को कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए कुल विधायकों के दो-तिहाई हिस्से की जरूरत होती है. टीएमसी के पास वर्तमान में कुल 80 विधायक हैं, जिसका मतलब है कि बागी गुट को कम से कम 54 विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. बागी नेताओं का दावा है कि उनके पास 60 विधायकों का आंकड़ा है, जो कि इस जरूरी संख्या से कहीं ज्यादा है. अगर ऐसा हुआ तो ममता बनर्जी की पार्टी कानूनी रूप से दो फाड़ हो जाएगी। 

भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से भड़की बड़ी आग
पार्टी के भीतर इस कदर भड़की इस भयंकर बगावत की असली वजह भी अब खुलकर सामने आने लगी है. बागी गुट के नेताओं और सस्पेंड चल रहे टीएमसी नेता रिजु दत्ता का कहना है कि पार्टी के विधायक राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और उनके कॉरपोरेट स्टाइल (आई-पैक) से बुरी तरह नाराज चल रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव में हार के ठीक बाद 6 मई को बुलाई गई बैठक में विधायकों से जबरन अभिषेक बनर्जी के स्वागत में खड़े होकर तालियां बजवाई गईं, जिसने विधायकों के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचाई और वहीं से बगावत के बीज बो दिए गए। 

ऋतब्रत बनर्जी को ‘असली टीएमसी’ का नेता बनाने की जिद
पार्टी से हाल ही में निकाले गए ऋतब्रत बनर्जी अब इस पूरे बागी गुट के नए चेहरे बनकर उभरे हैं. बागी नेताओं का साफ कहना है कि जो टीएमसी ममता बनर्जी ने जमीनी स्तर पर बनाई थी, उसे कॉरपोरेट कंपनी की तरह चलाया जाने लगा, जिसे जनता और विधायकों ने पूरी तरह खारिज कर दिया. बागी गुट के अनुसार, वे ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ के रूप में काम करेंगे और ममता बनर्जी को सम्मान देते हुए भी इस नए और युवा नेतृत्व के साथ आगे बढ़ेंगे। 

बीजेपी नेता तापस रॉय का दावा- टीएमसी के टुकड़े-टुकड़े
इस पूरे मामले पर राज्य की सत्तारूढ़ बीजेपी ने भी टीएमसी को आड़े हाथों लिया है. सुवेंदु अधिकारी कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्री और बीजेपी नेता तापस रॉय ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस अब ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. उन्होंने दावा किया कि बंगाल में ठीक वैसा ही खेल हो चुका है जैसा महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ हुआ था. दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के वफादार शोभनदेव चट्टोपाध्याय का अब भी दावा है कि पुराने नेता और बहुसंख्यक विधायक ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। 

कर्नाटक में सियासी कलह रोकने की कवायद, डीके और सिद्धारमैया को साधने में जुटी दिल्ली

नई दिल्ली

कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. बुधवार शाम चार बजे डीके शिवकुमार सीएम पद की शपथ लेंगे और 13 नेता कैबिनेट मंत्री बनाए जाएंगे.डीके शिवकुमार के अगुवाई वाली सरकार कैसे चलेगी, उसकी पूरी रूपरेखा दिल्ली में तय कर ली गई है. सीएम की कुर्सी छोड़ने वाले सिद्धारमैया को साधे रखने का ही नहीं बल्कि दिल्ली की राजनीति में अहम भूमिका की पटकथा लिख दी गई है। 

कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया को मंगलवार को पार्टी के भीतर सबसे शक्तिशाली और सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था कांग्रेस कार्य समिति का स्थायी सदस्य नियुक्त किया है.सिद्धारमैया का यह प्रमोशन न केवल उनके कद को दर्शाता है,बल्कि यह भी साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में वे दिल्ली की राजनीति में एक बड़ी राष्ट्रीय भूमिका मिलने जा रही है। 

सवाल उठता है कि क्या सिद्धारमैया कांग्रेस के आलाकमान के इस निर्णय से खुश होंगे क्योंकि, उनका मन तो राज्य की राजनीति में रहना था. उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद कहा था कि उनको राष्ट्रीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है और राज्य में ही रहकर जनता की सेवा करनी है. ऐसे में कांग्रेस ने डीके सरकार और सिद्धारमैया के बीच सियासी संतुलन बनाए रखने का खाका दिल्ली में ही खींच दिया है ताकि कर्नाटक में किसी तरह का सियासी नाटक न हो सके? 

दिल्ली में लिखी गई कर्नाटक की पटकथा
कर्नाटक की कमान अब पूरी तरह से नए हाथों में सौंप दी गई है. डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे. मंगलवार को शिवकुमार और सिद्धारमैया मंगलवार को दिल्ली में थे. कर्नाटक में बनने जा रहे नए मंत्रिमंडल के स्वरूप को लेकर कांग्रेस हाईकमान से मीटिंग करनी थी, जिसके लिए इंतजार कर रहे थे। 

हमेशा की तरह, मैं मंगलवार को कर्नाटक भवन पहुंचा, जो राज्य की सियासी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है. कर्नाटक भवन में कांग्रेस नेताओं से ऑन-रिकॉर्ड और ऑफ-रिकॉर्ड मुलाकात हुई.इनमें एचके पाटिल और ईश्वर खंडारे भी शामिल थे, जो सिद्धारमैया की पिछली कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री थे. एक बात साफ ज़ाहिर थी कि सिद्धारमैया के जाने के बाद पिछली कैबिनेट में उनके वफ़ादार रहे नेताओं में थोड़ी घबराहट थी कि उन्हें नई कैबिनेट में जगह मिलेगी या नहीं। 

सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की मंगलवार को दोपहर सवा एक बजे कांग्रेस हाईकमान के साथ मीटिंग हुई. इस मीटिंग में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे भी शामिल थे. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार अपनी-अपनी पसंद के नामों के साथ मीटिंग में गए थे, जिन पर वे पहले ही केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला के साथ चर्चा कर चुके थे।  

शिवकुमार सरकार के कौन होंगे सिपहसलार
कांग्रेस हाईकमान के साथ सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की मीटिंग हुई. इस उच्च-स्तरीय बैठकों के दौरान कैबिनेट के लिए जिन नामों पर मुहर लगी है, उनके आधार पर लगभग 13 मंत्री बनाए जा सकते हैं. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के खेमों के बीच संतुलन बनाते हुए कांग्रेस हाई कमान ने केजी जॉर्ज, जी परमेश्वर, रामलिंगा रेड्डी, केबी गौड़ा, यूटी खादर, एमपी पाटिल, सतीश जारकीहोली, प्रियंका खड़गे, यतींद्र और केएच मुनियप्पा की बेटी रूपा श्रीधर जैसे नामों को कैबिनेट में शामिल करने मंज़ूरी दे दी है। 

डीके सरकार में साफ है कि शुरुआत अनुभवी मंत्रियों के साथ की जाए, लेकिन सूत्रों के अनुसार कैबिनेट को एक नया रूप और कलेवर दिया जाएगा. शिवकुमार की कैबिनेट में कुछ नए चेहरों को शामिल करवाएंगे ताकि मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ ‘सत्ता-विरोधी लहर’ को कम किया जा सके. शिवकुमार के साथ-साथ 13 मंत्रियों के शपथ लेने की संभावना है. इसके बाद कैबिनेट का बाक़ी विस्तार 8 जून के बाद हो सकता है. राज्यसभा चुनावों के संपन्न होने के बाद कैबिनेट विस्तार होगा ताकि पार्टी के सभी नेता एकजुट और वफ़ादार बने रहें। 

नए प्रदेश अध्यक्ष का एजेंडा फाइनल
डीके शिवकुमार के सीएम बनने के साथ ही कर्नाटक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का पद खाली हो गया है. कैबिनेट के गठन के बाद दूसरी प्राथमिकता नए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करना है. सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने इस अहम पद के लिए सतीश जारकीहोली से संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वह प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तभी स्वीकार करेंगे जब इसके साथ उन्हें कैबिनेट में कोई मंत्रालय भी दिया जाए। 

सूत्रों ने बताया कि चूंकि ऐसा होने की संभावना कम है, इसलिए पार्टी अब उनके अलावा ईश्वर खंड्रे और बीके हरिप्रसाद जैसे अन्य नेताओं के नाम पर भी विचार कर रही है. कर्नाटक में अब मुख्यमंत्री एक प्रभावशाली जाति से आते हैं, इसलिए पार्टी चाहती है कि राज्य इकाई का नेतृत्व कोई OBC, ST या SC नेता करे, ताकि सामाजिक समीकरणों के बारे में सही संदेश दिया जा सके. बीजेपी पहले ही कांग्रेस का मज़ाक उड़ा रही है कि उन्होंने जातिगत भेदभाव के चलते अपने एकमात्र OBC मुख्यमंत्री को हटाकर एक सामान्य जाति के नेता के लिए रास्ता साफ कर दिया है। 

राज्यसभा और एमएलसी चुनाव
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि राज्यसभा की 3 सीटों के लिए 80 से ज़्यादा दावेदार है  जबकि MLC की 7 सीटों के लिए 200 से ज़्यादा दावेदार हैं. ऐसे में राज्यसभा की सीटों के लिए केवल एक नाम लगभग तय माना जा रहा है और वह है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का. इसके अलावा बाकी दो सीटों के लिए YS शर्मिला, सिद्धारमैया, केजे जॉर्ज, वीवी श्रीनिवास और मंसूर अली खान जैसे नामों पर चर्चा चल रही है। 

MLC के लिए बीके हरिप्रसाद का नाम भी लगभग तय माना जा रहा है, जबकि वरिष्ठ दलित नेता और पूर्व सांसद एल हनुमंतैया और अनुभवी शिया नेता आगा सुल्तान के नामों की भी चर्चा हो रही है, पार्टी अगले 24-48 घंटों में नामों को अंतिम रूप देने का फैसला ले सकती है। 

सिद्धारमैया के लिए राष्ट्रीय रोल की तैयारी
सिद्धारमैया को CWC में शामिल करना कांग्रेस की उस दूरगामी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में काफी समय से थी. पहले सिद्धारमैया ने साफ तौर पर कहा था कि वे कर्नाटक की राजनीति छोड़कर केंद्र की राजनीति में नहीं जाना चाहते। 

कांग्रेस आलाकमान द्वारा उन्हें राज्यसभा भेजने के प्रस्ताव को भी उन्होंने ठुकरा दिया था. लेकिन सूत्रों के अनुसार कांग्रेस पार्टी उन्हें 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले एक राष्ट्रीय स्तर के चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती थी. CWC की सदस्यता देकर पार्टी ने उन्हें बिना राज्यसभा भेजने की तैयारी में है ताकि ओबीसी समुदाय को कर्नाटक के साथ-साथ देशभर में साधे रखा जा सके। 

तमिलनाडु की राजनीति में विजय vs अन्नामलाई की चर्चा तेज, क्या दोहराएगा MGR-करुणानिधि जैसा इतिहास?

चेन्नई 

तमिलनाडु में भाजपा के फायरब्रांड नेता अन्नामलाई ने बड़ा फैसला ले लिया है. अन्नामलाई ने सस्पेंस से पर्दा हटाते हुए भाजपा से अलग होने का मन बना ही लिया है. जी हां, पूर्व तमिलनाडु बीजेपी प्रमुख के. अन्नामलाई ने आज यानी मंगलवार को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंप दिया. हालांकि उम्मीद है कि वे शाम 4 बजे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मिलेंगे. अमित शाह से मुलाकात में ही फाइनल फैसला हो पाएगा। 

भाजपा चीफ नितिन नबीन और संगठन सचिव बीएल संतोष के साथ अहम बैठक में अन्नामलाई ने कथित तौर पर पार्टी से अच्छे संबंधों के साथ अलग होने की इच्छा जताई. उन्होंने पार्टी नेतृत्व से कहा कि वे अब अपना रास्ता खुद बनाना चाहते हैं. हालांकि, बीजेपी नेतृत्व उन्हें मनाने की कोशिश कर रहा है और उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई भूमिका भी तय की जा सकती है. सूत्रों के मुताबिक, अन्नामलाई को अगली सूचना तक दिल्ली न छोड़ने के लिए कहा गया है। 

तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक उलटफेर
अगर अन्नामलाई का इस्तीफा मंजूर होता है तो यह भाजपा के लिए बड़ा झटका होगा. बीजेपी से अन्नामलाई का जाना राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, खासकर अभिनेता से नेता बने विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद. अन्नामलाई के करीबी सूत्रों के मुताबिक, उनका मानना है कि विजय के राजनीतिक ताकत बनने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है. आज विजय से लड़ने के लिए कोई नेता नहीं है. द्रविड़ युग खत्म हो गया है. अब सिर्फ भाषा आधारित राजनीति नहीं चलेगी. राज्य की राजनीति बदल चुकी है। 

ऐसी अटकलें तेज थीं कि अन्नामलाई सहमति से पार्टी छोड़ना चाहते हैं. रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि अब वे बीजेपी में अपना भविष्य नहीं देख रहे हैं. अन्नामलाई को नैनार नागेन्द्रन के तमिलनाडु बीजेपी प्रमुख बनने के बाद से कम सक्रिय देखा जा रहा था. गौरतलब है कि तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई के राजनीतिक भविष्य को लेकर बीते कुछ दिनों से अटकलों का बाजार गर्म है। 

क्यों अटकलों का बाजार हुआ गर्म
दरअसल कोयंबटूर में उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए विशाल पोस्टरों से अफवाहें फैल रही हैं कि वे एक अलग राजनीतिक मंच बनाने जैसी कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल करने की तैयारी कर रहे हैं. 4 जून को अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले प्रमुख सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर ‘हमारे नेता, आइए और हमारा नेतृत्व कीजिए’ जैसे नारों वाले ये पोस्टर लगाए गए थे। 

अन्नामलाई ने क्यों कहा था 2 दिन इंतजार कीजिए
दिल्ली रवाना होने से पहले अन्नामलाई ने अपने बारे में चल रही अटकलों पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने कहा कि कृपया प्रतीक्षा करें. हम दो दिन में बैठकर बात करेंगे. इस टिप्पणी ने संभावित घोषणा को लेकर उत्सुकता को और बढ़ा दिया है। 

कौन हैं अन्नामलाई?
भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी अन्नामलाई 2020 में भाजपा में शामिल हुए और तेजी से तमिलनाडु में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बन गए. 2021 से 2025 तक राज्य भाजपा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई राज्यव्यापी अभियानों का नेतृत्व किया और युवा मतदाताओं और सोशल मीडिया फॉलोअर्स के बीच एक मजबूत समर्थन आधार बनाया। 

एक भी चुनाव नहीं लड़े
2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद उनके भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गईं, जिसमें भाजपा के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक होने के बावजूद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा. कक्षा नौ के छात्रों के लिए त्रिभाषा नीति को आगे बढ़ाने के केंद्र के फैसले की उनकी हालिया आलोचना ने भी राजनीतिक बहस छेड़ दी और पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंधों को लेकर नई अफवाहें पैदा कर दीं। 

41 साल के अन्नामलाई के पास समय और राजनीतिक ऊर्जा दोनों हैं.
जहां कुछ पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि अन्नामलाई भाजपा में अधिक प्रमुख भूमिका तलाश सकते हैं, वहीं अन्य का अनुमान है कि वे एक अलग राजनीतिक मंच बना सकते हैं. हालांकि, भाजपा नेताओं ने किसी भी विभाजन की अटकलों को खारिज कर दिया है, और उनका कहना है कि अन्नामलाई पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता बने रहेंगे. मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ उनकी बैठक निर्धारित होने के कारण, राजनीतिक विश्लेषक अन्नामलाई के अगले कदम को स्पष्ट करने वाले संकेतों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। 

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