ईरान पर ट्रंप का बड़ा संकेत, 24 घंटे में सैन्य कार्रवाई या समझौते पर फैसला संभव

नई दिल्ली

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने शनिवार को संकेत दिया कि ईरान के साथ जारी तनाव पर वे किसी बड़े फैसले के करीब हैं। अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सिओस के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ईरान के प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे हैं और रविवार तक यह तय कर लेंगे कि बातचीत को आगे बढ़ाना है या सैन्य कार्रवाई करनी है।

ट्रंप ने कहा कि स्थिति 50-50 पर है। या तो वे एक अच्छा समझौता कर लेंगे या फिर उन्हें पूरी तरह नष्ट कर देंगे। सीबीएस के साथ एक साक्षात्कार में ट्रंप ने कहा कि दोनों देश एक समझौते के बहुत करीब पहुंच रहे हैं, जो ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकेगा और उनके संवर्धित यूरेनियम को सुरक्षित रूप से संभालने की गारंटी देगा।

वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हलचल
राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, यूएई, मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान के नेताओं के साथ फोन पर बात करने की योजना बनाई है। दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिया कि ईरान वार्ता पर जल्द ही कोई खबर आ सकती है।

दूसरी ओर, ईरान ने भी एक 14-सूत्रीय समझौते के ढांचे को अंतिम रूप देने की बात कही है और अमेरिका के साथ संबंधों में सुधार की दिशा में संकेत दिए हैं, हालांकि अभी भी कुछ बिंदुओं पर मतभेद बरकरार हैं।

भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा FDI स्रोत बना अमेरिका
वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान, अमेरिका भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने मॉरीशस को पीछे छोड़ दिया है, जबकि सिंगापुर अभी भी भारत में निवेश करने वाला शीर्ष देश बना हुआ है। 2025-26 में अमेरिका से भारत में इक्विटी निवेश दोगुना होकर 11 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है।

निवेश का रुख अब बदल रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष में कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का क्षेत्र निवेश के मामले में सबसे आगे रहा, जिसने सेवा क्षेत्र को पीछे छोड़ दिया है। डेटा सेंटर्स में हो रहे भारी निवेश को इसका एक मुख्य कारण माना जा रहा है।

तुलसी गबार्ड ने ट्रंप कैबिनेट से दिया इस्तीफा, अचानक फैसले से अमेरिकी राजनीति में हलचल

वाशिंगटन

 तुलसी गबार्ड ने अमेरिका के नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया है. गबार्ड ने इस्तीफे के पीछे अपने पति को कैंसर होने की पारिवारिक वजह का हवाला दिया है. तुलसी का यह इस्तीफा आगामी 30 जून से प्रभावी हो जाएगा. उनके हटने के बाद अब प्रिंसिपल डिप्टी डायरेक्टर एरॉन लुकास कार्यवाहक डायरेक्टर के तौर पर खुफिया विभाग का जिम्मा संभालेंगे। 

भले ही ट्रंप ने तुलसी गबार्ड के फैसले का सम्मान करते हुए उनकी तारीफों के पुल बांधे हों, लेकिन अमेरिकी सियासी गलियारों में इस इस्तीफे को लेकर कयासों का बाजार बेहद गर्म है. हर कोई यह सवाल पूछ रहा है कि क्या यह वाकई सिर्फ एक पारिवारिक संकट है या फिर इसके पीछे व्हाइट हाउस के भीतर चल रही कोई बड़ी सियासी अनबन? 

ये महज कयास नहीं है बल्कि ऐसे कई तथ्य है जो इस ओर इशारा करते हैं कि ट्रंप और तुलसी के बीच रिश्ते अब पहले की तरह सहज नहीं रहे थे। दरअसल, तुलसी गबार्ड का जाना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका इसलिए भी है, क्योंकि महज दो महीने पहले ही उनके बेहद करीबी सहयोगी और पूर्व नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। 

तुलसी गबार्ड का इस्तीफा कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह ट्रंप कैबिनेट में लगातार हो रहे बदलावों की कड़ी का हिस्सा है. गबार्ड इस साल ट्रंप प्रशासन छोड़ने वाली चौथी कैबिनेट सदस्य बन गई हैं. उनसे ठीक पहले इसी साल अप्रैल में श्रम मंत्री लोरी चावेज-डीरेमर ने अपने पद से किनारा कर लिया था. इतना ही नहीं, होमलैंड सिक्योरिटी मिनिस्टर क्रिस्टी नोएम और अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी जैसी ताकतवर महिलाएं भी इस साल ट्रंप प्रशासन से अलग हो चुकी हैं। 

बड़े फैसलों से ‘गायब’ थीं तुलसी, ईरान पर बढ़ गई थी तल्खी
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है. नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर जैसे बेहद संवेदनशील और शीर्ष पद पर होने के बावजूद तुलसी गबार्ड पिछले कुछ समय से अमेरिकी सरकार के बड़े फैसलों में कम ही सक्रिय दिखाई दे रही थीं. खासकर ऐसे वक्त में जब अमेरिका ने ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों के खिलाफ बेहद कड़े और आक्रामक कदम उठाए, तब खुफिया प्रमुख के तौर पर तुलसी गबार्ड की भूमिका सबसे अहम होनी चाहिए थी, लेकिन वे परिदृश्य से लगभग गायब रहीं। 

यह महज कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस नीतिगत टकराव थे. अपने पूरे राजनीतिक करियर के दौरान तुलसी गबार्ड की छवि एक ऐसी नेता की रही है जो विदेशों में अमेरिकी सेना के हस्तक्षेप और युद्धों का कड़ा विरोध करती आई हैं. ऐसे में जब राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर कड़ा रुख अपनाते हुए सैन्य कार्रवाई और हमलों का फैसला किया, तो प्रशासन के भीतर तुलसी गबार्ड के साथ उनका तनाव साफ तौर पर खुलकर सामने आ गया था। 

तुलसी गबार्ड के इस्तीफे पर क्या बोले ट्रंप
वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुलसी गबार्ड के इस्तीफे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्रूथ सोशल पर लिखा, ‘दुर्भाग्य से, शानदार काम करने के बाद तुलसी गबार्ड 30 जून को प्रशासन छोड़ रही हैं। उनके प्यारे पति अब्राहम को हाल ही में हड्डी के कैंसर का दुर्लभ डायग्नोसिस हुआ है। वे सही मायने में उनके साथ रहना चाहती हैं ताकि उन्हें अच्छा स्वास्थ्य वापस दिला सकें। वे इस कठिन लड़ाई को साथ मिलकर लड़ रहे हैं। मुझे कोई शक नहीं है कि वह जल्द ही पहले से भी बेहतर हो जाएंगे।’

उन्होंने कहा कि तुलसी ने अद्भुत काम किया है और हम उन्हें बहुत मिस करेंगे। उनके बेहद सम्मानित प्रिंसिपल डिप्टी डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस, एरॉन लुकास अब एक्टिंग डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस के रूप में कार्य करेंगे।

तुलसी गबार्ड के बारे में जानिए
तुलसी गबार्ड का जन्म 12 अप्रैल 1981 को अमेरिकन समोआ में हुआ था। उन्होंने हवाई से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में चार बार सांसद के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी छोड़ दी और 2024 के अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया। इसके बाद उन्हें 2025 में अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक बनाया गया। तुलसी गबार्ड का भारत से सीधा पारिवारिक संबंध नहीं है, क्योंकि वे भारतीय मूल की नहीं हैं। हालांकि उनका हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है। उनकी मां हिंदू धर्म से प्रभावित थीं और उन्होंने अपने सभी बच्चों को संस्कृत नाम दिए। तुलसी नाम हिंदू धर्म में पवित्र पौधे से जुड़ा है।

भगवद गीता और वैष्णव परंपरा से प्रभावित
तुलसी गबार्ड बचपन से ही भगवद गीता और वैष्णव परंपरा से प्रभावित रही हैं। वे अमेरिकी कांग्रेस में चुनी जाने वाली पहली हिंदू-अमेरिकी महिला बनीं और उन्होंने शपथ भी भगवद गीता पर ली थी। भारत के साथ उनके रिश्ते राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर मजबूत रहे हैं। उन्होंने कई बार भारत का दौरा किया और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने की वकालत की। 2014 में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवद गीता की प्रति भेंट की थी। वे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के समर्थन में भी खुलकर सामने आई थीं। मार्च 2025 में उन्होंने भारत का दौरा कर आतंकवाद और सुरक्षा सहयोग पर भारतीय अधिकारियों से चर्चा की थी। हिंदू पहचान और भारत के प्रति सकारात्मक रुख के कारण भारत में भी उनकी काफी चर्चा होती रही है।

जब ट्रंप ने गबार्ड के दावों को सरेआम किया था खारिज
ट्रंप और तुलसी गबार्ड के बीच की यह तल्खी और असहजता कोई नई बात नहीं है. पिछले साल अमेरिकी कांग्रेस के सामने दोनों के बीच का यह वैचारिक मतभेद पूरी दुनिया ने देखा था। 

गबार्ड ने खुफिया इनपुट्स के आधार पर एक बयान दिया था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपनी ही खुफिया प्रमुख के इस बयान को खारिज कर दिया था. तब ट्रंप ने कहा था, “मुझे फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने (तुलसी गबार्ड) क्या कहा है. मुझे लगता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब था। 

इवांका ट्रंप की हत्या की साजिश का खुलासा! IRGC पर लगा सनसनीखेज आरोप

वाशिंगटन

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप की हत्या की खौफनाक साजिश का पर्दाफाश हुआ है. ईरान की सेना ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) से ट्रेनिंग पाए एक खतरनाक आतंकवादी ने इवांका ट्रंप की जान लेने का पूरा प्लान तैयार कर लिया था।’द पोस्ट’ अखबार को मिली जानकारी के मुताबिक, ये आतंकी छह साल पहले अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए अपने गुरु और ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था। 

सुरक्षा एजेंसियों ने इवांका ट्रंप की हत्या का प्लान बना रहे आतंकी को पकड़ लिया है. उसकी पहचान 32 साल के मोहम्मद बाकर साद दाऊद अल-सादी के तौर पर हुई है. वो इराकी नागरिक बताया जा रहा है। 

कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता था आतंकी
दरअसल 6 साल पहले बगदाद में डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिका ने एक बड़े ऑपरेशन में ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था. अल-सादी इस हमले को अपने गुरु की मौत मानता था और तभी से ट्रंप परिवार को तबाह करने की फिराक में था। 

आरोपी अल-सादी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परिवार, खासकर उनकी बेटी इवांका ट्रंप को जान से मारने की कसम खाई थी. जांच के दौरान सुरक्षा बलों को अल-सादी के पास से फ्लोरिडा में मौजूद इवांका ट्रंप के आलीशान घर का पूरा ब्लूप्रिंट भी बरामद हुआ है. वो काफी समय से उनके घर की रेकी कर रहा था। 

‘हमें इवांका को मारना होगा’— मिला आलीशान घर का ब्लूप्रिंट
जांच एजेंसियों को आरोपी अल-सादी के पास से फ्लोरिडा में मौजूद इवांका ट्रंप के आलीशान घर का पूरा ब्लूप्रिंट बरामद हुआ है, जिससे साफ है कि वह लंबे समय से रेकी कर रहा था। वाशिंगटन में इराकी दूतावास के पूर्व डिप्टी मिलिट्री अटैची एंतिफाध कनबर ने बताया कि सुलेमानी की मौत के बाद अल-सादी अक्सर कहता था, “हमें इवांका ट्रंप को मारना होगा और ट्रंप के पूरे घर को उसी तरह जलाकर खाक करना होगा, जैसे उसने हमारे कमांडर को तबाह किया।” फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां आतंकी से पूछताछ कर रही हैं।

सोशल मीडिया पर दी थी खुली धमकी
इवांका ट्रंप और उनके पति जेरेड कुशनर के फ्लोरिडा स्थित 24 मिलियन डॉलर के घर की तस्वीरें और नक्शे इस आतंकी ने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किए थे। आतंकी ने सोशल मीडिया (X और स्नैपचैट) पर अरबी भाषा में लिखा था, ‘मैं अमेरिकियों से कहता हूं, इस तस्वीर को देखो और जान लो कि न तो तुम्हारे महल और न ही सीक्रेट सर्विस तुम्हारी रक्षा कर पाएगी। हम अभी निगरानी और विश्लेषण के चरण में हैं। हमारा बदला सिर्फ समय की बात है।’ अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) के अनुसार, वह अक्सर स्नैपचैट पर साइलेंसर लगी पिस्तौल की तस्वीरें भेजकर अपने टारगेट को डराता था।

अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice – DoJ) के अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, अल-सादी कोई आम अपराधी नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका में हुए 18 आतंकी हमलों और नाकाम कोशिशों का मुख्य साजिशकर्ता है।

उस पर मार्च में एम्स्टर्डम में ‘बैंक ऑफ न्यूयॉर्क मेलन’ पर फायरबम फेंकने, अप्रैल में लंदन में दो यहूदी नागरिकों पर चाकू से हमला करने और मार्च में ही टोरंटो में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर गोलीबारी कराने के गंभीर आरोप हैं। इसके अलावा वह बेल्जियम के लीज में एक सिनागॉग (यहूदी प्रार्थना स्थल) पर बमबारी और रॉटरडैम में आगजनी की साजिश में भी शामिल रहा है।

तुर्की में हुआ गिरफ्तार, सरकारी पासपोर्ट ने चौंकाया
सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जब अल-सादी को 15 मई को तुर्की में गिरफ्तार किया गया, तो उसके पास से इराक का ‘सर्विस पासपोर्ट’ (Service Passport) मिला। अल-सादी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक दौरों के नाम पर एक ट्रैवल एजेंसी चलाता था, जिसकी आड़ में वह दुनिया भर में घूमकर आतंकी नेटवर्क और स्लीपर सेल्स तैयार करता था।

फिलहाल, अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) के निर्देश पर आरोपी अल-सादी को ब्रुकलिन के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में कड़ी सुरक्षा के बीच एकांत कारावास (Solitary Confinement) में रखा गया है और आगे की पूछताछ जारी है।

‘हमें इवांका ट्रंप को मारना होगा’
वाशिंगटन में इराकी दूतावास के पूर्व डिप्टी मिलिट्री अटैची एंतिफाध कनबर ने इस आतंकी के इरादों के बारे में एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा, ‘कासिम सुलेमानी के मारे जाने के बाद, अल-सादी लोगों से कहता फिर रहा था कि हमें इवांका ट्रंप को मारना होगा. वो कहता था कि हमें ट्रंप के पूरे घर को उसी तरह जलाकर खाक कर देना चाहिए, जिस तरह उसने हमारे घर (कमांडर सुलेमानी) को तबाह किया था। 

हमजा के जनाजे में दहशत का पहरा! सलाउद्दीन-जमीन खान की AK-47 के साए में पहुंचे आतंकी

इस्लामाबाद

पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड और वांटेड आतंकी अर्जुनमंद गुलजार उर्फ ​​हमजा बुरहान की पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में अज्ञात बंदूकधारियों ने उसकी हत्या कर दी थी. अब उसके ‘नमाज-ए-जनाजा’ में कई बड़े आतंकी संगठनों के टॉप मोस्ट कमांडर और कुख्यात आतंकी खुलेआम शामिल हुए। 

हमजा को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दफनाया गया है. उसके जनाजे में भारत का मोस्ट वॉन्टेड और आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन का चीफ सैयद सलाउद्दीन खुद मौजूद था। इसके अलावा, प्रमुख आतंकी संगठन अल-बदर का टॉप कमांडर और चीफ बख्त जमीन खान भी हमजा को अंतिम विदाई देने पहुंचा था। 

जनाजे के दौरान कड़ी सुरक्षा
हमजा के जनाजे के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे. आतंकी संगठन अल-बदर के चीफ बख्त जमीन खान की सुरक्षा के लिए वहां दर्जनों आतंकी तैनात किए गए थे. ये सभी AK-47 और घातक हथियारों से पूरी तरह लैस थे, जो घेरा बनाकर बख्त जमीन खान की रखवाली कर रहे थे। 

हालांकि, इस भारी सुरक्षा और आधुनिक हथियारों के बीच वहां मौजूद सभी आतंकी कमांडरों के चेहरों पर अज्ञात हमलावरों का खौफ भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा था. हाल के दिनों में पाकिस्तान और PoK के भीतर कई बड़े आतंकियों की जिस तरह चुन-चुनकर हत्याएं हुई हैं, उससे इन आतंकी संगठनों के टॉप कमान के बीच भारी डर का माहौल है। 

आतंकी हमजा कौन था, कहां था?
दरअसल, हमजा बुरहान का नाम जम्मू-कश्मीर में कई आतंकी गतिविधियों और हमलों से जोड़ा जाता रहा है. सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से उसकी तलाश में जुटी थीं. 2022 में भारत सरकार ने उसे आतंकवादी घोषित किया था और कहा था, ‘अरजुमंद गुलजार डार उर्फ हमजा बुरहान उर्फ डॉक्टर खारबतपोरा, रत्नीपोरा, पुलवामा का निवासी था. वह अल-बद्र आतंकी संगठन का सहयोगी सदस्य था, जिसे यूएपीए के तहत प्रतिबंधित किया गया.’ उसकी उम्र महज 23-24 साल थी। 

पुलवामा में ही पैदा हुआ था आतंकी हमजा
आतंकी हमजा को डॉक्टर भी कहा जाता था. व
ह पुलवामा के रत्नीपोरा क्षेत्र में पैदा हुआ था. वह 2017 में यह कहकर पाकिस्तान गया था कि वह उच्च शिक्षा यानी एमबीबीएस के लिए जा रहा है, लेकिन बाद में वह आतंकी संगठन अल-बद्र में शामिल हो गया और जल्दी ही कमांडर बन गया. अल-बद्र में शामिल होने के बाद वह कश्मीर लौटा. उस पर दक्षिण कश्मीर में युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाने और उन्हें आतंकी संगठनों में शामिल करने का आरोप था. उसका नेटवर्क मुख्य रूप से दक्षिण कश्मीर में सक्रिय था। 

कश्मीर में कैसे खड़ा किया था आतंकी नेटवर्क
कश्मीर में रहने के दौरान उसने पुलवामा से शोपियां तक अपना नेटवर्क फैलाया. उसकी मौत को पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. वह उन प्रमुख लोगों में से था जो जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तान-आधारित आतंकी संगठनों के लिए काम करते थे. पुलवामा आतंकी हमला भारत के सबसे घातक हमलों में से एक था. 14 फरवरी 2019 को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सीआरपीएफ जवानों के काफिले पर हमला किया गया था. लेथपोरा क्षेत्र में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से लदे वाहन के साथ बस को टक्कर मार दी थी, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए थे। 

पुलवामा अटैक का बदला
यह हमला जैश-ए-मोहम्मद ने किया था और हमलावर की पहचान आदिल अहमद डार के रूप में हुई थी. इस हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया था. रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में पाकिस्तान में कई आतंकवादियों को अज्ञात बंदूकधारियों ने निशाना बनाया है. हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इन घटनाओं पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है और जांचों को लेकर भी खामोशी बरकरार रखी है। 

लश्कर-जैश में खलबली
बीते दो वर्षों में धुरंधर स्टाइल मर्डर से पाकिस्तान में हड़कंप है. कुछ सालों से ऐसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी होती देखी गई है. पाकिस्तान के शीर्ष आतंकियों और नेताओं को अज्ञाक द्वारा निशाना बनाए जाने से लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को दोबारा संगठित होने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद से इन दोनों आतंकी गुटों को काफी नुकसान झेलना पड़ा है. अपनी कारनामों को ये लोग अंजाम नहीं दे पा रहे हैं. ऐसी हत्याओं ने इनके मनोबल को काफी तोड़ा है और इससे जुड़ने वाले लोगों की संख्या भी घटी है। 

बता दें कि हमजा बुरहान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का बेहद करीबी माना जाता था. ISI में कर्नल रिजवान नाम का अधिकारी उसका मुख्य हैंडलर था, जो उसे भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए दिशा-निर्देश और वीआईपी सुरक्षा मुहैया कराता था. हमजा मुजफ्फरबाद में एक औद्योगिक परिसर से अपना पूरा नेटवर्क चलाता था, जिसे ‘माचिस फैक्ट्री’ कहा जाता है। 
यहां हमजा अल-बराक के पूर्व कमांडर फारूक कुरैशी के साथ मिलकर कश्मीर घाटी में ड्रग्स की तस्करी, जाली नोटों का रैकेट और हथियारों की सप्लाई का काला कारोबार कर रहा था। 

ईरान जंग का असर, UAE की चमक फीकी; करोड़ों कमाने वाली इंडस्ट्री का पलायन शुरू

दुबई

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने सिर्फ तेल बाजार या मिडिल ईस्ट की राजनीति को ही नहीं हिलाया, बल्कि दुबई जैसे ग्लोबल बिजनेस हब की बुनियाद तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. जिस UAE को पिछले कुछ सालों में दुनिया का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक्स और फाइनेंशियल सेंटर माना जाने लगा था, वहां अब शिपिंग सेक्टर से जुड़े कई विदेशी प्रोफेशनल्स दूसरे देशों में शिफ्ट होने की तैयारी कर रहे हैं। 

मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक, दुबई में काम कर रहे कई वेस्टर्न एक्सपैट्स अब ग्रीस की राजधानी एथेंस और साइप्रस जैसे देशों को विकल्प के तौर पर देख रहे हैं. इसकी वजह यही है कि होर्मुज स्ट्रेट में खतरा, जहाजों की आवाजाही में रुकावट और युद्ध के लंबे खिंचने का डर बना हुआ है। 

दरअसल, फरवरी में ईरान जंग शुरू होने के बाद से होर्मुज स्ट्रेट लगभग जाम जैसी स्थिति में पहुंच गया है. अमेरिका और ईरान दोनों अपनी-अपनी तरह से समुद्री नियंत्रण लागू कर रहे हैं, जिसकी वजह से करीब 2000 जहाज खाड़ी क्षेत्र में फंस गए. हालांकि इससे ग्लोबल शिपिंग रेट्स में भारी उछाल आया है और कई टैंकर कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन UAE की अर्थव्यवस्था पर इसका उल्टा असर पड़ रहा है। 

जेबेल अली पोर्ट पर कारोबार की रफ्तार धीमी
दुबई का जेबेल अली पोर्ट दुनिया के सबसे बड़े ट्रांसशिपमेंट हब्स में गिना जाता है, जहां एक जहाज से सामान दूसरे जहाज में ट्रांसफर होकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाता है. लेकिन युद्ध और ब्लॉकेड के कारण यहां कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ गई है. पूरे खाड़ी में ये पोर्ट 60% से भी ज्यादा के कार्गो को मैनेज करता है। 

UAE का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट यानी तेल भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, क्योंकि होर्मुज पर ईरान की पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, एक शिप ओनर ने कहा कि समस्या सिर्फ बिजनेस की नहीं है, बल्कि भरोसे की भी है. उनका कहना था, “अगर युद्ध बढ़ता है तो क्या दुबई से परिवार को सुरक्षित तरीके से लंदन या पेरिस भेज पाना आसान होगा? यही चिंता लोगों को परेशान कर रही है। 

दुबई के रियल एस्टेट सेक्टर पर भी जंग की मार
युद्ध का असर अब दुबई के रियल एस्टेट सेक्टर पर भी दिखने लगा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले महीनों में दुबई की हजारों प्रॉपर्टी एजेंसियां बंद हो सकती हैं. कई छोटी कंपनियां, जो तेजी से बढ़ते प्रॉपर्टी मार्केट और सट्टेबाजी वाले निवेश पर निर्भर थीं, अब टिक नहीं पा रही हैं। 

कोविड के बाद दुबई ने दुनिया भर के निवेशकों, क्रिप्टो कारोबारियों और अमीर प्रोफेशनल्स को आकर्षित किया था. टैक्स में छूट, आसान नियम और तेज ग्रोथ ने इसे ग्लोबल फाइनेंस हब बना दिया था. लेकिन अब ईरान जंग ने पहली बार इस मॉडल की कमजोरी को उजागर कर दिया है। 

हालांकि एक्सपर्ट्स मानते हैं कि UAE के पास अभी भी मजबूत आर्थिक संसाधन हैं और दुबई पूरी तरह कमजोर नहीं होगा, लेकिन यह साफ हो गया है कि होर्मुज संकट और क्षेत्रीय युद्ध ने खाड़ी की सबसे चमकदार अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। 

भारत-चीन रिश्तों में बड़ा बदलाव! 7 साल बाद दिल्ली दौरे पर आ सकते हैं शी जिनपिंग, BRICS में पुतिन भी होंगे शामिल

नई दिल्ली

भारत और चीन के रिश्ते में बहुत जल्द नया मोड़ देखने को मिल सकता है. भारत-चीन लगातार अपने संबंध सुधार रहे हैं. पीएम मोदी और शी जिनपिंग की कोशिशें रंग लाती दिख रही हैं. यही कारण है कि बीते कुछ समय में चीन-भारत के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघली है. अब भारत-चीन संबंध में नया मोड़ आया है. जी हां, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बहुत जल्द भारत आने वाले हैं. सूत्रों की मानें तो इसी साल सितंबर में शी जिनपिंग भारत का दौरा कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो बीते 7 साल में शी जिनपिंग की यह पहली भारत यात्रा होगी। 

 रिपोर्ट की मानें तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं. माना जा रहा है कि चीन की ओर से नई दिल्ली को सूचित किया गया है कि शी जिनपिंग के इस सम्मेलन में आने की संभावना है. यहां बताना जरूरी है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी ब्रिक्स समिट में शामिल होने के लिए दिल्ली में रहेंगे. रूसी साइड ने पुतिन के दिल्ली दौरे को कन्फ्रम बताया है। 

पुतिन भी आ रहे भारत
रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूसी अधिकारियों ने पुतिन की उपस्थिति की पुष्टि की है. वह 31 अगस्त और 1 सितंबर को किर्गिस्तान के बिश्केक में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भी शामिल होंगे. पीएम मोदी के भी एससीओ समिट में शामिल होने की संभावना है। 

2019 के बाद पहली यात्रा
बहरहाल, ब्रिक्स समिट में अगर शी जिनपिंग आते हैं तो 2019 के बाद उनकी यह पहली यात्रा होगी. शी जिनपिंग की ब्रिक्स समिट में भागीदारी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय होगा. आखिरी बार वह 2019 में भारत आए थे. अक्टूबर 2019 में वह चेन्नई के पास मामल्लापुरम में भारत-चीन नेताओं के दूसरे अनौपचारिक सम्मेलन में आए थे. उसके बाद गलवान हिंसा ने भारत-चीन के रिश्तों को बहुत खराब कर दिया। 

भारत-चीन के रिश्ते कैसे बिगड़े
जी हां, भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंध अप्रैल-मई 2020 में सीमा विवाद के बाद काफी बिगड़ गए थे. तब गलवान हिंसा हुई थी. इस गलवान संघर्ष ने चीन-भारत के संबंधों को बिगाड़ दिया था. इसके बाद तो तनातनी खूब चली. हालांकि, संबंधों को स्थिर करने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 में शुरू हुई. तब रूस के कजान शहर में ब्रिक्स समिट था. वहां मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. उसी समय दोनों देशों ने एलईएस सैनिकों की वापसी पूरी करने का फैसला किया था. तब से लगातार भारत और चीन के रिश्ते बेहतर हो रहे हैं। 

भारत-चीन के रिश्ते में 2019 के बाद क्या-क्या हुआ?
    भारत और चीन के रिश्तों में 2019 के बाद कई बड़े उतार-चढ़ाव आए. अक्टूबर 2019 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे. तमिलनाडु के महाबलीपुरम में उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई थी. दोनों देशों ने व्यापार, निवेश और सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने पर जोर दिया था. उस समय रिश्तों में नरमी दिखाई दी थी। 

    लेकिन जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हो गई. इस संघर्ष में दोनों देशों के सैनिक मारे गए और सीमा पर तनाव बहुत बढ़ गया. इसके बाद भारत ने चीन के कई मोबाइल ऐप बैन किए और सीमा पर सेना की तैनाती बढ़ा दी. दोनों देशों के रिश्ते कई साल तक तनावपूर्ण रहे। 

    इसके बाद धीरे-धीरे सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत शुरू हुई. अक्टूबर 2024 में रूस के कजान शहर में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी और जिनपिंग की मुलाकात हुई. इस बैठक में दोनों नेताओं ने सीमा विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने और रिश्तों को सामान्य बनाने पर सहमति जताई. इसके बाद दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें फिर तेज हुईं। 

 

ट्रंप को अपने ही छोड़ गए साथ? विरोधियों से बढ़ती नजदीकियों के बीच ईरान जंग पर बढ़ी सियासी चिंता

वाशिंगटन 

अमेरिका की सीनेट में  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा. ईरान युद्ध को सीमित करने वाले प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान उसके ही चार सांसदों ने अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स का साथ दे दिया. यह प्रस्ताव वॉर पॉवर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई की शक्तियों को सीमित करने से जुड़ा है. सीनेट में यह प्रस्ताव 50-47 वोटों से पास हुआ, जिसमें तीन रिपब्लिकन सांसद वोटिंग में शामिल नहीं हुए. रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी ने ट्रंप के खिलाफ वोट किया, वहीं डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। 

ये सिर्फ एक राजनीतिक एजेंडा नहीं था, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बुरा संकेत भी है. अब तक सिर्फ बयान आ रहे थे लेकिन इसे ट्रंप के खिलाफ उनकी ही पार्टी की ओर से एक दुर्लभ सार्वजनिक नाराजगी माना जा रहा है. अब तक रिपब्लिकन पार्टी और उसके समर्थक ईरान युद्ध में ट्रंप के साथ खड़े रहे हैं, लेकिन 81 दिन से जारी इस युद्ध का कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में पार्टी के भीतर भी नाराजगी नजर आने लगी है। 

ट्रंप को हटाने के लिए 25वें संशोधन की भी मांग
मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच कई बार ऐसे सवाल भी उठे हैं कि क्यों उन्हें संविधान का सहारा लेकर हटा न दिया जाए? डेमोक्रेट्स ने 25वें संशोधन की मांग की और डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी कई बार ये कह चुके हैं कि उपराष्ट्रपति और कैबिनेट को तुरंत 25वें संशोधन की धारा 4 लागू करनी चाहिए.अमेरिका के कई सांसद और नेता कह रहे हैं कि ट्रंप का ईरान युद्ध को लेकर बार-बार शब्द बदलना, रणनीति बदलना और यह गाली भरा पोस्ट लिखना, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठाता है. ईरान युद्ध में हजारों मौतें हो चुकी हैं और ट्रंप लगातार पूर्ण हवाई नियंत्रण का दावा करते हैं, लेकिन ईरानी हमले खत्म नहीं हो रहे. ऐसे में लोग चिंतित हैं कि राष्ट्रपति का यह व्यवहार देश और दुनिया के लिए खतरा बन सकता है। 

कैसे जा सकती है ट्रंप की कुर्सी?
इस सवाल का सीधा जवाब है – 25वां संशोधन और उसकी धारा 4. यह अमेरिकी संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो 1967 में राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी की हत्या के बाद पास किया गया. इसका मकसद होता है – अगर राष्ट्रपति मर जाए, इस्तीफा दे दे, हटा दिया जाए या अक्षम हो जाए तो उपराष्ट्रपति को सत्ता सौंपने की प्रक्रिया तय करना. इसकी धारा 4 की मांग की जा रही है। 

धारा 4: यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उपराष्ट्रपति और कैबिनेट के बहुमत (15 में से 8) को अधिकार है कि वे लिखित रूप से घोषणा करें कि राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं. इसके बाद उपराष्ट्रपति तुरंत एक्टिंग राष्ट्रपति बन जाता है. अगर राष्ट्रपति कहे कि वह ठीक है तो 4 दिन में कैबिनेट और उपराष्ट्रपति को कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत से साबित करना पड़ता है। 

बिना अमेरिकी हमले के ही ईरान को बड़ा झटका! Inflation Attack ने बढ़ाई टेंशन, अब क्या होगा?

तेहरान 

अमेरिका के साथ ईरान के सीजफायर के बावजूद तनाव बरकरार है, होर्मुज को लेकर घमासान जारी है और इसके साथ ही तेल-गैस को लेकर दुनिया की टेंशन भी हाई बनी हुई है. लेकिन एक ओर जहां मिडिल ईस्ट युद्ध ने अमेरिका में तेल की कीमतों में इजाफा किया है, तो वहीं तेल पर निर्भर खुद ईरान की इकोनॉमी को भी तगड़ा झटका लगा है. वर्ल्ड ऑफ स्टेटिस्टिक्स के मुताबिक, दुनिया के सबसे ज्यादा महंगाई दर वाले देशों की लिस्ट में ईरान वेनेजुएला के बाद दूसरे नंबर पर आ गया है। 

तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में भी आंकड़ों के साथ बीते कुछ दिनों में ईरान की गंभीर स्थिति को दर्शाया गया है कि युद्ध के बीच आसमान छूती महंगाई में ईरान के लोगों की खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट आ गया है. अब दुनिया में महंगाई से सबसे ज्यादा त्रस्त देशों की लिस्ट में भी ईरान ऊपर चढ़ता जा रहा है। 

वेनेजुएला के बाद ईरान का नंबर
वर्ल्ड ऑफ स्टेटिस्टिक्स के सोशल मीडिया पोस्ट पर नजर डालें, तो ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महंगाई दर वेनेजुएला में 612% है और इसके बाद अर्जेंटीना के बजाय अब ईरान का नाम शामिल है, जहां सालाना महंगाई दर 50% हो चुकी है। 

बीते सप्ताह आई एक रिपोर्ट में ईरान में महंगाई की मार की तस्वीर पेश करते हुए कहा गया था कि Iran Inflation की रफ्तार हालिया कुछ समय में सबसे ज्यादा रही है और ये लगातार ईरानियों को गरीब बना रही है. तेहरान की एक निवासी के हवाले से अल जजीरा की रिपोर्ट में कहा गया कि हम अब उन कुछ चीजों को खरीदने का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं, जो कुछ महीने पहले तक खरीद सकते थे. इसके पीछे वजह है कि युद्धग्रस्त ईरान में खासतौर पर खाद्य महंगाई (Iran Food Inflation) में आए उछाल के कारण लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरत के सामनों पर खर्च हो रहा है। 

इसमें आंकड़े देते हुए बताया गया था कि वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे अधिक 350% से ज्यादा, आयातित चावल की कीमतों में 200%, ईरानी चावल की कीमतों में 175% प्रतिशत और चिकन की कीमतों में 190%  की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

इन 10 देशों में महंगाई का कोहराम
दुनिया के तमाम देशों में सालाना महंगाई दर के आंकड़ों पर नजर डालें, तो जिन देशों में महंगाई सबसे ज्यादा कोहराम मचा रही है, उनकी टॉप-10 लिस्ट में पहले नंबर पर वेनेजुएला, जबकि दूसरे नंबर पर ईरान का नाम है. वहीं अन्य देशों की बात करें, तो अर्जेंटीना (32.4%), तुर्किए (32.37%), लेबनान (17.3%), नाइजीरिया (15.69%), इजिप्ट (14.9%), पाकिस्तान (10.9%), कजाखिस्तान (10.6%) और बांग्लादेश (9.05%) शामिल हैं। 

पाकिस्तान के दावे की खुली पोल, जिन एयरबेस पर फतह-1 मिसाइल दागने की बात कही वो मौजूद ही नहीं

इस्लामाबाद 

पाकिस्तान में जियो न्यूज चैनल ने हाल ही में एक इंटरव्यू चलाया, जिसमें ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस के दौरान फतह-1 मिसाइलें दागने वाले लॉन्च टीम के सदस्यों से बात की गई. इस इंटरव्यू में पाकिस्तानी अधिकारियों ने दावा किया कि उनकी मिसाइलों ने भारत के दो सैन्य ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया. लेकिन इस दावे पर सवाल उठ गए हैं, क्योंकि उन्होंने जिन एयरबेसों का जिक्र किया है, वो भारत में हैं हीं नहीं। 

जियो न्यूज ने उन व्यक्तियों का इंटरव्यू दिखाया जिन्हें फतह-1 मिसाइल लॉन्च टीम का हिस्सा बताया गया. एंकर ने उनसे सीधा सवाल किया कि क्या फतह-1 मिसाइलें अपने तय टारगेट पर सही से गिरीं या नहीं. इसपर कैप्टन मुनीब जमाल ने जवाब दिया- एग्जेटली. हमें दो टारगेट सौंपे गए थे – राजौरी एयरबेस और मामून एयरबेस. हमने दोनों को सफलतापूर्वक एंगेज किया। 

यह इंटरव्यू पाकिस्तान में काफी दिखाया गया, जिसमें दावा किया गया कि मिसाइलें सटीक रूप से अपने टारगेट पर पहुंचीं और मिशन सफल रहा. लेकिन जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया पर फैली, लोगों ने इन टारगेट्स की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए। 

राजौरी और मामून एयरबेस – जो भारत में हैं ही नहीं
पाकिस्तानी अधिकारी द्वारा बताए गए दोनों नामों पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में राजौरी एयरबेस और मामून एयरबेस नाम से कोई भारतीय वायुसेना का एयरबेस मौजूद ही नहीं है. राजौरी जम्मू-कश्मीर का एक जिला है, जहां भारतीय सेना की कुछ यूनिट्स तैनात हैं, लेकिन वहां कोई ऑपरेशनल एयरफोर्स बेस नहीं हैं। 

इसी तरह मामून पठानकोट के पास एक सैन्य कैंटोनमेंट इलाका है, जहां मुख्य रूप से आर्मी की ब्रिगेड और अन्य यूनिट्स रहती हैं. वहां भी कोई एयरबेस नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तानी टीम ने शायद स्थानीय सैन्य ठिकानों के नामों को गलत तरीके से एयरबेस बता दिया या जानबूझकर प्रचार के लिए गलत नाम इस्तेमाल किया। 

दावे पर उठे सवाल
यह दावा सामने आने के बाद सोशल मीडिया और डिफेंस एनालिस्ट्स ने इसे फेक टारगेट वाला दावा करार दिया. भारत में कई असली एयरबेस जैसे पठानकोट, जम्मू, श्रीनगर, उधमपुर आदि मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी उनमें से किसी का भी सही नाम नहीं ले पाए। 

इस घटना ने पाकिस्तानी मीडिया और सेना के दावों की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं. कई लोग इसे युद्ध के दौरान अपने लोगों को मनोबल बढ़ाने के लिए किया गया प्रचार मान रहे हैं। 

फतह-1 मिसाइल और ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस
फतह-1 पाकिस्तान की सतह से सतह पर मार करने वाली गाइडेड मिसाइल है, जिसे हाल के वर्षों में विकसित किया गया है. ऑपरेशन बुनयान अल-मरसूस के दौरान पाकिस्तान ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल भारत के ठिकानों पर करने का दावा किया था। 

लेकिन जब टारगेट के नाम ही गलत या अस्तित्वहीन निकलते हैं, तो मिसाइल की सटीकता और मिशन की सफलता पर शंका होती है. भारतीय अधिकारियों ने अब तक इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन डिफेंस सर्किल में इसे पाकिस्तानी प्रोपगैंडा का हिस्सा माना जा रहा है। 

जियो न्यूज का यह इंटरव्यू एक बार फिर दिखाता है कि युद्ध या तनाव के समय दोनों तरफ से सूचना युद्ध भी जोरों पर होता है. पाकिस्तान ने फतह-1 मिसाइलों की सफलता का दावा तो किया, लेकिन जिन एयरबेस का जिक्र किया गया, वे भारत में हैं ही नहीं। 

नेपाल में बालेन सरकार के बुलडोजर एक्शन से बढ़ी चिंता, भारत-नेपाल बॉर्डर पर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

गोरखपुर
 नेपाल में अवैध निर्माण, अतिक्रमण और सरकारी जमीनों पर कब्जे के खिलाफ चल रहे बुलडोजर अभियान के बाद भारत-नेपाल सीमा से जुड़े जिलों में सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। 

उत्तर प्रदेश पुलिस की अभिसूचना इकाई नेपाल बार्डर (एनबी) शाखा की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि नेपाल में बढ़ते दबाव और कार्रवाई के चलते वहां रह रहे रोहिंग्या मुसलमान रोजगार और शरण के लिए अवैध रूप से भारतीय सीमा में प्रवेश करने की कोशिश कर सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सरकार पूरे देश में अवैध निर्माण, झुग्गी-झोपड़ियों और सरकारी जमीनों पर कब्जों के खिलाफ अभियान चला रही है। इस कार्रवाई के तहत बुलडोजर से ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। नेपाली सेना ने भी संबंधित निकायों से अवैध बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों का विस्तृत आंकड़ा मांगा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि काठमांडू के कपन क्षेत्र समेत नेपाल के विभिन्न हिस्सों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। हिंदूवादी संगठनों द्वारा नेपाल में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की बस्तियों को हटाने की मांग की जा रही है।

नेपाल सरकार की कार्रवाई, सेना के डाटा संकलन और हिंदूवादी संगठनों के विरोध के कारण रोहिंग्या के सामने रोजगार, आवास और आजीविका का संकट गहराने लगा है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अधिकांश रोहिंग्या मुसलमान उर्दू के साथ नेपाली भाषा भी सीख चुके हैं। कई लोगों द्वारा अवैध तरीके से पहचान पत्र बनवाने की जानकारी भी सामने आई है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यही वजह है कि सीमावर्ती इलाकों में उनकी पहचान कर पाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

नेपाल में बलरामपुर जिले की सीमा से सटे गढ़वा गांव पालिका के कोईलावास वार्ड नंबर-8 में अवैध बस्तियों का चिन्हांकन भी शुरू कर दिया गया है।वहां के वर्तमान प्रधान अब्दुल खालिक सिद्दीकी इस कार्रवाई का विरोध कर रहा है और अवैध रुप से रहने वालों को कानूनी अधिकार व जमीन के दस्तावेज देने की मांग कर रहा है।

खुफिया एजेंसियों ने आशंका जताई है कि नेपाल में प्रतिकूल हालात बनने पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी सीमावर्ती रास्तों का इस्तेमाल कर भारतीय सीमा में प्रवेश की कोशिश कर सकते हैं।

इसी को देखते हुए सीमावर्ती जिलों में निगरानी बढ़ाने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और खुफिया नेटवर्क को सक्रिय करने के निर्देश दिए गए हैं।

 

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