अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तारीख तय, 9 जुलाई को मशहद में होगा दफन; 2 करोड़ लोगों के जुटने की उम्मीद

तेहरान 
ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तारीख की घोषणा कर दी गई है. तेहरान प्रशासन के अनुसार राजकीय अंतिम संस्कार की प्रक्रिया 4 जुलाई से शुरू होगी, जबकि 9 जुलाई को उन्हें मशहद में दफनाया जाएगा. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में मुहर्रम के आयोजनों का दौर जारी है। 

तेहरान के मेयर अलीरेज़ा ज़कानी ने बताया कि मरहूम सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का राजकीय अंतिम संस्कार टाल दिया गया है. खामेनेई को लेकर पहले जो कार्यक्रम तय किया गया था, उसमें बदलाव किया गया है. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि मुहर्रम के दौरान होने वाले पारंपरिक आयोजनों और शोक सभाओं पर असर न पड़े। 

फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी को दिए बयान में अलीरेजा जकानी ने कहा कि अंतिम संस्कार मुहर्रम के 10 दिनों के बाद करने का फैसला लिया गया है. यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि लोग इमाम हुसैन के लिए अपना वार्षिक शोक पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ मना सकें. शिया समुदाय के लिए इमाम हुसैन का विशेष महत्व है। 

680 CE में कर्बला की लड़ाई में उनकी शहादत को याद करते हुए हर वर्ष मुहर्रम के दौरान बड़े पैमाने पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इसी वजह से अली खामेनेई का अंतिम संस्कार कार्यक्रम  4 जुलाई से शुरू होगा और 9 जुलाई को मशहद में उन्हें दफनाया जाएगा. इस दौरान भारी जनसमूह के जुटने की उम्मीद है। 

अमेरिकी-इजराइली हमले में हुई थी मौत
लेकिन मेयर अलीरेजा जकानी ने न्यूज एजेंसी के एक बयान में कहा कि समारोह को मुहर्रम के पहले 10 दिनों के बाद तक के लिए टाल दिया गया है, ताकि लोग इमाम हुसैन के लिए अपना सालाना शोक पूरा कर सकें. हुसैन 680 CE में कर्बला की लड़ाई में मारे गए शुरुआती शिया नेता थे। 

इसका मतलब है कि खामेनेई का अंतिम संस्कार 4 जुलाई से शुरू होगा. तेहरान के अधिकारियों ने पहले कहा था कि उन्हें 20 मिलियन लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। 

दफनाये जाने का कार्यक्रम मूल रूप से मार्च में निर्धारित था, लेकिन युद्ध के कारण स्थगित कर दिया गया था. एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, इसके पहले 4 जुलाई से तेहरान में तीन दिनों तक अंतिम संस्कार समारोह चलेगा, जिसके बाद 7 जुलाई को पवित्र शहर कोम में एक और समारोह होगा। 

दफनाए जाने के कार्यक्रम में हुई देरी
ईरानी अधिकारियों ने घोषणा की है कि पूर्व सर्वोच्च नेता को अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले में मारे जाने के 132 दिन बाद 9 जुलाई को उनके गृहनगर मशहद में दफनाया जाएगा. यह ऐसे समय में आया है जब खामेनेई के दफनाने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जबकि उनकी हत्या के 100 से अधिक दिन बीत चुके हैं। 

मूल रूप से दफनाया जाने का कार्यक्रम मार्च में होने की उम्मीद थी, लेकिन संघर्ष और सुरक्षा चिंताओं, उनके अवशेषों की स्थिति और उनके बेटे और उत्तराधिकारी, मोजतबा खामेनेई को सत्ता के हस्तांतरण को लेकर महीनों तक चली अटकलों के बीच इसमें देरी हुई। 

एक अनुमान के अनुसार मरहूम सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार कार्यक्रमों में दुनियाभर से करीब दो करोड़ लोग शामिल हो सकते हैं. यही वजह है कि सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्थाओं को लेकर बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं. अली खामेनेई ने लगभग 37 वर्षों तक इस्लामिक रिपब्लिक का नेतृत्व किया था। 

रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी को US और इजरायल ने अपने संयुक्त हमलों में सेंट्रल तेहरान स्थित अली खामेनेई के घर में उनको मार दिया था. इसी दिन मिडिल ईस्ट शुरू हुआ था. उनकी मौत के बाद 4 मार्च को राजकीय अंतिम संस्कार आयोजित करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन युद्ध की वजह से स्थगित कर दिया गया। 

ईरान सरकार और स्थानीय प्रशासन की ओर से अंतिम संस्कार की नई तारीखों की घोषणा के बाद देशभर में तैयारियां तेज हो गई हैं. तेहरान से लेकर मशहद तक होने वाले इन कार्यक्रमों पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह आयोजन ईरान के इतिहास की सबसे बड़ी सार्वजनिक श्रद्धांजलि सभाओं में से एक माना जा रहा है। 

AI पर अमेरिका का बड़ा फैसला! दुनियाभर के यूजर्स के लिए बंद हुई यह लोकप्रिय सर्विस

वाशिंगटन

अमेरिका ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) को लेकर अब तक का सबसे बड़ा एक्शन लिया है. अब अमेरिका ने AI कंपनी एंथ्रोपिक के लिए नए नियम जारी किए हैं. नए नियम के तहत विदेशी नागरिकस, कर्मचारियों और किसी भी गैर- अमेरिकी संस्था को एंथ्रोपिक के एडवांस्ड AI प्रोग्राम तक के एक्सेस देने पर रोक लगा दी गई है। 

अमेरिका ने निर्यात नियंत्रण के तहत एंथ्रोपिक के लिए नए नियम जारी किए हैं. इसके बाद एंथ्रोपिक का बयान भी सामने आया है. साथ ही कंपनी ने बताया है किन मॉडल को नए नियम के दायरे में रखा है. कंपनी ने बताया है कि आगे गलतफहमी को दूर करके दोबारा सर्विस शुरू करेंगे। 

एंथ्रोपिक ने अपना बयान जारी किया 

एंथ्रोपिक ने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अधिकारों का हवाला देते हुए एक्सपोर्ट कंट्रोल के निर्देश जारी किए हैं। 

नए निर्देश के तहत अमेरिका के भीतर और बाहर मौजूद किसी भी विदेशी नागरिक के लिए Fable 5 और Mythos 5 के एक्सेस को सस्पेंड करने का ऑर्डर दिया है. फिर चाहें वह एंथ्रोपिक के विदेशी नागरिक कर्मचारी ही क्यों ना हो। 

कंपनी ने आगे बताया है कि अमेरिकी सरकार के आदेश का सीधा असर यह है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अपने सभी ग्राहकों के लिए Fable 5 और Mythos 5 की सेवाएं तत्काल प्रभाव से बंद करनी पड़ रही हैं। 

अन्य सर्विस पर कोई असर नहीं 
अमेरिकी आदेश के तहत Claude के अन्य सभी मॉडल्स की पहुंच पर कोई असर नहीं होगा. कंपनी ने आगे बताया है कि इस आदेश की वजह से प्रभावित होने वाली परेशानी के लिए अपने कस्टमर से माफी चाहते हैं। 

कंपनी का अनुमान है कि यह किसी प्रकार की गलतफहमी है और जल्द से जल्द अपनी सर्विस को दोबारा शुरू करने की कोशिश करेंगे। 

एंथ्रोपिक का मिथोस चर्चा में क्यों? 
एंथ्रोपिक ने हाल ही में मिथोस AI लेवल का AI मॉडल लॉन्च किया है, जिसका एक्सेस आम लोगों को भी मिलेगा. कंपनी ने इसको Fable 5 नाम दिया है. मिथोस की लॉन्चिंग के समय कंपनी ने बताया था कि इसको खासतौर से सरकारी और चुनिंदा कंपनियों के लिए तैयार किया है. मिथोस को विशेष रूप से साइबर सिक्योरिटी और जटिल सॉफ्टवेयर कोड का पता करने के लिए डिजाइन किया गया है। 

दुनिया के इस देश में क्यों बैन हैं सैनिटरी पैड? सरकार के तर्क सुनकर रह जाएंगे हैरान

नैय्पिडॉ
सोचिए, अगर किसी देश में महिलाओं के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक सैनेटरी पैड को ही बैन कर दिया जाए तो क्या होगा? और अगर इसकी वजह यह बताई जाए कि विद्रोही लड़ाके इसका इस्तेमाल फर्स्ट एड के लिए कर सकते हैं, तो शायद यकीन करना भी मुश्किल हो जाए. लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश है, जहां फिलहाल यही हो रहा है। 

यह फैसला लाखों महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है. कई महिलाएं अब पुराने कपड़ों, पत्तों और यहां तक कि अखबारों का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं. इससे संक्रमण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। 

आखिर कौन सा है यह देश?
यह देश है म्यांमार. दक्षिण-पूर्व एशिया का यह देश 2021 में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा किए जाने के बाद से लगातार गृहयुद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है. सेना और विद्रोही समूहों के बीच संघर्ष जारी है और इसी संघर्ष के बीच अब सैनेटरी पैड भी विवाद का विषय बन गए हैं। 

द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि म्यांमार की सैन्य सरकार ने कई इलाकों में सैनेटरी पैड की सप्लाई रोक दी है. सरकार का तर्क है कि विद्रोही संगठन और पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) के लड़ाके इनका इस्तेमाल घायल लोगों के इलाज, खून रोकने और जूतों में लगाने के लिए कर सकते हैं। 

विशेषज्ञ बोले- यह तर्क बिल्कुल गलत
हालांकि मेडिकल एक्सपर्ट्स इस दावे को बेतुका बता रहे हैं. मेडिकल सहायता से जुड़ी संस्थाओं का कहना है कि सैनेटरी पैड गोली लगने या गंभीर घावों के इलाज के लिए उपयुक्त नहीं होते। 

विशेषज्ञों के मुताबिक, पैड न तो घाव पर ठीक से टिक पाते हैं और न ही इतने खून को नियंत्रित कर सकते हैं कि उन्हें युद्धक्षेत्र में प्रभावी फर्स्ट एड माना जाए। 

महिलाओं के सामने खड़ी हो गई नई मुसीबत
सैनेटरी पैड की कमी का सबसे बड़ा असर महिलाओं और किशोरियों पर पड़ रहा है. कई इलाकों में महिलाएं मजबूरी में कपड़े के टुकड़े, पत्ते और अखबार जैसी असुरक्षित चीजों का इस्तेमाल कर रही हैं। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI), रिप्रोडक्टिव सिस्टम से जुड़ी बीमारियां और कई अन्य संक्रमण हो सकते हैं. पहले से कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देश में इन बीमारियों का इलाज भी आसान नहीं है। 

तीन गुना तक बढ़ गई कीमत
जहां सैनेटरी पैड उपलब्ध हैं, वहां उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पैकेट की कीमत 3,000 क्यात से बढ़कर 9,000 क्यात तक पहुंच गई है. यह रकम म्यांमार के न्यूनतम दैनिक वेतन से भी ज्यादा है.ऐसे में गरीब परिवारों की महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड खरीदना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है। 

क्या महिलाओं को घरों तक सीमित करना है मकसद?
महिला अधिकार संगठनों का मानना है कि यह सिर्फ सप्लाई रोकने का मामला नहीं है. उनका आरोप है कि सरकार महिलाओं की आवाजाही और सार्वजनिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी को सीमित करना चाहती है। 

कई महिलाओं ने बताया है कि पैड की कमी और पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानियों की वजह से वे घर से बाहर निकलने से बच रही हैं. इससे उनकी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी कमी आ रही है। 
स्थानीय महिला संगठनों ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचाया है. उनका कहना है कि सैनेटरी पैड जैसी बुनियादी जरूरत की चीज पर रोक लगाना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। 

कार्यकर्ताओं का कहना है कि युद्ध और राजनीतिक संघर्ष का सबसे ज्यादा खामियाजा आम नागरिकों, खासकर महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है. एक तरफ देश गृहयुद्ध से जूझ रहा है, दूसरी तरफ महिलाओं को अपनी सबसे बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। 
म्यांमार का यह मामला दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि शायद ही किसी ने सोचा होगा कि किसी देश में सैनेटरी पैड जैसी सामान्य चीज भी कभी राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध रणनीति का हिस्सा बना दी जाएगी। 

यूरोप में बढ़ता तनाव और प्रवासियों पर हमले, क्या भारतीयों का ‘यूरोपियन ड्रीम’ खतरे में है?

लंदन 

कभी बेहतर पढ़ाई, अच्छी नौकरी और सुरक्षित भविष्य के सपने लेकर यूरोप जाने वाले प्रवासियों के लिए अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा. ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी, नीदरलैंड और कई दूसरे यूरोपीय देशों में पिछले कुछ सालों से प्रवासियों को लेकर बहस तेज होती जा रही है. ताजा हालात ये हैं कि कहीं सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, कहीं सरकारें वीजा नियम सख्त कर रही हैं और कहीं स्थानीय लोग अपने शहरों में बढ़ती आबादी और संसाधनों पर दबाव को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। 

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यूरोप में प्रवासियों के खिलाफ यह गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? क्या भारतीय भी इसके निशाने पर हैं? और अगर हां, तो फिर इस माहौल का भारतीय छात्रों, कामगारों और परिवारों पर क्या असर पड़ सकता है? इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा। 

साल 2015 में सीरिया, अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में युद्ध और अस्थिरता की वजह से लाखों लोग यूरोप की ओर बढ़े. जर्मनी समेत कई देशों ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को स्वीकार किया. उस समय इसे मानवीय कदम माना गया. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गए, कई देशों में लोगों को लगने लगा कि स्कूलों, अस्पतालों, मकानों और सरकारी सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है। 

बेहतर भविष्य और अच्छी नौकरी के लिए भारतीय भी बड़ी संख्या में यूरोप जाने लगे. शिक्षा से लेकर रहन-सहन, साफ हवा और परिवार के लिए बेहतर माहौल की तलाश में भारतीयों ने यूरोपीय देशों को चुना. इसी दौरान यूक्रेन युद्ध की वजह से भी लाखों लोग अन्य यूरोपीय देश पहुंचे. यहीं से प्रवास और शरणार्थियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई। 

ब्रिटेन में क्यों भड़का लोगों का गुस्सा?
ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी एक बड़ा मुद्दा रहा है. यहां कहावत है कि लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों से आते हैं और संसाधनों पर कब्जा कर लेते हैं. जंगों और स्थानीय प्रताड़ना की वजह से जब लोग ब्रिटेन पुहंचते हैं और सरकार उन्हें स्वीकार करती हैं तो उनके रहने-सहने के लिए सरकारी इंतजाम भी किए जाते हैं। 

कहा जाता है कि सरकार इन लोगों को अस्थायी रूप से होटलों में ठहराती है. कई शहरों और कस्बों में स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उनका कहना था कि उनके इलाके में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और आवास की कमी है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर कई बार ऐसी खबरें और अफवाहें भी फैलती रही हैं, जिनसे तनाव बढ़ा. कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन हिंसक भी हुए। 

कई मामलों में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा. हालांकि, इन प्रदर्शनों का मुख्य मुद्दा शरणार्थी नीति और अवैध प्रवास था, लेकिन माहौल ऐसा बना कि कई प्रवासी समुदायों को असुरक्षा महसूस होने लगी है। 

आयरलैंड में क्या हुआ, प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
कुछ साल पहले तक आयरलैंड को प्रवासियों के प्रति आमतौर पर एक उदार देश माना जाता था. लेकिन हाल के वर्षों में वहां भी हालात बदलने लगे हैं. डबलिन और दूसरे शहरों में मकानों की भारी कमी है. किराए आसमान छू रहे हैं. स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि बड़ी संख्या में नए लोगों के आने से दबाव और बढ़ा है. 2023 के आखिर में डबलिन में हुई हिंसा के बाद प्रवास और सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है. इसके बाद कई जगहों पर शरणार्थी केंद्रों और आवास योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले. ताजा हालात ये हैं कि शहर-शहर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। 

ताजा मामला उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी से जुड़ा है, जिससे हालात तनावपूर्ण हो गए. घटना के विरोध में भड़की हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं. हालात को काबू में करने के लिए एंटी-राइट पुलिस, स्पेशल फोर्सेज और वॉटर कैनन की तैनाती की गई. प्रदर्शनकारियों पर ईंटें फेंकने और वाहनों में आग लगाने के आरोप हैं, जिसके बाद कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। 

स्थानीय मीडिया की मानें तो कुछ दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े उपद्रवियों ने प्रवासियों और जातीय अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए कई इलाकों में घर-घर जाकर डराने-धमकाने की कोशिश भी की. इस दौरान कुछ मकानों और कारोबारों पर हमले किए गए और प्रदर्शनकारियों ने कई संपत्तियों को नुकसान भी पहुंचाया। 

जर्मनी में प्रवासियों और शरणार्थिों पर बहस तेज
जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. यहां लाखों विदेशी काम करते हैं. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन जर्मनी में भी प्रवास को लेकर राजनीतिक माहौल बदल रहा है. कुछ राजनीतिक दलों का कहना है कि देश को अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था पर ज्यादा नियंत्रण की जरूरत है। 

दूसरी तरफ लाखों लोग ऐसे भी हैं जो प्रवासियों के समर्थन में सड़कों पर उतरते हैं. यानी जर्मनी में लड़ाई सिर्फ प्रवासियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि समाज दो अलग-अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ नजर आ रहा है। 

नीदरलैंड और दूसरे देशों में क्या तस्वीर है?
यूरोप के अन्य देशों में भी प्रवास को लेकर बहस तेज हुई है. कहीं मुद्दा मकानों की कमी है, कहीं सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो कहीं सरकारों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे सीमाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहीं. इटली लंबे समय से भूमध्य सागर के रास्ते आने वाले प्रवासियों का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है. वहीं फ्रांस में भी समय-समय पर प्रवास और राष्ट्रीय पहचान को लेकर प्रदर्शन देखे जाते हैं. यानी हर देश की अपनी कहानी है, लेकिन लगभग हर जगह कुछ समान कारण दिखाई देते हैं। 

दक्षिणी यूरोप के कई हिस्सों में इस समय बड़े पैमाने पर पर्यटन के खिलाफ भी विरोध बढ़ रहा है. नीदरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन, फ्रांस, स्पेन और इटली के कई शहरों में भी स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे हैं. लोगों का कहना है कि पर्यटकों की वजह से मकानों के किराए और संपत्तियों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जबकि सार्वजनिक सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है।  

स्पेन में बार्सिलोना और कैनरी द्वीप समूह समेत 40 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन हुए हैं. वहीं इटली के वेनिस, फ्लोरेंस, रोम और मिलान में किराये वाले पर्यटन आवासों के खिलाफ अभियान और विरोध प्रदर्शन जारी हैं. फ्रांस में मार्सेई से लेकर पेरिस तक कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने क्रूज जहाजों और अत्यधिक पर्यटक भीड़ के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं. हालांकि, ये आंदोलन खासतौर से पर्यटन और आवास संकट को लेकर हैं, लेकिन इन्होंने प्रवास, स्थानीय संसाधनों की बढ़ती लागत पर चल रही बहस को भी और तेज कर दिया है। 

आखिर यूरोप के लोग नाराज क्यों हैं?
अगर आसान भाषा में समझें तो यूरोप के कई देशों में लोगों की नाराजगी के पीछे पांच बड़े कारण हैं. पहला, मकानों की कमी, जहां कई शहरों में घर मिलना मुश्किल होता जा रहा है. दूसरा बड़ा मुद्दा बढ़ती महंगाई है. लोगों को लगता है कि संसाधन सीमित हैं और कंपटीशन बढ़ रहा है. तीसरा, शरणार्थी व्यवस्था पर दबाव बनाने की रणनीति है. सरकारों को हजारों लोगों के रहने, खाने और कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठाना पड़ता है। 

चौथा, सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बड़ा मुद्दा है. कुछ आपराधिक घटनाओं के बाद पूरे प्रवासी समुदाय को लेकर बहस शुरू हो जाती है. पांचवां, सोशल मीडिया भी है जिसकी वजह से प्रदर्शनों को हवा मिलती है. कई बार अधूरी या गलत जानकारी बहुत तेजी से फैलती है और माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण हो जाता है। 

भारतीयों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
यूरोप में रहने वाले ज्यादातर भारतीय छात्र, आईटी प्रोफेशनल, डॉक्टर, इंजीनियर, रिसर्चर्स या बिजनेस करने वाले लोग हैं. वे कानूनी तरीके से वहां पहुंचे हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. फिर भी जब किसी देश में प्रवास विरोधी माहौल बनता है, तो उसका असर सभी विदेशी समुदायों पर पड़ सकता है। 

मान लीजिए किसी देश की सरकार प्रवास कम करने का फैसला करती है. ऐसे में वह सिर्फ शरणार्थियों पर ही नहीं, बल्कि स्टूडेंट वीजा, वर्क वीजा और परिवार को बुलाने के नियमों को भी सख्त कर सकती है. ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों और उनके परिवारों को लेकर नियमों में बदलाव हुए हैं. इसका असर भारतीयों पर भी पड़ा है। 

हर साल हजारों भारतीय छात्र ब्रिटेन, आयरलैंड और यूरोप के दूसरे देशों में पढ़ने जाते हैं. लेकिन अगर राजनीतिक माहौल लगातार प्रवास विरोधी होता है, तो सरकारें विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने, पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट के नियम बदलने या वीजा प्रक्रिया को और कड़ा करने जैसे कदम उठा सकती हैं. इसका मतलब यह नहीं कि भारतीय छात्रों के लिए दरवाजे बंद हो जाएंगे, लेकिन पहले की तुलना में रास्ता मुश्किल हो सकता है। 

नौकरी करने वाले भारतीयों पर क्या असर होगा?
भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, डॉक्टर और इंजीनियर यूरोप की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. दिलचस्प बात यह है कि यूरोप की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. कई देशों में कर्मचारियों की कमी है. इसलिए उन्हें विदेशी स्किल्स की जरूरत भी है. यही वजह है कि एक तरफ कुछ राजनीतिक दल प्रवास कम करने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कंपनियां और उद्योग विदेशी कर्मचारियों को बुलाने की मांग करते हैं. यानी भारतीय प्रोफेशन्स के लिए अवसर पूरी तरह खत्म होने वाले नहीं हैं. लेकिन वीजा और इमिग्रेशन प्रक्रियाएं ज्यादा सख्त और जांच-पड़ताल वाली हो सकती हैं। 

क्या हालिया प्रदर्शनों में भारतीयों को निशाना बनाया गया?
हाल के महीनों में ब्रिटेन, आयरलैंड और दूसरे यूरोपीय देशों में हुए अधिकांश बड़े प्रदर्शनों का केंद्र बिंदु शरणार्थी नीति, अवैध प्रवास, आवास व्यवस्था और सरकार की इमिग्रेशन नीतियां रही हैं. ऐसे प्रदर्शनों में प्रवासियों के खिलाफ नाराजगी जरूर दिखाई देती है, लेकिन रिपोर्ट्स और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि हालिया बड़े विरोध प्रदर्शनों का मुख्य निशाना भारतीय समुदाय था। 

यूरोप इस समय एक मुश्किल संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. उसे एक तरफ अपनी सीमाओं और शरणार्थी व्यवस्था को संभालना है, तो दूसरी तरफ उसे विदेशी छात्रों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और कुशल कर्मचारियों की भी जरूरत है. भारतीयों के लिए सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल सीधा विरोध नहीं, बल्कि बदलती नीतियां हैं. वीजा नियम, नौकरी के अवसर, परिवार को साथ ले जाने की शर्तें और स्थायी निवास के नियम आने वाले वर्षों में ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं। 

ट्रंप ने किया डील का दावा, ईरान ने किया खारिज; बोला- रेड लाइन्स पर नहीं होगा कोई समझौता

वॉशिंगटन
 पश्चिम एशिया में भयंकर महायुद्ध का काउंटडाउन शुरू हो चुका था, रात के अंधेरे में ईरान में तबाही मचाने के लिए अमेरिकी फाइटर जेट्स और खतरनाक हथियार बिल्कुल तैयार थे, लेकिन अटैक से कुछ मिनट पहले अचानक बाजी पलट गई. जो अमेरिका और ईरान कल तक एक-दूसरे के खून के प्यासे थे, उनके बीच ऐन वक्त पर पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ी ‘डील’ फाइनल हो गई. इस सरप्राइज समझौते के बाद ट्रंप ने तुरंत अपना गुस्सा थूककर एक बड़ा यू-टर्न लिया. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर महा-डील का ऐलान कर दिया है और इसके साथ ही ये भी हिंट दी कि इस बार उनकी बात सीधा ईरान के नए पावर सेंटर मोजतबा खामेनेई से हुई है। 

ट्रंप ने ऐन वक्त पर रोका ईरान पर अटैक
ट्रंप ने अपने सोशल अकाउंट ट्रूथ सोशल पर लिखा ‘इस बात को ध्यान में रखते हुए कि ईरान के साथ बातचीत ईरानी नेतृत्व के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुच गई है और उसे मंजूरी मिल गई है, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर मैंने आज शाम ईरान के खिलाफ तय हमले और बमबारी रद्द कर दी है। 

ट्रंप ने आगे लिखा कि ‘बातचीत और आखिरी फैसले में चाहे वो मोटे तौर पर हों या विस्तार से, सभी संबंधित पक्षों ने मंजूरी दे दी है. इन पक्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका, इजराइल, सऊदी अरब, UAE, कतर, तुर्की, पाकिस्तान, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन, मिस्र और अन्य देश शामिल हैं. जब तक ये समझौता पूरी तरह से तय नहीं हो जाता, तब तक नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह लागू रहेगी, समझौते पर हस्ताक्षर करने का समय और जगह जल्द ही बताई जाएगी। 

Iran-US के बीच हो गई महा-डील, टॉप लीडर ने किया एप्रूव
इस पूरी डील में सबसे बड़ा ट्विस्ट ये रहा कि बातचीत को सीधे ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व, यानी वहां के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और राष्ट्रपति के स्तर पर ले जाया गया था. अब तक ईरान इस बात पर अड़ा हुआ था कि वो किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा, लेकिन जब ट्रंप ने ‘आज ही रात’ पूरी ताकत से हमले की कसम खा ली तो तेहरान ने अचानक अमेरिका की शर्तें मान लीं। 

ईरानी लीडरशिप ने बंद कमरे में अमेरिकी प्रस्तावों की शर्तों को न सिर्फ पढ़ा, बल्कि उन पर पूरी तरह से रजामंदी भी दे दी. जैसे ही ये कन्फर्मेशन व्हाइट हाउस पहुंची, ट्रंप ने तुरंत अपने कमांडर्स को फोन घुमाया और उड़ने के लिए तैयार बमवर्षक विमानों को वापस लौटने का आदेश दे दिया। 

ट्रंप के दावों को ईरान ने बताया अटकलें
 राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के साथ डील वाले बयान के कुछ घंटों बाद ईरान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने कहा कि दोनों देशों के बीच कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और ऐसी खबरें सिर्फ अटकलें हैं. इसके अलावा उन्होंने हाल ही में भारतीय कमर्शियल जहाजों पर हुए अमेरिकी हमलों की निंदा की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अमेरिका को जवाबदेह ठहराने की अपील की। 

ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के हवाले से बघई ने कहा, ‘ईरान ने अभी तक किसी भी समझौते पर अंतिम फैसला नहीं लिया है. हम अपनी ‘रेड लाइन्स’ पर कभी समझौता नहीं करेंगे। 

‘बारबार रुख बदल रहा है अमेरिका’
उन्होंने अमेरिका में बार बार रुख बदलने का आरोप लगाते हुए कहा, ‘शांति वार्ता की स्थिति शुरू से ही हमारे सामने साफ थी. समझौते का बड़ा हिस्सा पहले ही तैयार हो चुका था, लेकिन अमेरिकी पक्ष बार-बार अपना रुख बदलता रहा है. इसी के कारण राजनयिक प्रक्रिया लगातार बाधित हो रही है। 

बघेई ने स्पष्ट किया कि कतर और पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. इसके साथ ही ईरान ने होर्मुज (Strait of Hormuz) में सुरक्षा कम होने के लिए भी पूरी तरह अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों को जिम्मेदार ठहराया है। 

क्या बोले ट्रंप
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओवल ऑफिस से घोषणा की थी कि अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध का एक शानदार निपटारा (Settlement) कर लिया है, जिसके दस्तावेज अगले कुछ दिनों में अंतिम रूप ले लेंगे. ट्रंप ने दावा किया था कि इस वीकेंड यूरोप में एक हस्ताक्षर समारोह हो सकता है, जिसमें उनकी तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल होंगे. ट्रंप ने ये भी कहा था कि इस समझौते के तहत ईरान कभी-भी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया था कि जैसे ही ईरान के साथ ये समझौता हस्ताक्षरित होगा, वैसे ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंद पड़े होर्मुज को जहाजों की आवाजाही के लिए आधिकारिक तौर पर दोबारा खोल दिया जाएगा. हालांकि, इसके बिल्कुल उलट ईरानी प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि अमेरिकी कार्रवाइयों और उनकी सैन्य हरकतों की वजह से होर्मुज का पूरा इलाका पहले के मुकाबले अब और भी कम सुरक्षित रह गया है। 

 

Trump Tension: ईरान युद्ध से बढ़ी महंगाई की मार, अमेरिका में ट्रंप के सामने खड़ी हुई नई चुनौती

वाशिंगटन
मिडिल ईस्ट में युद्ध एक बार फिर तेज हो गई है. लगातार दूसरे दिन अमेरिका-ईरान के बीच हमलों का सिलसिला जारी है. इस बीच कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है. ईरान युद्ध न सिर्फ दुनिया के तमाम अन्य देशों के लिए, बल्कि खुद अमेरिका के लिए भी बड़ी सिरदर्दी बनता जा रहा है और अमेरिकियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। 

ईरान युद्ध के चलते तेल-गैस की सप्लाई में रुकावट और एनर्जी प्राइस में तगडी़ बढ़ोतरी से अमेरिका भी पीड़ित है और यहां महंगाई की तगड़ी मार पड़ रही है. मई महीने में अमेरिका में महंगाई दर के आंकड़े आ गए हैं और ये डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ाने वाले हैं. दरअसल, US Inflation मई में तीन साल के हाई पर पहुंच गई। 

4 फीसदी के पार US में महंगाई
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में जंग के चलते पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिका में महंगाई के रूप में देखने को मिला है. अमेरिकी लेबर स्टेटिस्टिक्स ब्यूरो ने बुधवार को बताया कि रिटेल महंगाई (CPI) मई में सालाना आधार पर बढ़कर 4.2% हो गई, जो कि अप्रैल 2023 के बाद सबसे ज्यादा है. उस समय ये 3.8 फीसदी पर पहुंची थी। 

अब अमेरिकियों की सेविंग पर संकट 
अमेरिका में महंगाई दर के ये अनुमान इकोनॉमिस्ट के सर्वे और अनुमानों के अनुरूप ही रहे हैं. महंगाई में लगातार तीसरे महीने मजबूत उछाल ने अमेरिकी परिवारों पर बढ़ते दबाव को उजागर किया है. साक्ष्य बताते हैं कि ज्यादातर लोग अब अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी बचत का भी उपयोग कर रहे हैं. ये लगातार दूसरा महीना है, जबकि महंगाई दर वेतन वृद्धि से अधिक रही, जिससे आर्थिक ग्रोथ पर भी दबाव पड़ सकता है। 

युद्ध, महंगाई और अमेरिकी बाजार क्रैश 
ईरान के साथ एक बार फिर शुरू हुए युद्ध ने ग्लोबल टेंसन को चरम पर पहुंचा दिया है, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में फिर से आग लगने लगी है और खबर लिखे जाने तक ये 95 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था. इस बीच अमेरिका में पड़ी महंगाई की मार का सीधा अमेरिकी शेयर बाजार पर भी देखने को मिला है. US Inflation Data आते ही यहां कोहराम सा मच गया. Dow Jones 953 अंक की बड़ी गिरावट लेकर बंद हुआ। 

ट्रंप की राजनीति पर पड़ेगा असर 
अमेरिका में बढ़ती महंगाई राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक राजनीतिक बोझ बनती जा रही है, जो नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है. बता दें कि ट्रंप ने 2024 का राष्ट्रपति चुनाव के दौरान महंगाई को कम करने के वादे किए थे और इसका फायदा उन्हें मिला था। 

अमेरिकी हमलों के बाद ईरान का ताबड़तोड़ पलटवार, बहरीन-कुवैत से लेकर तेल टैंकरों तक मची अफरा-तफरी

तेहरान 

अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव एक बार फिर खुली सैन्य भिड़ंत में बदलता दिखाई दे रहा है. अमेरिका के ताजा हमलों के बाद ईरान ने दावा किया कि उसने बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं. इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया गया. इन घटनाओं के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने ऐलान किया कि होर्मुज स्ट्रेट को “अगले आदेश तक” बंद कर दिया गया है। 

IRGC के मुताबिक, गुरुवार तड़के कुवैत के अली अल सलेम और अहमद अल-जाबेर एयर बेस पर ड्रोन हमले किए गए. इनके अलावा बहरीन में शेख ईसा एयरबेस को निशाना बनाया गया. संगठन का दावा है कि ये कार्रवाई अमेरिका द्वारा ईरान के भीतर किए गए नए सैन्य हमलों के जवाब में की गई है और अमेरिका के 18 प्रमुख सैन्य संपत्तियों को तबाह कर दिया है. ईरान ने यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से “अवैध रूप से” गुजरने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों पर भी हमले किए गए हैं। 

ईरानी सेना ने अमेरिका पर अप्रैल में हुए युद्धविराम के उल्लंघन का आरोप लगाया है. उसका कहना है कि अमेरिकी सेना लगातार ईरान के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई कर रही है, जिसके कारण जवाबी कदम उठाने पड़े. IRGC ने साफ चेतावनी दी कि होर्मुज से गुजरने वाला हर तरह का समुद्री यातायात अब प्रभावित होगा। 

बहरीन में ईरानी हमलों का टारगेट फिफ्थ फ्लीट
IRGC ने दावा किया कि आर्मी के ड्रोन हमलों की इस लहर में, फिफ्थ फ्लीट के पैट्रियट सिस्टम के कम्युनिकेशन एंटीना और रडार इंस्टॉलेशन को निशाना बनाया गया है. ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, जॉर्डन में स्थित अल-अजराक एयर बेस और मुवाफ्फाक सल्ती एयर बेस पर जोरदार विस्फोटों की खबर सामने आई है. ये दोनों सैन्य ठिकाने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कर्मियों की मौजूदगी और अमेरिकी अभियानों के समर्थन के लिए जाने जाते हैं. हालांकि विस्फोटों की वजह और नुकसान की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। 

दूसरी तरफ अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर ईरान के भीतर कई ठिकानों पर हमले किए गए. अमेरिका का कहना है कि ये हमले ईरान की “लगातार और अनुचित आक्रामकता” के जवाब में किए गए हैं। 

अमेरिका के ताजा हमले का कहां-कहां हुआ असर?
ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी हमलों के बाद केशम द्वीप, बंदर अब्बास, सीरिक और करगान जैसे इलाकों में जोरदार विस्फोट हुए. दक्षिणी शहर करगान में हुए धमाकों में कम से कम दो लोगों के घायल होने की भी खबर है. इससे पहले बीते दिन अमेरिका ने केशम द्वीप, सीरिक, जास्क और बंदर अब्बास के आसपास सैन्य ठिकानों, रडार और सर्विलांस सिस्टम को निशाना बनाया था। 

होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी हेलीकॉप्टर मार गिराया गया
यह पूरी घटना उस घटना के बाद सामने आई है जिसमें होर्मुज स्ट्रेट के ऊपर एक अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर मार गिराया गया था. इसके बाद दोनों देशों के बीच लगातार जवाबी हमले हो रहे हैं. बुधवार को ईरान ने बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट, कुवैत के अली अल सलेम एयर बेस और जॉर्डन के अज्राक एयर बेस को निशाना बनाने का दावा किया था। 

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर शांति वार्ता को जानबूझकर लंबा खींचने का आरोप लगाया है. ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान पर “बहुत कड़ा प्रहार” करेगा. जवाब में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा कि देश किसी भी दबाव या धमकी के सामने झुकने वाला नहीं है और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर कदम उठाएगा। 

भारत के आमों पर नेपाल की रोक से मचा हड़कंप, बाजार में बढ़ी चिंता, महंगाई का खतरा गहराया

काठमांडू 

भारत के साथ तल्खी के बीच नेपाल ने एक और बड़ा फैसला लिया है। खबर है कि पड़ोसी मुल्क ने भारतीय आमों की देश में एंट्री पर रोक लगा दी है। हालांकि, कहा जा रहा है कि इसकी वजह कीटनाशक हैं। वहीं, एक और कारण स्थानीय फलों को प्रोत्साहित करना भी माना जा रहा है। नेपाल सरकार के इस फैसले से बाजार में व्यापारी सप्लाई में आ रही परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

क्यों लगा दी रोक
पीटीआई भाषा के अनुसार, कथित रूप से अत्यधिक कीटनाशक पाए जाने और सीमावर्ती क्षेत्रों में ‘क्वारंटीन’ सुविधाओं के अभाव का हवाला देते हुए भारत से किए जाने वाले आम के आयात पर रोक लगाई गई है। अधिकारियों ने बताया कि सरकार ने ऐसे आमों के आयात पर अंकुश लगाया है जिनमें कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई और इसके साथ ही सीमावर्ती इलाकों में पर्याप्त ‘क्वारंटीन’ सुविधाओं की कमी भी इस फैसले का एक प्रमुख कारण है।

नेपाल के बाजार की हालत टाइट
राइजिंग नेपाल की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आमों पर रोक के बाद जनकपुरधाम के बाजारों में घरेलू स्तर पर उगाए गए आमों से भरे हुए हैं। वहीं, कई फल विक्रेताओं का कहना है कि इस फैसले के चलते वह सप्लाई और बिजनेस को लेकर काफी परेशान हैं। इस रोक के चलते नेपाल के स्थानीय बाजारों में घरेलू स्तर पर उत्पादित आम की उपलब्धता बढ़ गई है। गर्मी के मौसम में आम की मांग आमतौर पर काफी अधिक रहती है।

क्या बोले व्यापारी
नेपाल की वेबसाइट से बातचीत में व्यापारियों ने बताया है कि घरेलू उत्पाद को बढ़ाना देना सही है, लेकिन लंबी रणनीति के बगैर रोक लगाने के चलते व्यापार में मुश्किलें खड़ी हो गईं हैं। खास बात है कि नेपाली आमों का उत्पादन सिर्फ करीब दो महीनों तक रहता है, जिसके चलते भारतीय आयात मुल्क की आम की जरूरतों को पूरा करने के लिए अहम है।

बाजार में हो सकती है कमी
जनकपुरधाम के फल और सब्जी व्यापारी संघ के महासचिव भुवनेश्वर पुर्बे ने वेबसाइट को बताया कि गर्मियों में आम की मांग बहुत बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय आयात पर रोक से बाजार में कमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि सप्तरी, सिराहा, महोत्तरी, धनुषा और सर्लाही जैसे जिलों से रोजाना 50 टन से ज्यादा आम जनकपुरधाम पहुंच रहा है, लेकिन सिर्फ स्थानीय पैदावार से पूरे बाजार की मांग को पूरा करना मुश्किल होगा।

उन्होंने कहा है कि आयात पर पूरी तरह बैन लगाने के बजाए सरकार को क्वारंटीन सिस्टम को मजबूत करना चाहिए। साथ ही सुझाव दिया कि भारतीय फलों को क्वालिटी टेस्टिंग के बाद भारतीय फलों को आने की अनुमति देनी चाहिए।

केले के मामले में लग चुकी है चोट
उन्होंने बताया कि भारतीय केले सस्ते होते हैं, लेकिन सप्लाई में रोक आने के बाद कीमतें बढ़ गईं हैं। अब जब सर्दियों में घरेलू उत्पादन कम हो जाता है, तो व्यापारी भारतीय केले के आयात पर निर्भर होते हैं। व्यापारियों ने चेतावनी भी दी है कि अगर रोक लंबे समय तक जारी रहती है, तो ग्राहकों को ज्यादा दाम चुकाने होंगे और कारोबारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा।

जापान ने भी लगाई है रोक
जापान सरकार ने कीट नियंत्रण में कमी और ‘वेपर हीट ट्रीटमेंट’ (VHT) मानकों पर खरा न उतरने का हवाला देते हुए 25 मार्च 2026 के बाद जारी सर्टिफिकेट वाली खेप पर रोक लगा दी है। करीब दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद जापान ने ये कदम उठाया है। भारत के अमरोहा जिले से लगभग 12 हजार हेक्टेयर में फैले आम के बागों से हर साल भारी मात्रा में फल खाड़ी देशों, अमेरिका, जापान और यूरोप को निर्यात किया जाता है।

स्थानीय निर्यातकों का कहना है कि जापान की यह कार्रवाई एक चेतावनी की तरह है, जिससे निपटने के लिए अब कीट नियंत्रण और पैकेजिंग के वैश्विक मानकों पर और अधिक गंभीरता से ध्यान देना होगा।

US Attacks Iran: अपाचे हेलिकॉप्टर गिरने के बाद ट्रंप का बड़ा एक्शन, ईरान पर हमला, होर्मुज में बढ़ा तनाव

वाशिंगटन

ईरान जंग में जिसका डर था, वो हो गया. ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आग एक बार फिर भड़क गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ने होर्मुज को बदलापुर बना दिया है. जिस बात के लिए डोनाल्ड ट्रंप इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को बार-बार रोक रहे थे. अपाचे हेलीकॉप्टर के गिरने के बाद खुद वो गलती कर बैठे. जी हां, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर ताबड़तोड़ अटैक कर दिया है. अमेरिका का ईरान पर यह अटैक सीजफायर के बीच हुआ है. होर्मुज के पास गिराए गए अपाचे हेलीकॉप्टर का ट्रंप ने ईरान पर अटैक करके जवाब दिया है. हालांकि, तेहरान ने भी बदला लेने की कसम खाई है. इसका मतलब है कि युद्ध की आग अब और भड़कने वाली है। 

दरअसल, मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जवाबी सैन्य कार्रवाई का आदेश दे दिया है. यह कदम उस घटना के बाद उठाया गया, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास एक अमेरिकी AH-64 अपाचे हेलिकॉप्टर गिर गया था. अमेरिका का दावा है कि इसके पीछे ईरान का हाथ था, जबकि तेहरान इस आरोप से इनकार कर रहा है. इस बीच अमेरिकी सेना ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए हैं. अमेरिका ने मंगलवार को होर्मुज स्ट्रेट के पास एक अमेरिकन अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर गिराए जाने के कुछ घंटों बाद ईरान पर हमला किया। 

अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस हमले को सेल्फ डिफेंस स्ट्राइक बताया है. उसने कहा कि ईरान पर यह ताजा हमला ट्रंप के ऑर्डर पर वाशिंगटन टाइम के हिसाब से शाम 5 बजे शुरू हुआ और इसका मकसद ईरानी हमले का प्रोपोर्शनल जवाब देना था. यह कदम तब उठाया गया जब ट्रंप ने ईरान पर अपाचे को मार गिराने का आरोप लगाया और कसम खाई कि ज़रूरत पड़ने पर अमेरिका इस हमले का जवाब देगा। 

 ट्रंप का बड़ा एक्शन, ईरान पर अमेरिकी हमले शुरू; मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध का खतरा

बहरहाल, इस घटनाक्रम ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. तेल बाजार से लेकर वैश्विक सुरक्षा तक… हर क्षेत्र पर इसके असर की आशंका जताई जा रही है. आइए जानते हैं इस पूरे मामले के कुछ बड़े अपडेट्स.

ट्रंप ने दिया सैन्य कार्रवाई का आदेश: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों और सैन्य उपकरणों पर हमला किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इसी के बाद ईरान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई को मंजूरी दी गई. अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट के ऊपर गश्त कर रहे अमेरिकी सेना के एक अपाचे हेलिकॉप्टर को मार गिराए जाने के बाद यह कार्रवाई की गई। 

अपाचे हेलिकॉप्टर घटना बनी बड़ी वजह: दरअसल, अमेरिका का ईरान पर यह अटैक अपाचे के गिराए जाने का बदला है. ईरान पर आरोप है कि उसने अमेरिकी AH-64 अपाचे हेलिकॉप्टर मार गिराया है. इससे ट्रंप भड़क उठे. उन्होंने अपाचे का बदला लेने के लिए ही ईरान पर अटैक करवाया. अमेरिका का दावा है कि इसके पीछे ईरान या उससे जुड़े समूहों की भूमिका थी. कुल मिलाकर अपाचे वाली घटना ही नई जंग की वजह बनी। 

ईरान के कई ठिकाने निशाने पर: अमेरिकी सेना ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, रडार केंद्रों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया. शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार कई रणनीतिक ठिकानों पर मिसाइल और हवाई हमले किए गए. अमेरिका ने अब्बास समेत 3 ईरानी ठिकानों पर एक साथ हमला किया. इसके बाद तो ईरान में हर तरफ धमाकों की गूंज सुनाई देने लगी। 

तेहरान में बढ़ी हलचल: अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की राजधानी तेहरान और अन्य प्रमुख शहरों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. सैन्य ठिकानों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है. लोगों में खौफ का मंजर है. गौरतलब है कि अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान पर इजरायल के साथ मिलकर अटैक किया था। 

ईरान ने दी कड़ी चेतावनी: अमेरिकी हमलों पर ईरान ने भी पलटवार की कसम खाई है. ईरान ने साफ कहा है कि वह किसी भी हमले का जवाब देगा. तेहरान का कहना है कि अगर अमेरिका ने कार्रवाई जारी रखी तो पूरे क्षेत्र में हालात और बिगड़ सकते हैं. इस बीच तेहरान ने भी पलटवार किया है. उसने भी कुछ मिसाइलें दागी हैं। 

होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा खतरा: मिडिल ईस्ट का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर जंग का अखाड़ा बन गया है. अपाचे हेलिकॉप्टर क्रैश के बाद अमेरिका ने ईरान पर दोबारा हमला बोल दिया है. इससे दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव बढ़ गया है. यहां किसी भी सैन्य टकराव का असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है। 

बेंजामिन नेतन्याहू को रोक खुद गलती कर रहे ट्रंप: डोनाल्ड ट्रंप ने एक दिन पहले ही इजरायल को ईरान के खिलाफ नई जंग नहीं छेड़ने के लिए चेताया था. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर इजरायल ईरान पर अटैक करता है तो वह उसे अकेले जंग लड़नी पड़ेगी. मगर अपाचे के गिरने के बाद ट्रंप खुद आपा खो बैठे और ईरान पर अटैक कर दिया। 

होर्मुज में फिर मचेगा हाहाकार: ईरान जंग पर अमेरिका अब तक शांत था. वह किसी तरह सीजफायर को मान रहा था और ईरान से डील चाहता था. मगर अपाचे के गिरने से ट्रंप का सब्र जवाब दे गया. भड़के डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अटैक करके नई जंग छेड़ दी है. इसका मतलब है कि होर्मुज में अब और हड़कंप मचेगा. इससे तेल और गैस की चिंता और बढ़ जाएगी। 

EU के एक फैसले से भारत-चीन की 50 कंपनियों पर संकट, रूस कनेक्शन बना बड़ी वजह

लंदन 

यूरोपीय यूनियन ने भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों में स्थित 50 कंपनियों को झटका दिया है. ईयू ने यूक्रेन पर हमले के चलते रूस पर 21वें प्रतिबंध पैकेज की घोषणा की है. इन प्रतिबंधों ने अचानक इन आधा सैकड़ा कंपनियों के सामने संकट खड़ा कर दिया है. EU की ओर से ऐलान किया गया है कि वह भारत और अन्य देशों की उन 50 कंपनियों पर एक्सपोर्ट कंट्रोल के उपाय लागू करेगा, जो रूस की सेना के साथ सीधे कारोबार करती हैं। 

भारत, चीन, तुर्की समेत यहां असर 
यूरोपीय यूनियन के इस ऐलान का असर भारत और चीन के साथ ही किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात में स्थित कंपनियों पर पड़ेगा और इन पर निर्यात प्रतिबंध लगाए जाएंगे. ईयू ने ये फैसला रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से लिया है, लेकिन इससे सिर्फ रूस ही नहीं, तमाम देश प्रभावित होंगे. नई लिस्ट में ड्रोन निर्माण से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हैं, जिनपर निर्यात प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। 

तैयार हो रही सबसे बड़ी लिस्ट
प्रस्तावित 21वें प्रतिबंध पैकेज की घोषणा करते हुए यूरोपीय संघ की विदेश मामलों और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कल्लास ने कहा कि ये उपाय यूक्रेन में मॉस्को के सैन्य अभियान को वित्तपोषित करने और बनाए रखने की क्षमता पर लगाम लगाने के लिए किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘हम धीरे-धीरे रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था की नींव को ध्वस्त करते जा रहे हैं, अब ब्रुसेल्स दो साल से अधिक समय में रूस पर प्रतिबंधों की सबसे बड़ी लिस्ट तैयार कर रहा है। 

90 बैंकों की संपत्ति जब्त होगी!
ईयू के प्रस्तावित पैकेज में उन बैंकों, हथियार निर्माताओं, तेल व्यापारियों, रिफाइनरियों और क्रिप्टो ऑपरेटरों को टारगेट किया गया है. जो तीसरे देशों में स्थित हैं और उन पर रूस को मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने का आरोप है. कल्लास के मुताबिक, करीब 90 बैंकों की संपत्ति जब्त की जा सकती है, जबकि रूस और अन्य देशों के 30 से अधिक बैंकों के साथ लेनदेन पर और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. इसके अलावा 11 क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म पर भी ट्रांजैक्शन बैन लगाने की तैयारी है. इस बीच उन्होंने ये भी कहा कि यूरोपीय संघ रूसी एनर्जी एक्सपोर्ट से होने वाले राजस्व को कम करने के लिए रूसी तेल की कीमत सीमा पर अस्थायी रोक लगाने की कोशिश भी कर रहा है। 

निशाने पर रूस को समर्थन देने वाली कंपनियां
काजा कल्लास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट पर भी इन प्रतिबंधों से जुड़ी जानकारी शेयर की. इसमें उन्होंने कहा कि, ‘हम रूस के सैन्य-औद्योगिक तंत्र (Military-Industrial Complex) को समर्थन देने वाली तमाम कंपनियों को भी निशाना बना रहे हैं. नई सूची में ड्रोन निर्माण क्षेत्र से जुड़ी 30 से अधिक संस्थाओं को शामिल किया जाएगा. इसके साथ ही 50 कंपनियों पर नए एक्सपोर्ट कंट्रोल उपाय लागू किए जाएंगे। 

उन्होंने कहा कि हम रूस की उत्पादन क्षमता को और बाधित करने के लिए अतिरिक्त निर्यात प्रतिबंध भी लगाएंगे. इनमें निकेल पाउडर, धातुएं और हाई परफॉर्मेंस मिश्रधातुएं शामिल हैं. इसके अलावा, कुछ नई वस्तुओं के आयात पर भी प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिनमें ऑटो पार्ट्स, कई कीमती धातुओं के अयस्क (Precious Metals Ores) और रसायन शामिल होंगे। 

 

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