F-35 को बनाने में अमेरिका को लगे 72 महीने, भारत का AMCA सिर्फ 30 माह में भर सकता है उड़ान!

बेंगलुरु 
भारत ने रक्षा तकनीक की दुनिया में एक ऐसा दांव चला है, जिसने दुनिया के बड़े सैन्य विशेषज्ञों को चौंका दिया है. पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस मीडियम कंबैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के लिए जारी हुए आरएफपी ने सिर्फ एक नए विमान की कहानी शुरू नहीं की, बल्कि भारत के डिफेंस इंडस्ट्रियल मॉडल को ही बदलने का संकेत दे दिया है. इसमें सबसे बड़ा संदेश यह है कि करीब सात दशक तक लड़ाकू विमान निर्माण में अकेले खिलाड़ी रहे सरकारी कंपनी एचएएल का एकाधिकार अब टूटता दिख रहा है. पहली बार भारत सरकार ने AMCA जैसे रणनीतिक और अत्यंत संवेदनशील प्रोजेक्ट के लिए निजी कंपनियों को आगे कर दिया है। 

एलएंडटी-बीईएल, टाटा एडवांस सिस्टम्स और भारत फोर्ज-बीईएचएल जैसे निजी समूह अब उस दौड़ में हैं, जो भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की श्रेणी में ला सकती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वाकई 30 महीने में वह कर सकता है, जिसके लिए अमेरिका जैसी सुपरपावर को 5 से 6 साल लगे थे?

AMCA सिर्फ फाइटर जेट नहीं, भारत का टेक्नोलॉजिकल टेस्ट है
AMCA परियोजना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान सिर्फ एक एयरक्राफ्ट नहीं होता. यह उड़ने वाला सुपरकंप्यूटर होता है. इसमें स्टील्थ डिजाइन, सेंसर फ्यूजन, AI आधारित एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सुपरक्रूज क्षमता और अत्याधुनिक हथियार एक साथ काम करते हैं. दुनिया में अभी तक केवल अमेरिका, चीन और सीमित स्तर पर रूस ही इस तकनीक को पूरी तरह विकसित कर पाए हैं. भारत अब इसी क्लब में प्रवेश करना चाहता है।
 
 लेकिन असली कहानी यहां टाइमलाइन की है. अमेरिका को 72 महीने, भारत को सिर्फ 30 महीने!

AMCA के RFP के अनुसार:

    पहला प्रोटोटाइप 24 महीने में तैयार करना होगा
    30 महीने के भीतर उसकी पहली उड़ान होगी
    कुल 1800 शॉर्टिज सात वर्षों में पूरी करनी होंगी
    उसके बाद ही सीरियल प्रोडक्शन शुरू होगा

यानी अगर सब कुछ समय पर हुआ तो 2034-35 तक AMCA भारतीय वायुसेना में शामिल हो सकता है. अब इसकी तुलना अमेरिका से कीजिए। 

F-22 और F-35 का उदाहरण
अमेरिका ने 1991 में लॉकहीड मार्टिन-बोइंग टीम को F-22 रैप का कॉन्ट्रैक्ट दिया था. लेकिन पहला प्रोटोटाइप 1997 में रोलआउट हुआ और उसी साल उसकी पहली उड़ान हुई. यानी पहली उड़ान में करीब 72 महीने लगे. F-35 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. F-35 लाइटिंग-II का कॉन्ट्रैक्ट 2001 में दिया गया. पहला प्रोटोटाइप 2006 में तैयार हुआ. यानी यहां भी लगभग 60 महीने लगे. अब भारत कह रहा है कि वह 30 महीने में पहली उड़ान करा देगा. यही वजह है कि दुनिया की नजरें इस प्रोजेक्ट पर टिक गई हैं। 

HAL का युग खत्म या नई शुरुआत?
AMCA प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा राजनीतिक और औद्योगिक संदेश यह है कि भारत अब सरकारी मॉडल से आगे बढ़कर निजी रक्षा उद्योग पर भरोसा कर रहा है. एचएएल ने दशकों तक मिग-21, जैगुआर, सुखोई-30MKI और तेजस जैसे विमानों का निर्माण किया. लेकिन तेजस प्रोग्राम में हुई लंबी देरी ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या भारत को तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए नए मॉडल की जरूरत है? फिर यहीं से निजी क्षेत्र की एंट्री हुई. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि प्रोटोटाइप निर्माण के बाद जब AMCA के बड़े पैमाने पर उत्पादन की बारी आएगी, तब एचएएल फिर से रेस में शामिल हो सकता है. क्योंकि HAL के पास मौजूदा असेंबली लाइनें हैं. एयरफोर्स के साथ दशकों का अनुभव है. सप्लाई चेन पहले से विकसित है. बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता है. लेकिन जिस निजी कंपनी को शुरुआती प्रोटोटाइप कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा, उसे तकनीकी बढ़त मिल जाएगी. इसलिए यह लड़ाई सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के एयरोस्पेस इकोसिस्टम की है। 

सबसे बड़ी चुनौती- अनुभव की कमी
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय निजी कंपनियां इतनी जल्दी फाइटर जेट निर्माण की क्षमता विकसित कर पाएंगी? सच्चाई यह है कि किसी भी निजी कंपनी ने अभी तक फाइटर जेट की फाइनल असेंबली लाइन नहीं बनाई है. टाटा ने जरूर एयरबस के साथ मिलकर C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट लाइन बनाई है, लेकिन वह फाइटर जेट नहीं है. स्टील्थ कोटिंग, सेंसर फ्यूजन और सुपरसोनिक डिजाइन जैसी तकनीकें भारत के लिए नई हैं। 

इसके अलावा RFP में साफ कहा गया है कि नई कंपनी भारतीय नियंत्रण में होगी. विदेशी शेयर होल्डिंग सीमित रहेगी. सीईओ, सीएफओ और बोर्ड भारतीय नागरिक होंगे. विदेशी कंपनियों की प्रत्यक्ष भागीदारी लगभग नहीं होगी. यानी भारत को यह लड़ाई लगभग अकेले लड़नी होगी। 

क्या भारत चुपके से डिफेंस टेक सुपरपावर बन रहा है?
ऐसे में यह बड़ा सवाल बन गया है. यहां एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है. पिछले दस वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में कई बड़े परिवर्तन किए हैं. जैसे-

    मिसाइल टेक्नोलॉजी में तेज प्रगति
    स्वदेशी रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम
    ड्रोन और AI आधारित युद्ध प्रणालियां
    ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्षमता

    तेजस Mk1A और टीईडीबीएफ जैसी परियोजनाएं

अब AMCA उस पूरी रणनीति का अगला चरण है. सरकार शायद यह समझ चुकी है कि अगर भारत को भविष्य के युद्धों में आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे अब सिर्फ लाइसेंस प्रोडक्शन से आगे बढ़ना होगा. यही वजह है कि AMCA को केवल रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय तकनीकी मिशन की तरह देखा जा रहा है। 

AMCA की सबसे बड़ी ताकत उसकी महत्वाकांक्षा है और सबसे बड़ा खतरा भी वही है. अगर टाइमलाइन फिसली तो लागत कई गुना बढ़ सकती है. एयरफोर्स की क्षमता प्रभावित होगी. विदेशी लड़ाकू विमानों पर निर्भरता बढ़ेगी. निजी क्षेत्र का भरोसा भी हिल सकता है. तेजस परियोजना पहले ही दिखा चुकी है कि भारत में जटिल एयरोस्पेस प्रोजेक्ट समय से पीछे जा सकते हैं. ऐसे में 30 महीने की समय सीमा कई विशेषज्ञों को अवास्तविक लग रही है। 

असली गेमचेंजर क्या हो सकता है?
फिर भी इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत अब टेक्नोलॉजी रिस्क लेने को तैयार दिख रहा है. पहले भारत विदेशी तकनीक खरीदता था. अब भारत खुद प्लेटफॉर्म डिजाइन करना चाहता है. पहले सरकारी कंपनियां केंद्र में थीं. अब निजी उद्योग को रणनीतिक जिम्मेदारी दी जा रही है. पहले भारत रक्षा बाजार था. अब वह रक्षा निर्माता बनने की कोशिश कर रहा है. यही बदलाव आने वाले 20 वर्षों में भारत की सैन्य और औद्योगिक शक्ति तय करेगा। 

AMCA सिर्फ एक लड़ाकू विमान नहीं है. यह भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षा, औद्योगिक आत्मविश्वास और रणनीतिक स्वतंत्रता की सबसे बड़ी परीक्षा है. अमेरिका को F-22 और F-35 जैसे स्टील्थ जेट विकसित करने में पांच से छह साल लगे. भारत अब दावा कर रहा है कि वह महज 30 महीनों में पहली उड़ान कराएगा. यह लक्ष्य बेहद कठिन है, शायद जोखिम भरा भी. लेकिन अगर भारत इसका आधा हिस्सा भी समय पर हासिल कर लेता है, तो यह साफ संकेत होगा कि देश चुपचाप दुनिया की नई डिफेंस टेक शक्तियों में शामिल हो रहा है। 

अजीत डोभाल की कूटनीति का असर? रूस पहुंचते ही पुतिन-तालिबान के बीच हुई बड़ी डील

नई दिल्ली

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई वर्षों की रूपरेखा तैयार कर देती हैं. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ. इस्लामाबाद में बैठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तालिबान और भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. उसी समय रूस में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और तालिबान एक साथ पाकिस्तान की फील्डिंग सेट कर रह थे. हालांकि दोनों के तरीके अलग-अलग थे, लेकिन जो कदम उठाए वह पाकिस्तान खिलाफ था. रूस में पहला इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम आयोजित किया गया, जिसमें 120 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि पहुंचे थे. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि भी यहां थे. भारत के NSA अजीत डोभाल ने कहा कि आतंकवाद पर ‘दोहरा मापदंड नहीं चलेगा’. वहीं दूसरी तरफ रूस और तालिबान के बीच सैन्य सहयोग समझौते पर मुहर लग रही थी. रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान अफगानिस्तान ने एयर डिफेंस सिस्टम भी मांगे. तीनों घटनाओं को अलग-अलग देखने पर तस्वीर अधूरी लग सकती है. लेकिन इन्हें एक साथ जोड़ें तो पाकिस्तान के लिए उभरती नई रणनीतिक चुनौती साफ दिखाई देती हैं। 

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की वर्षगांठ पर दिए संदेश में शहबाज शरीफ ने आरोप लगाया कि तालिबान सरकार भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं. डूरंड लाइन पर झड़पें बढ़ी हैं और पाकिस्तान की एयरफोर्स कई बार अफगानिस्तान के अंदर हवाई और सैन्य कार्रवाई कर चुकी है. लेकिन जब शहबाज शरीफ जहर उगल रहे थे, तब रूस में कुछ और ही हो रहा था। 

रूस में क्या हो रहा था?
रूस में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम में NSA अजीत डोभाल ने आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाया. डोभाल ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड नहीं हो सकता. जिम्मेदार देशों को तय करना होगा कि वे आतंकवाद के प्रायोजकों का समर्थन करेंगे या उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई. डोभाल ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन आतंकवाद को लेकर भारत का रुख लंबे समय से पाकिस्तान के खिलाफ रहा है. यानी जिस दिन शहबाज भारत और तालिबान पर आरोप लगा रहे थे, उसी दिन भारत रूस के मंच से आतंकवाद पर अपनी लाइन दुनिया के सामने रख रहा था. लेकिन पाकिस्तान को इसकी आदत है. इसीलिए पाकिस्तान के लिए असली बुरी खबर अफगानिस्तान से आई। 

असली कहानी रूस-तालिबान डील में छिपी है
द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा घटनाक्रम रूस और तालिबान के बीच हुआ सैन्य सहयोग समझौता है. रूस पहले ही जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बन चुका है. अब उसने रक्षा सहयोग को भी आगे बढ़ा दिया है. हालांकि समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन अफगानिस्तान की प्राथमिकताओं को देखकर कई सवाल उठ रहे हैं. तालिबान की सबसे बड़ी सैन्य चिंता पाकिस्तान की सीमा पार कार्रवाई है. पाकिस्तान ने पिछले कई महीनों में कई बार आतंकवाद विरोधी अभियान के नाम पर अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए हैं. अफगानिस्तान की नजर में यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है. यही वजह है कि अफगानिस्तान अब रूस से आधुनिक एयर डिफेंस क्षमता विकसित करना चाहता है ताकि भविष्य में अगर कोई उसकी हवाई सीमा का उल्लंघन करे तो जवाब दिया जा सके। 

पाकिस्तान की टेंशन क्यों बढ़ सकती है?
अभी तक पाकिस्तान के पास एक बड़ा रणनीतिक फायदा था. अफगानिस्तान के पास आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क नहीं है. लेकिन अगर रूस किसी स्तर पर एयर डिफेंस, रडार, सैन्य प्रशिक्षण, उपकरणों की मरम्मत या पुराने लेकिन प्रभावी रक्षा सिस्टम उपलब्ध कराता है, तो स्थिति बदल सकती है. तालिबानी रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने एयर डिफेंस मांगा है. हो सकता है कि भविष्य में रूस उसे S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम दे. यह भी हो सकता है कि अपने पुराने मिग या सुखोई जेट भी अफगानिस्तान को दे. इसका मतलब यह नहीं कि कल ही अफगानिस्तान को मिग या सुखोई विमान मिल जाएंगे. लेकिन यह जरूर है कि तालिबान पहली बार किसी बड़ी सैन्य शक्ति के साथ औपचारिक रक्षा साझेदारी बना रहा है. और यह बात पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को परेशान कर सकती है। 

हिंदू-सिख पर क्या बोला तालिबान?
मॉस्को में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने हिंदू और सिख समुदायों को अफगानिस्तान लौटने का खुला निमंत्रण भी दिया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान उनका भी देश है और तालिबान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा. यह सिर्फ सामाजिक बयान नहीं था. इसे तालिबान की उस कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है जिसमें वह दुनिया के सामने खुद को सिर्फ एक उग्रवादी संगठन नहीं बल्कि एक ‘सामान्य सरकार’ के रूप में पेश करना चाहता है। 

बंगाल कार्रवाई के बाद बढ़ा अलर्ट, आशंका- कहीं इस राज्य में न घुस आएं बांग्लादेशी घुसपैठिये

भुवनेश्वर

ओडिशा सरकार ने पश्चिम बंगाल के साथ सीमा साझा करने वाले अपने जिलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों के संभावित प्रवेश को लेकर सतर्क किया है। ओडिशा सरकार ने यह कदम पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी प्रशासन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ की नीति अपनाए जाने के बाद उठाया है।

पश्चिम बंगाल से सटे बालासोर और मयूरभंज जिलों के अधिकारियों को ओडिशा सरकार ने यह निर्देश तब जारी किए गए, जब उत्तर 24 परगना जिले के बसीरहाट उप-मंडल स्थित हाकिमपुर जांच चौकी पर बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों के एकत्र होने की खबर सामने आई।

सीमा पर अलर्ट
पुलिस उपमहानिरीक्ष
क (पूर्वी परिक्षेत्र) पिनाक मिश्रा ने कहा, ‘चूंकि संदिग्ध बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पश्चिम बंगाल के भीतर आवाजाही शुरू कर दी है, इसलिए उनके ओडिशा में प्रवेश की आशंका है। इसी कारण हम सतर्क हैं और ऐसी किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं।’ ओडिशा-पश्चिम बंगाल सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है ताकि राज्य में किसी भी प्रकार की अवैध आवाजाही को रोका जा सके।

मिश्रा ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से घुसपैठियों का पता लगाकर उन्हें कानून के तहत भारत से निर्वासित करने का स्थायी निर्देश है और हम उसी के अनुरूप कार्य कर रहे हैं। राज्य सरकार ने सभी जिलों विशेषकर सीमावर्ती जिलों में विशेष अभियान चलाया है। घुसपैठियों के जलमार्गों से प्रवेश की संभावना को लेकर मिश्रा ने बताया कि इसके लिए संबंधित पुलिस थानों को सतर्क कर दिया गया हैं।

दो जिलों में ज्यादा सतर्कता
बालासोर और मयूरभंज ओडिशा के दो ऐसे जिले हैं, जिनकी सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। बालासोर जिले के भोगराई और जलेश्वर ब्लॉक पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों से सटे हुए हैं, जबकि मयूरभंज जिले की पूर्वी सीमा का एक हिस्सा पश्चिम मेदिनीपुर जिले से लगता है।

राजनीतिक बयानबाजी शुरू
इस बीच, ओडिशा में बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया।

ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने कहा कि घुसपैठिये राज्य के लिए एक बड़ी समस्या हैं और राज्य सरकार उनकी पहचान तथा निर्वासन के लिए अभियान पहले ही शुरू कर चुकी है, जबकि बीजद नेता गणेश्वर बेहरा ने इस दावे को खारिज कर दिया।

बेहरा ने कहा, ‘ओडिशा में घुसपैठिये ही केवल बड़ी समस्या नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है, वहां उनकी संख्या लाखों में है। ओडिशा में उनकी संख्या 150 से भी कम है। साढ़े चार करोड़ की आबादी वाले राज्य में घुसपैठियों की संख्या करीब 150 हो सकती है। यह बहुत छोटा मुद्दा है, लेकिन राज्य सरकार प्रचार पाने के लिए राई का पहाड़ बना रही है।’

हालांकि, हरिचंदन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि ओडिशा में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों ‘बच नहीं सकते’। उन्होंने कहा कि हम राज्य में रह रहे अवैध विदेशी नागरिकों को निर्वासित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

पाकिस्तान बॉर्डर पर बाड़ से बदली सुरक्षा तस्वीर, अब बांग्लादेश सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी?

  नई दिल्ली

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में बॉर्डर फेंसिंग एक अहम बदलाव साबित हुई है. खासकर पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर बाड़ लगाने के बाद घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों में काफी कमी आई है. वहीं पूर्वी सीमा यानी बांग्लादेश बॉर्डर पर अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां स्मार्ट फेंसिंग (Smart Fencing) लगाए बिना सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत नहीं किया जा सकता। 

पाकिस्तान के साथ भारत की 3323 किलोमीटर लंबी सीमा है. पहले इस सीमा पर खुली जगहों से आतंकियों और तस्करों के घुसपैठ की घटनाएं आम थीं. 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान सेक्टर में घुसपैठ के जरिए आतंकी हमले होते थे। 

2010 के आसपास भारत सरकार ने पाकिस्तान बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) की मदद से फेंसिंग का काम तेज किया. आज ज्यादातर हिस्सों में ऊंची, मजबूत और बार्ड वायर वाली फेंसिंग लग चुकी है. इस फेंसिंग का सुरक्षा पर सकारात्मक असर साफ दिखता है. घुसपैठ की घटनाओं में भारी कमी आई है। 

पहले जहां हर साल सैकड़ों घुसपैठ की कोशिशें होती थीं, अब उनकी संख्या बहुत कम हो गई है. फेंसिंग के साथ-साथ लाइटिंग, कैमरा और पेट्रोलिंग भी बढ़ाई गई, जिससे BSF को निगरानी रखने में आसानी हुई. खासकर जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सुरक्षा स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है. कुछ इलाकों में टोपोग्राफी की वजह से फेंसिंग पूरी नहीं हो पाई है, लेकिन कुल मिलाकर पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने सुरक्षा को मजबूत किया है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर क्यों जरूरी है फेंसिंग?
बांग्लादेश के साथ भारत की 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे लंबी स्थलीय सीमाओं में से एक है. यह सीमा पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल, नदी-नालों और घने जंगलों वाली है. इस वजह से फेंसिंग लगाना मुश्किल और महंगा है. अब भी कई हिस्सों में कोई फेंसिंग नहीं है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर मुख्य चुनौतियां हैं – अवैध घुसपैठ, गाय तस्करी, ड्रग्स तस्करी, हथियारों की तस्करी और कभी-कभी आतंकियों का आना-जाना. चूंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए सीमा पार करना थोड़ा आसान है. यही वजह है कि सुरक्षा बलों को 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है. 

स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी है?
साधारण फेंसिंग के बजाय स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि बांग्लादेश बॉर्डर की भौगोलिक स्थिति अलग है. स्मार्ट फेंसिंग में सेंसर, CCTV कैमरा, इंफ्रारेड डिटेक्टर, ड्रोन निगरानी, AI आधारित मॉनिटरिंग और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम शामिल होते हैं। 

यह सिस्टम रात में भी काम करता है. घुसपैठ को तुरंत पकड़ लेता है और कंट्रोल रूम में अलर्ट भेजता है. इससे जवानों की जान बचती है. छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार पहले ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ इलाकों में स्मार्ट फेंसिंग लगा चुकी है. अब इसे पूरे बॉर्डर पर फैलाने की योजना है। 

स्मार्ट फेंसिंग पारंपरिक तार की बाड़ से काफी आगे की आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था है. इसमें साधारण फेंसिंग को सेंसर, कैमरा, AI और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ जोड़ दिया जाता है, ताकि सीमा पर कोई भी गतिविधि तुरंत पकड़ी जा सके. यह तकनीक खासकर लंबी और चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर बहुत उपयोगी है। 

स्मार्ट फेंसिंग में क्या-क्या होता है?

फिजिकल फेंस  

    ऊंची (8-10 फीट) मजबूत स्टील की बाड़ जिसमें बार्ब्ड वायर या इलेक्ट्रिफाइड तार लगे होते हैं.
    कुछ जगहों पर डबल लेयर फेंसिंग (दो दीवारें) भी लगाई जाती है.

सेंसर सिस्टम  

    मोशन सेंसर: कोई व्यक्ति या वस्तु पास आने पर डिटेक्ट करते हैं.
    इंफ्रारेड (IR) सेंसर: रात में भी गर्मी वाली वस्तुओं (मानव शरीर) को पकड़ते हैं.
    फाइबर ऑप्टिक सेंसर: फेंस पर कट या चढ़ाई करने पर अलर्ट.
    वाइब्रेशन सेंसर: फेंस हिलने या काटने पर सिग्नल भेजते हैं.

कैमरा नेटवर्क  

    PTZ कैमरा (Pan-Tilt-Zoom) जो 360 डिग्री घूम सकते हैं.
    थर्मल इमेजिंग कैमरा (रात में बिना रोशनी के देख सकते हैं).
    AI आधारित कैमरा जो इंसान, जानवर या वाहन को अलग-अलग पहचान सकते हैं.
AI और सॉफ्टवेयर  

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत अलर्ट (जैसे जानवर) को फिल्टर करता है.
    मशीन लर्निंग से सिस्टम समय के साथ और स्मार्ट होता जाता है.
    रियल-टाइम एनालिसिस करके कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजता है.

कमांड एंड कंट्रोल सेंटर  

    सभी सेंसर और कैमरे एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से जुड़े होते हैं.
    BSF जवान 24×7 मॉनिटरिंग करते हैं.
    अलर्ट मिलते ही तुरंत रिस्पॉन्स टीम भेजी जाती है.

अन्य टेक्नोलॉजी  

    ड्रोन पेट्रोलिंग
    सोलर पावर बैकअप
    GPS ट्रैकिंग
    मोबाइल ऐप पर अलर्ट

भारत में स्मार्ट फेंसिंग की स्थिति
भारत सरकार ने कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग को बढ़ावा दिया है. पाकिस्तान बॉर्डर पर पहले ही काफी हद तक फेंसिंग + स्मार्ट टेक्नोलॉजी लग चुकी है. बांग्लादेश बॉर्डर पर पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं. बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग जल्दी पूरी करने की तैयारी चल रही है। 

फायदे

    24×7 निगरानी: रात-दिन काम करता है.
    कम मैनपावर: कम जवानों के साथ ज्यादा क्षेत्र कवर होता है.
    तेज प्रतिक्रिया: अलर्ट मिलते ही एक्शन लिया जा सकता है.
    कम घुसपैठ: तस्करी और अनधिकृत प्रवेश में भारी कमी.
    डेटा संग्रह: लंबे समय में पैटर्न विश्लेषण करके बेहतर प्लानिंग.

चुनौतियां

    उच्च लागत: शुरुआती खर्च बहुत ज्यादा है.
    रखरखाव: नदियों, बाढ़ और जंगलों वाले इलाकों में रखरखाव मुश्किल.
    तकनीकी ट्रेनिंग: BSF जवानों को नई टेक्नोलॉजी का प्रशिक्षण देना पड़ता है.
    बिजली और इंटरनेट: दूर-दराज के इलाकों में बिजली और कनेक्टिविटी की समस्या.

पाकिस्तान बॉर्डर vs बांग्लादेश बॉर्डर

पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग मुख्य रूप से आतंकवाद और सैन्य घुसपैठ रोकने के लिए लगाई गई. वहीं बांग्लादेश बॉर्डर पर समस्या ज्यादातर आर्थिक, सामाजिक और अपराधिक है. यहां बड़े पैमाने पर अवैध माइग्रेशन होता है, जो स्थानीय संसाधनों और कानून-व्यवस्था पर दबाव डालता है। 

स्मार्ट फेंसिंग बांग्लादेश बॉर्डर पर इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि यहां पारंपरिक फेंसिंग लगाना मुश्किल है. नदियां, दलदल और घने जंगल फेंसिंग को नुकसान पहुंचाते हैं. स्मार्ट टेक्नोलॉजी इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम है. पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने दिखा दिया कि मजबूत बाड़ सुरक्षा को कितना बेहतर बना सकती है। 

अब बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत है ताकि पूर्वी सीमा को भी सुरक्षित और आधुनिक बनाया जा सके. सरकार इस दिशा में काम कर रही है. अगर समय पर स्मार्ट फेंसिंग पूरी हो गई तो भारत की सीमा सुरक्षा और मजबूत होगी, जिससे देश के अंदर शांति और विकास को बढ़ावा मिलेगा। 

सस्ते मोबाइल के चक्कर में हो रहे साइबर फ्रॉड का शिकार, Cyber Wing ने जारी किया अलर्ट

नई दिल्ली
भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, खासकर स्मार्टफोन खरीदने के लिए लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर काफी भरोसा कर रहे हैं. हर महीने हजारों लोग ई-कॉमर्स या अन्य वेबसाइट्स से मोबाइल फोन खरीदते हैं।

जैसे-जैसे ऑनलाइन खरीदारी का ट्रेंड बढ़ा है, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों ने भी नए-नए तरीके को अपनाकर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है. आज साइबर ठग केवल फर्जी कॉल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नकली वेबसाइट, सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी डिलीवरी एजेंट, रिफंड फ्रॉड और स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स के जरिए लोगों के बैंक खाते खाली कर रहे हैं।

खास बात यह है कि ज्यादातर लोग बड़े डिस्काउंट, फ्लैश सेल और ‘सीमित समय ऑफर’ के लालच में आकर ठगी का शिकार बन जाते हैं. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ऑनलाइन शॉपिंग से जुड़े साइबर फ्रॉड के मामलों में लगभग 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। 

एक्सपर्ट का कहना है कि फेस्टिवल, सेल सीजन और नए स्मार्टफोन लॉन्च के दौरान ऐसे मामलों में तेजी से उछाल आता है।
मोबाइल शॉपिंग फ्रॉड? साइबर क्रिमिनल्स कौन सा अपनाते हैं तरीका.

1. फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स का जाल
साइबर अपराधी बिल्कुल असली वेबसाइट जैसी दिखने वाली नकली साइट तैयार करते हैं. इन वेबसाइट्स पर महंगे फोन बेहद कम कीमत में दिखाए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर 1 लाख रुपये का फोन 25 या 30 हजार रुपये में ऑफर किया जाता है. यूजर जब वेबसाइट पर जाकर पेमेंट करते हैं, तो या तो डिलीवरी नहीं होती या फिर खाली डिब्बा भेज दिया जाता है. कई मामलों में वेबसाइट कुछ दिनों बाद गायब भी हो जाती है।

2 सोशल मीडिया विज्ञापनों से ठगी
इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर 90 प्रतिशत डिस्काउंट, स्टॉक क्लियरेंस सेल या सरकारी नीलामी जैसे विज्ञापन चलाए जाते हैं. इन विज्ञापनों पर क्लिक करते ही यूजर फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दिखने वाले हर विज्ञापन की सत्यता जांचना जरूरी है क्योंकि ठग अब AI आधारित डिजाइन और नकली रिव्यू का इस्तेमाल कर रहे हैं।

3. नकली कस्टमर केयर और रिफंड फ्रॉड
कई बार लोग किसी ऑनलाइन ऑर्डर की शिकायत करने के लिए इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं. साइबर अपराधी गूगल सर्च में फर्जी नंबर डाल देते हैं. जैसे ही ग्राहक कॉल करता है, उसे AnyDesk, TeamViewer या QuickSupport जैसे ऐप डाउनलोड करवाए जाते हैं. फिर  स्क्रीन शेयर होते ही ठग बैंकिंग ऐप, यूपीआई और OTP तक पहुंच बना लेते हैं. कुछ ही मिनटों में अकाउंट खाली हो जाता है।

4. फर्जी पेमेंट लिंक और फिशिंग
ठग WhatsApp, SMS या ईमेल के जरिए भुगतान लिंक भेजते हैं. लिंक बिल्कुल असली वेबसाइट जैसा दिखाई देता है. यूजर जैसे ही कार्ड डिटेल या यूपीआई जानकारी भरता है, उसकी सारी जानकारी अपराधियों के पास पहुंच जाती है. साइबर सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक भारत में हर दिन हजारों फिशिंग लिंक एक्टिव किए जाते हैं।

5. डिलीवरी स्कैम
कुछ मामलों में ठग खुद को डिलीवरी एजेंट बताते हैं. वे कहते हैं कि ‘डिलीवरी कन्फर्म करने के लिए OTP बताइए’ या ‘QR कोड स्कैन करें. लोग बिना सोचे-समझे जानकारी साझा कर देते हैं और उनके खाते से पैसे निकल जाते हैं।

क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे अपराध?
साइबर मामलों से जुड़े एक्सपर्ट यह मानते हैं कि डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी के विस्तार के साथ साइबर अपराधियों को नए अवसर मिल रहे हैं. भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऑनलाइन खरीदारी तेजी से बढ़ रही है. युवा वर्ग जल्दी डिस्काउंट और ऑफर के चक्कर में आ जाता है. कई लोग साइबर सुरक्षा के बेसिक नियमों से अनजान हैं. यही कारण है कि साइबर ठग लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं।

कैसे पहचाने कि ऑनलाइन ऑफर फर्जी है?
यदि कोई फोन बाजार मूल्य से आधे या उससे भी कम दाम पर मिल रहा है, तो सतर्क हो जाइए. कई नकली वेबसाइट्स असली नाम से मिलते-जुलते डोमेन बनाती हैं. इसमे ऑफर या फेक सेल जैसे नाम हैं. देकर प्रोडक्ट को जल्द से जल्द बेचने का प्रयास उनके द्वारा किया जाता है. इस दौरान जब उपभोक्ता ऑनलाइन पेमेंट के लिए जाता है तो वेबसाइट केवल एडवांस पेमेंट मांग रही है और COD विकल्प नहीं दे रही, तो शक करना चाहिए।

फर्जी वेबसाइट्स पर अक्सर टूटी-फूटी हिंदी या अंग्रेजी होती है. कई बार सभी रिव्यू एक जैसे दिखते हैं तो आप समझ जाइए कि यहां पर ऑनलाइन फ्रॉड होने वाला है. अगर इस तरीके के ऑफर आ रहे हैं तो भी समझिए कि यह फ्रॉड करने वाली वेबसाइट है. केवल 5 मिनट का ऑफर, अभी खरीदें वरना मौका खत्म, जैसे मैसेज लोगों पर मानसिक दबाव बनाते हैं।
कैसे सुरक्षित ऑनलाइन खरीदारी करें

केवल भरोसेमंद प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें

मोबाइल हमेशा ऑथराइज्ड वेबसाइट या जाने-माने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से खरीदें. ब्रांड की ऑफिशियल साइट सबसे सुरक्षित विकल्प मानी जाती है।

वेबसाइट का URL जरूर जांचें

वेबसाइट के नाम के आगे HTTPS और लॉक का निशान देखें. गलत स्पेलिंग वाली साइट से बचें.

डिलीवरी के समय वीडियो रिकॉर्ड करें
 

फोन की अनबॉक्सिंग करते समय वीडियो रिकॉर्ड करना सुरक्षित माना जाता है. इससे विवाद की स्थिति में सबूत रहता है.

IMEI नंबर चेक करें

फोन मिलने के बाद *#06# डायल करके IMEI नंबर देखें और बॉक्स पर लिखे नंबर से मिलाएं.संचार साथी पोर्टल पर भी IMEI की जांच की जा सकती है.

OTP और UPI PIN कभी साझा न करें

कोई भी बैंक, कंपनी या डिलीवरी एजेंट OTP नहीं मांगता. OTP साझा करना सीधे खाते तक पहुंच देना है.

स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स से दूर रहें

अनजान व्यक्ति के कहने पर AnyDesk या TeamViewer जैसे ऐप डाउनलोड न करें.
लोगों को बचाने के लिए सरकार चला रही अभियान

सरकार लगातार साइबर अपराध रोकने के लिए अभियान चला रही है. गृह मंत्रालय के तहत इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर्स (I4C) लोगों को जागरूक करने के लिए डिजिटल कैंपेन चला रहा है.इसके अलावा बैंकों और ई-कॉमर्स कंपनियों को भी सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.  कई फर्जी वेबसाइट्स और साइबर गैंग्स के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है।

ऑनलाइन मोबाइल खरीदारी सुविधाजनक जरूर है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही भारी नुकसान पहुंचा सकती है. साइबर अपराधी लोगों की जल्दबाजी, लालच और तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं. सस्ते ऑफर, फर्जी वेबसाइट और नकली कॉल के जाल में फंसने से बचने के लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी है. याद रखें कि सुरक्षित डिजिटल व्यवहार ही साइबर ठगी से सबसे बड़ा बचाव है. अगर कोई ऑफर जरूरत से ज्यादा अच्छा लगे, तो पहले उसकी जांच करें क्योंकि ऑनलाइन दुनिया में सतर्कता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

मोदी सरकार की नई स्कीम का बड़ा तोहफा, मिलेगा कैश, आसान लोन और इंश्योरेंस का लाभ

नई दिल्ली

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी सुविधाओं के लिए स्कीम लाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इसके तहत सरकार एक्सीडेंटल इंश्योरेंस, हेल्थ फैसलिटीज, मैटरनिटी सपोर्ट, बुजुर्गों के लिए सुरक्षा, कैश, एजुकेशन लोन और अंतिम संस्कार जैसे खर्चों के लिए आर्थिक मदद देने की तैयारी में है। यह जानकारी श्रम और रोजगार मंत्रालय के संयुक्त सचिव और महानिदेशक (श्रम कल्याण) आशुतोष पेडनेकर ने दी है।

सरकार ने बढ़ाए कदम
पेडनेकर ने बताया कि सरकार गिग वर्कर्स को सुविधाएं देने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं। इसके लिए नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड फॉर गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स को लागू करने की हरी झंडी दी गई है। यह बोर्ड इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर काम करेगा। इसके साथ ही गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए एक सोशल सिक्योरिटी फंड भी बनाया जा रहा है।

इस फंड के जरिए सरकार गिग वर्कर्स के लिए एक्सीडेंटल इंश्योरेंस, हेल्थ फैसलिटीज, मैटरनिटी सपोर्ट, बुजुर्गों के लिए सुरक्षा, कैश, एजुकेशन लोन और अंतिम संस्कार जैसे खर्चों के लिए आर्थिक मदद करेगी। इन योजनाओं के स्वरूप को अंतिम रूप देने के लिए सरकार फंड मैनेजर्स और दूसरे संबंधित पक्षों से बातचीत कर रही है। सरकार की ओर से इसके लिए प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपने कर्मचारियों का डेटा 22 जून तक ई-श्रम पोर्टल से जोड़ने को कहा गया है। इससे कामगारों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मिल सके।

कंपनियों के लिए क्या प्लान?
सरकार की योजना के तहत एग्रीगेटर कंपनियों का डेटा और ई-श्रम पोर्टल एक-दूसरे से सीधे जुड़ेंगे। इससे कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं की रियल-टाइम ट्रैकिंग संभव होगी। कामगार मोबाइल ऐप के जरिए अपने अधिकारों और इस्तेमाल की जानकारी भी देख सकेंगे।

गिग वर्कर्स कौन हैं?
गिग वर्कर्स ऐसे कर्मचारी होते हैं जो पारंपरिक कर्मचारी-नियोक्ता संबंध से बाहर रहकर तय समय या प्रोजेक्ट के आधार पर काम करते हैं। इसमें फ्रीलांसर, स्वतंत्र ठेकेदार और पार्ट-टाइम कर्मचारी आदि शामिल हो सकते हैं। वहीं, प्लेटफॉर्म वर्कर्स वे हैं जो किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे लोगों या कंपनियों को सेवाएं देते हैं। उदाहरण से समझें तो ओला-उबर के ड्राइवर या स्विगी-जोमैटो के डिलीवरी ब्वॉय प्लेटफॉर्म वर्कर की कैटेगरी में आते हैं।

भारत में पहली बार नए श्रम कानूनों के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है। फिलहाल देश में करीब 1 करोड़ गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स काम कर रहे हैं और सरकार को उम्मीद है कि दशक के अंत तक यह संख्या बढ़कर 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत का दबदबा, राजनाथ बोले- 4 दिन में ही पाकिस्तान ने मांगा युद्धविराम

नई दिल्ली 
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने मात्र चार दिनों के भीतर पाकिस्तान को युद्धविराम की अपील करने पर मजबूर कर दिया। यह जानकारी शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि भारत की निर्णायक इच्छाशक्ति, आधुनिक सैन्य क्षमता और तीनों सेनाओं के उत्कृष्ट तालमेल का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि भारत द्वारा अब तक लड़े गए युद्धों और अभियानों की तुलना में ऑपरेशन सिंदूर कई मायनों में अलग और अत्यंत प्रभावशाली रहा। दरअसल देश की सैन्य शक्ति, रणनीतिक क्षमता और सैनिकों के अदम्य साहस का प्रतीक बन चुके ऑपरेशन सिंदूर को लेकर शुक्रवार को एक विशेष अवसर देखने को मिला। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान पर आधारित एक स्मारक प्रकाशन का विमोचन किया। नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह में भारतीय सेनाओं के शीर्ष अधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान पूरा वातावरण गर्व, सम्मान तथा राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत दिखाई दिया।

 इस दौरान रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत के सैन्य इतिहास की एक अभूतपूर्व सफलता बताया। राजनाथ सिंह ने कहा कि शुक्रवार को जारी किया गया स्मारक प्रकाशन केवल घटनाओं का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह उन सैनिकों की भावनाओं, संघर्षों और अनुभवों को भी सामने लाता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों और रणनीतियों से नहीं जीते जाते, बल्कि उनमें नेतृत्व, साहस, मानसिक दृढ़ता और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। यह पुस्तक इन्हीं पहलुओं को बेहद मानवीय और प्रेरणादायक तरीके से प्रस्तुत करती है।

उन्होंने कहा कि जब देश के सैनिक सीमाओं पर अपने प्राणों की बाजी लगाते हैं, तब राष्ट्र के नागरिकों का भी दायित्व बनता है कि वे देशहित को सर्वोपरि रखें। रक्षा मंत्री ने लोगों से अपील की कि वे इस प्रकाशन से प्रेरणा लें और ऐसे जिम्मेदार नागरिक बनें जो देश की संप्रभुता और सुरक्षा के महत्व को गहराई से समझ सकें।

समारोह में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी तथा सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की रणनीतिक योजना, संयुक्त सैन्य समन्वय, आधुनिक तकनीक के उपयोग और जमीनी स्तर पर सैनिकों के साहसिक प्रदर्शन पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय सशस्त्र बल अब पारंपरिक युद्ध सीमाओं से आगे बढ़कर तेज, सटीक और बहुआयामी सैन्य अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम देने में सक्षम हैं। इस अभियान ने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। स्मारक प्रकाशन को सैनिकों के साहस, समर्पण और राष्ट्रभक्ति को समर्पित एक जीवंत दस्तावेज माना जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देने का कार्य करेगा। 

NEET मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, NTA को लगाई फटकार; अब PM खुद कर रहे निगरानी

नई दिल्ली
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह पूरा मामला बेहद दर्दनाक और परेशान करने वाला है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि लाखों छात्र सालों तक मेहनत करते हैं, अपना समय, पैसा और भावनाएं इस परीक्षा में लगाते हैं। ऐसे में अगर हर साल परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा दाग है। वहीं इस मामले में केंद्र की तरफ से उचित कार्रवाई का भरोसा दियाला गया है। केंद्र की तरफ से अदालत में ये बताया गया कि पीएम मोदी खुद इस मामले में निगरानी रख रहे हैं।

एनटीए को खत्म करने की उठी मांग
गौरतलब है कि एनटीए को खत्म करने के लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। यह याचिका फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन यानी फाइमा और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट यानी यूडीएफ की तरफ से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि एनटीए को या तो खत्म किया जाए या फिर उसका पूरा ढांचा बदला जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि भविष्य में मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक स्वतंत्र संस्था बनाई जाए, ताकि छात्रों का भरोसा दोबारा कायम हो सके।

पूरी तरह सुरक्षित व्यवस्था कहां है: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए और पूर्व इसरो प्रमुख डॉक्टर के. राधाकृष्णन से सीधे सवाल पूछा कि आखिर बार-बार पेपर लीक और परीक्षा गड़बड़ियां क्यों हो रही हैं। कोर्ट ने कहा, “आपने कहा था कि मजबूत और सुरक्षित व्यवस्था बनाई जाएगी। फिर हर बार ऐसी घटनाएं कैसे हो रही हैं?” अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे समिति की सिफारिशें नाकाम साबित हो रही हैं या फिर उन्हें सही तरीके से लागू ही नहीं किया गया।

राधाकृष्णन समिति ने क्या कहा?
पूर्व इसरो प्रमुख डॉक्टर के. राधाकृष्णन भी अदालत में मौजूद थे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 2024 में बनी समिति ने लगभग 35 लंबी अवधि और 60 छोटी अवधि वाली सिफारिशें दी थीं। उनके मुताबिक इनमें से ज्यादातर सुझाव लागू भी कर दिए गए हैं। हालांकि कोर्ट इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा और पूछा कि अगर सुधार लागू हो चुके हैं तो फिर गड़बड़ियां कैसे जारी हैं।

जवाबदेही तय करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा जोर जवाबदेही तय करने पर दिया। अदालत ने कहा कि यह पता होना चाहिए कि आखिर इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कौन है। कोर्ट ने कहा, “जिम्मेदारी किसी के कंधे पर तय होनी चाहिए। हमें बताइए कि आखिर जवाबदेह व्यक्ति कौन है।” यह टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि अब तक पेपर लीक मामलों में अक्सर सिस्टम की खामी की बात होती रही है, लेकिन व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने की मांग कम ही उठी थी।

जस्टिस नरसिम्हा ने उठाया निगरानी पर सवाल
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा ने कहा कि केवल सिफारिशें बना देना काफी नहीं है। असली सवाल यह है कि उनकी निगरानी और लागू करने की प्रक्रिया कितनी मजबूत थी। उन्होंने कहा कि अगर एक उच्च स्तरीय समिति बनने के बाद भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो या तो सिफारिशों में कमी है या फिर उन्हें जमीन पर ठीक से लागू नहीं किया गया।

नीट यूजी 2026 के लिए क्या नए सुरक्षा इंतजाम किए गए?
एनटीए की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि नीट यूजी 2026 के लिए कई नए सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं ताकि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं को रोका जा सके। इन उपायों में आधार आधारित जैविक पहचान सत्यापन, चेहरे की पहचान जांच, सभी परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित गड़बड़ी पकड़ने वाली तकनीक और मोबाइल संकेत अवरोधक शामिल हैं। इसके अलावा प्रश्न पत्रों के परिवहन और सुरक्षित भंडारण के लिए भी कड़े नियम बनाए गए हैं। कई केंद्रों पर पुलिस तैनाती भी बढ़ाई गई है।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?
एनटीए की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दोबारा परीक्षा पूरी सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर बैठक हुई है और सरकार पूरी गंभीरता से काम कर रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सभी सुरक्षा उपाय सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, क्योंकि ऐसा करने से उनका मकसद कमजोर पड़ सकता है। तुषार मेहता ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस पूरे मामले की निगरानी कर रहे हैं और भविष्य में परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापक तंत्र तैयार किया जाएगा।

चीन बना रहा ‘पाताल लोक’ जैसा खतरनाक हथियार नेटवर्क? सैटेलाइट तस्वीरों से बड़ा खुलासा

नई दिल्ली

चीन के दूर-दराज के रेगिस्तानी इलाके में एक विशाल सैन्य परिसर तेजी से तैयार हो रहा है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिसर ऐसा बनाया जा रहा है कि अगर अमेरिका ने चीन के परमाणु हथियारों पर पहला हमला भी कर दिया, तो भी चीन के पास जवाबी हमला करने की पूरी क्षमता बनी रहे। 

सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि चीन अपने सबसे लंबी दूरी की मिसाइलों वाले साइलो क्षेत्रों के पास सैकड़ों लॉन्च पैड, बंकर और कम्युनिकेशन नेटवर्क बना रहा है. यह निर्माण चीन की परमाणु शक्ति को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

चीन पहले से ही ऐसी मिसाइलें बना चुका है जो अमेरिका के किसी भी शहर तक पहुंच सकती हैं. अब वह इन मिसाइलों को और सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। 

क्या बन रहा है रेगिस्तान में?
पूर्वी शिनजियांग क्षेत्र में दो अष्टकोण (Octagon) आकार के विशाल सैन्य परिसर बनाए गए हैं. इनमें से एक उत्तरी अष्टकोण और दूसरा दक्षिणी अष्टकोण है. इनके चारों ओर सैकड़ों कंक्रीट पैड (Launch Pads) बनाए जा रहे हैं। 

विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये पैड मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इन अष्टकोण संरचनाओं में सैनिकों के रहने की व्यवस्था, बड़े वाहनों के लिए शेड, हथियार भंडारण बंकर और कमांड सेंटर भी हैं। 

सैटेलाइट इमेजरी में साफ दिख रहा है कि इन परिसरों के आसपास सड़कें, रेलवे लाइन, एयरफील्ड और ईंधन स्टोरेज सुविधाएं भी बनाई जा रही हैं. हाल के महीनों में इन इलाकों में बड़े सैन्य वाहनों की गतिविधियां और अभ्यास भी देखे गए हैं। 

दूसरी स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करना
चीन की परमाणु नीति नो फर्स्ट यूज (पहले हमला न करने) पर आधारित है. इसका मतलब है कि चीन कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ तो जवाब जरूर देगा. इसी सेकंड स्ट्राइक की क्षमता को और मजबूत करने के लिए चीन यह पूरा नेटवर्क बना रहा है. अगर अमेरिका या कोई दूसरा देश चीन के साइलो को नष्ट करने की कोशिश भी करे, तो मोबाइल लॉन्चर और बंकरों की मदद से चीन जवाबी हमला कर सकेगा। 

अमेरिका के साथ बढ़ता परमाणु प्रतिस्पर्धा
अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है, खासकर ताइवान को लेकर. चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान मुद्दे पर हस्तक्षेप कर सकता है. ऐसे में चीन अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है. पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन 2030 तक 1000 परमाणु वॉरहेड बना सकता है. चीन अब साइलो-बेस्ड मिसाइलों के साथ-साथ मोबाइल लॉन्चर और सबमरीन-बेस्ड मिसाइलों पर भी जोर दे रहा है। 

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन का यह निर्माण अभूतपूर्व है। 

    फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट के सदस्य हंस क्रिस्टेंसन ने कहा कि मैंने पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा. यह एक असाधारण प्रयास है। 

    पैसिफिक फोरम के अलेक्जेंडर नील का मानना है कि हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह इंफ्रास्ट्रक्चर चीन की रणनीतिक परमाणु क्षमता को बहुत मजबूत करेगा। 

    कार्नेगी एंडाउमेंट के टोंग झाओ कहते हैं कि ये अष्टकोण संरचनाएं कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन (C3) सिस्टम से जुड़ी हो सकती हैं, जो परमाणु हमले के समय बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। 

भारत के लिए क्या मायने रखता है?
चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता भारत के लिए भी चिंता का विषय है. भारत और चीन की सीमा पर तनाव बना हुआ है. अगर चीन अपनी परमाणु क्षमता को इतनी तेजी से बढ़ा रहा है, तो भारत को भी अपनी रणनीतिक क्षमता पर ध्यान देने की जरूरत है. भारत पहले से ही अग्नि-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर चुका है, लेकिन चीन की गति काफी तेज है। 

चीन रेगिस्तान में जो विशाल परिसर बना रहा है. वह सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि एक मजबूत परमाणु प्रतिरोध की तैयारी है. अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच चीन सेकंड स्ट्राइक क्षमता को इतना मजबूत कर रहा है कि कोई भी देश उसे आसानी से निशाना नहीं बना सके। 

 

 

दहेज प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बोला- जिनसे पैसे लेते हो, उन्हें ही भिखारी कहते हो

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना को लेकर समाज को कड़ा संदेश दिया है. कोर्ट ने बहू-बेटियों के अपमान पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. एक मामले की सुनवाई के दौरान देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ कहा कि लड़कों को शादी के बाद दूसरों की बेटियों और उनके परिवार का अपमान करने का कोई हक नहीं है. सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में पूछा, ‘आप जिनसे पैसे लेते हो, आखिर उनको ही भिखारी कैसे कह सकते हो?’ इसी सख्त रुख के साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी पति तथा उसके परिवार को कोई राहत देने से इनकार करते हुए उन्हें जेल भेजने का फैसला लिया।

दरअसल, यह पूरा मामला दहेज हत्या और खुदकुशी के लिए उकसाने से जुड़ा हुआ था. इस केस में आरोपी पक्ष कोर्ट से कानूनी राहत की उम्मीद कर रहा था. हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लड़के वालों के पुराने बर्ताव पर बार-बार गहरी नाराजगी जताई. जजों का साफ मानना था कि ऐसे गंभीर मामलों में ढिलाई बरतने से समाज में गलत संदेश जाता है. इसी वजह से अदालत ने आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने हमारे समाज की इस कड़वी हकीकत पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने सवाल किया, ‘आखिर लड़के, लड़कियों से शादी ही क्यों करते हैं, जब उन्हें बाद में लड़की और उसके पूरे परिवार का अपमान ही करना होता है?

इसी बीच, जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर तो सिर्फ आईपीसी की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत आरोप लगे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. जस्टिस नागरत्ना ने वकील की दलील पर तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि आप पर सिर्फ धारा 498A लगी है और इसमें केवल तीन साल की ही सजा का प्रावधान है। 

बहू को पैसा निकालने वाली मशीन न समझें: सुप्रीम कोर्ट
इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने शादियों के बाद लड़कियों के ससुराल में होने वाले आर्थिक शोषण पर भी गहरी चिंता जताई. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने लड़के वालों की मानसिकता पर चोट करते हुए टिप्पणी की कि आजकल शादी के बाद ससुराल में दुल्हन तथा उसके माता-पिता को पूरी तरह से निचोड़ लेने यानी पैसे ऐंठने की कोशिश की जाती है। 

इतना ही नहीं, अदालत ने लड़की के मायके वालों से पैसे मांगने और फिर उन्हें ही नीचा दिखाने वाले रवैए को बेहद शर्मनाक माना है. बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि समाज में अब यह मैसेज जाना चाहिए कि कोई भी परिवार किसी की बेटी को लाकर उसका या उसके माता-पिता का मानसिक तथा आर्थिक उत्पीड़न नहीं कर सकता. आरोपियों की याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने यह जता दिया कि देश का कानून अब बहू-बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह से मुस्तैद है। 

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu