प्रदेश के बंगला पान की महक पड़ोसी देशों तक

प्रदेश के बंगला पान की महक पड़ोसी देशों तक

पान की खेती को प्रोत्साहित करने 10 जिलों के लिये बनी विशेष कार्य योजना

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में किसान कल्याण के लिये निरंतर कार्य किये जा रहे। इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे है। आज मध्यप्रदेश का पान अपनी विशिष्ट सुगंध, कोमलता और स्वाद के कारण देश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। प्रदेश के छतरपुर, रीवा, मंदसौर, नरसिंहपुर और टीकमगढ़ जैसे जिलों में पान की खेती वर्षों से की जा रही है, जो आज किसानों की आय का एक मजबूत आधार बनती जा रही है। विशेष रूप से छतरपुर का “बंगला पान” अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी मांग पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका तक फैली हुई है।

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पान की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्य योजना लागू की गई है, जिसके तहत 10 जिलों को शामिल करते हुए 1 करोड़ 3 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना में किसानों को प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, उन्नत किस्मों की रोपाई सामग्री और बरोज निर्माण के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

छतरपुर में उगाया जाने वाला बंगला पान अपनी पतली बनावट, हल्की मिठास और लंबे समय तक ताजगी बनाए रखने की क्षमता के कारण निर्यात के लिए उपयुक्त माना जाता है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर रीवा जिले के महसांव क्षेत्र के 2 गांवों में उत्पादित पान की पहचान भी विशेष है। यहां का पान उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों—वाराणसी, प्रयागराज और लखनऊ—तक बड़े पैमाने पर भेजा जाता है, वहां इसे अत्यंत पसंद किया जाता है।

मध्यप्रदेश में पान की खेती मुख्यतः चौरसिया समाज द्वारा परंपरागत रूप से की जाती रही है। यह समाज पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा है और अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उच्च गुणवत्ता का पान तैयार करता है। पान की खेती में “बरोज” नामक संरक्षित ढांचे का उपयोग किया जाता है, जिसमें तापमान और नमी को नियंत्रित कर पौधों की विशेष देखभाल की जाती है। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य होती है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप उत्कृष्ट गुणवत्ता का पान प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में पान उत्पादकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों के बढ़ते प्रचलन ने पारंपरिक पान की मांग को प्रभावित किया है। युवा पीढ़ी में इन उत्पादों की ओर झुकाव बढ़ने से पान की खपत में कुछ कमी आई है, जिससे किसानों की आय पर भी असर पड़ा है। इसके बावजूद, पारंपरिक पान की सांस्कृतिक और धार्मिक उपयोगिता आज भी बनी हुई है, जो इसकी स्थिर मांग को बनाए रखती है।

पान का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है। यह न केवल स्वाद और ताजगी का प्रतीक है, बल्कि पूजा-पाठ, विवाह समारोह और अतिथि सत्कार में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। इस सांस्कृतिक महत्व के कारण पान की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है।

मध्यप्रदेश का पान न केवल स्थानीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना रहा है। यदि पान उत्पादकों को उचित प्रोत्साहन, विपणन सुविधा और जागरूकता मिले, तो यह क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

 

बैंगन के दाम गिरने से परेशान किसान ने उजाड़ी चार बीघा फसल

 बड़वानी

 जिले के ग्राम करी में बैंगन की फसल के दाम नहीं मिलने से परेशान एक किसान ने अपनी चार बीघा फसल पर ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट कर दिया।

शुक्रवार को सामने आई इस घटना ने किसानों के बीच चिंता और चर्चा का विषय बना दिया है। किसान का कहना है कि मंडी में बैंगन का भाव इतना गिर गया कि तोड़ाई और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया था।

सेंगाव निवासी किसान राधेश्याम गेहलोद ने बताया कि उन्होंने इस सीजन में चार बीघा जमीन पर बैंगन की खेती की थी।

फसल तैयार करने में उन्होंने और परिवार के सदस्यों ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन बाजार में उचित दाम नहीं मिलने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा।

एक बीघा में 50 हजार तक की लागत

किसान के मुताबिक, एक बीघा बैंगन की खेती में करीब 50 हजार रुपए खर्च हुए। इसमें खाद, दवा, सिंचाई और मजदूरी शामिल है। इस हिसाब से चार बीघा में कुल लागत दो लाख रुपए से अधिक पहुंच गई। अच्छी पैदावार होने के बावजूद लागत निकलना भी मुश्किल हो गया।

50-60 बोरी बैंगन लेकर पहुंचे मंडी

  •     राधेश्याम गेहलोद ने बताया कि वे 50 से 60 बोरी बैंगन लेकर मंडी पहुंचे थे।
  •     प्रत्येक बोरी में करीब 50 से 60 किलो बैंगन भरा था।
  •     उन्हें उम्मीद थी कि बैंगन 10 से 12 रुपए किलो तक बिकेगा।
  •     लेकिन मंडी में भाव करीब 1 रुपए किलो मिला। कई व्यापारियों ने इस भाव पर भी खरीदने में रुचि नहीं दिखाई।
  •     किसान ने कहा कि ऐसी स्थिति में फसल तोड़ने, मजदूरी देने और मंडी तक ले जाने का खर्च भी निकलना संभव नहीं था।
  •     मजबूरी में उन्होंने खेत में खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट कर दिया।

“घाटे से बचने के लिए पशुओं को खिला रहे बैंगन”

किसान के बेटे ने बताया कि इस बार बैंगन की बंपर पैदावार हुई थी, लेकिन दाम गिरने से किसान परेशान हैं। उन्होंने कहा कि कुछ किसान फसल खेत में ही छोड़ रहे हैं, जबकि कई किसान बैंगन पशुओं को खिला रहे हैं, ताकि अतिरिक्त नुकसान से बचा जा सके। दीपक के अनुसार, सीजन की शुरुआत में अच्छी गुणवत्ता वाला बैंगन करीब 5 रुपए किलो तक बिका था, लेकिन पिछले 20 दिनों से लगातार भाव गिरते जा रहे हैं। अब हालत यह है कि व्यापारी एक रूपये किलो में भी बैंगन खरीदने से बच रहे हैं।
महंगे डीजल और ट्रांसपोर्ट को बताया वजह

किसान परिवार ने संकट के लिए बढ़ती ट्रांसपोर्ट लागत और सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि डीजल महंगा होने से भाड़ा बढ़ गया है, जिसके कारण बाहर के व्यापारी बड़वानी मंडी से माल उठाने नहीं आ रहे। मंडी में बैंगन की आवक तो लगातार हो रही है, लेकिन खपत नहीं होने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

 

90 डिग्री ओवरब्रिज सुधारने उतरे IIT भुवनेश्वर के एक्सपर्ट, अब बाकी पुलों पर उठे सवाल

भोपाल

मध्य प्रदेश में रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) और फ्लाईओवर के निर्माण में सामने आ रही तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए पीडब्ल्यूडी अब देश के प्रतिष्ठित आईआईटी संस्थानों की मदद ले रहा है. विभाग ने राज्य के कई बड़े प्रोजेक्ट्स की डिजाइन और तकनीकी जांच के लिए अलग-अलग आईआईटी के साथ अनुबंध किया है. अब तक आईआईटी दिल्ली, मुंबई, भुवनेश्वर और इंदौर को इस काम में शामिल किया जा चुका है। 

भोपाल के ऐशबाग रेलवे ओवर ब्रिज का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. इस ब्रिज के डिजाइन में 90 डिग्री का मोड़ होने के कारण इसकी काफी आलोचना हुई थी. अब इस बिगड़े हुए डिजाइन को सुधारने की जिम्मेदारी आईआईटी भुवनेश्वर को सौंपी गई है. पीडब्ल्यूडी इस ब्रिज की नई डिजाइन तैयार करवा रहा है ताकि भविष्य में लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। 

एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे
आईआईटी दिल्ली को रीवा और जबलपुर के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी दी गई है. दिल्ली आईआईटी विशेषज्ञों की टीम रीवा के एक प्रोजेक्ट और जबलपुर के एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे कर रही है. इन तीनों परियोजनाओं की लागत करीब 500 करोड़ रुपए बताई जा रही है. इन प्रोजेक्ट्स का पहला सर्वे पूरा हो चुका है और तकनीकी सुधारों पर काम जारी है। 

इटारसी के सांवलखेड़ा में बन रहे रेलवे ओवर ब्रिज में भी कुछ तकनीकी खामियां सामने आई थीं. इस परियोजना में आईआईटी मुंबई, आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों के साथ मिलकर समाधान पर काम कर रहा है. एक्सपर्ट ब्रिज की डिजाइन और निर्माण गुणवत्ता की जांच कर रहे हैं। 

कई गंभीर तकनीकी समस्याएं
इसी तरह इंदौर में एलआईजी चौराहे से नवलखा तक बनने वाले 6.2 किलोमीटर लंबे एलीवेटेड कॉरिडोर में भी कई गंभीर तकनीकी समस्याएं मिली थीं. इस परियोजना की जांच और सुधार का काम आईआईटी इंदौर को दिया गया है। 

पीडब्ल्यूडी का मानना है कि आईआईटी जैसे बड़े तकनीकी संस्थानों की मदद से ब्रिज और फ्लाईओवर की गुणवत्ता बेहतर होगी और भविष्य में डिजाइन संबंधी गलतियों को रोका जा सकेगा। 

अफगानिस्तान-रूस की बढ़ती नजदीकियों से पाकिस्तान-अमेरिका की बढ़ी चिंता, क्या तालिबान को मिलेगा S-400 का साथ?

काबुल 

 पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने  एक बयान में तालिबान पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि तालिबान भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ काम कर रहा है. अब उन्हें दूसरा झटका लगा है. अफगानिस्तान में रूस ने एक ऐसा खेल खेला है, जिसने अमेरिका और पाकिस्तान को अलर्ट कर दिया है. रूस ने तालिबान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने का समझौता कर लिया है और इसके साथ ही दिखा दिया है कि वह एक बार फिर दक्षिण एशिया में सक्रिय होने लगा है. मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ में इस समझौते को मंजूरी दी गई. कार्यक्रम में तालिबान के रक्षा मंत्री और संगठन के वरिष्ठ नेता मोहम्मद याकूब भी मौजूद थे. खास बात यह है कि जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने के बाद रूस पहली बार उसके साथ इतने ऊंचे स्तर पर रक्षा सहयोग की तरफ बढ़ा है. हालांकि दोनों पक्षों ने समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन इस कदम ने पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए नई बहस छेड़ दी है. सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रूस इस डील के बाद अफगानिस्तान को मिग या सुखोई जै फाइटर जेट दे सकता है?

 क्योंकि पाकिस्तान की एयरफोर्स के आगे तालिबान कुछ नहीं है और हर बार पाकिस्तान इनके जरिए ही हमला करता है. एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तालिबान के रक्षा मंत्री ने रूस से आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मांगा है. इसके बाद अटलकें लग रही हैं कि क्या S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम भी अफगानिस्तान को मिलेगा. इस समझौते की इसलिए भी चर्चा है कि इसी रूस ने USSR के समय अफगानिस्तान पर हमला किया था. तब यही तालिबान इससे लड़ रहा था। 

रूस-तालिबान की दोस्ती से पाकिस्तान की बढ़ेगी टेंशन?
यह समझौता सबसे ज्यादा अमेरिका-पाकिस्तान के लिए चिंता की बात है. पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार खराब हुए हैं. सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा और TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को लेकर है. पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि TTP के लड़ाके अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं. दूसरी तरफ तालिबान सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है। 

इसके बावजूद पाकिस्तान ने कई बार अफगानिस्तान की सीमा में घुस कर हमले किए हैं, क्योंकि उसे पता है कि तालिबान ताकतवर नहीं है. अब अगर रूस तालिबान को सैन्य उपकरण, हथियारों की मरम्मत की सहायता, ट्रेनिंग या हथियार उपलब्ध कराता है तो अफगानिस्तान की तालिबान सरकार और मजबूत हो सकती है. इससे पाकिस्तान का दबाव बनाने का विकल्प कमजोर पड़ सकता है. खास बात यह भी है कि अफगान-सोवियत युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका के कहने पर तालिबान को ट्रेनिंग दी थी. इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक के फेलो अलेक्सेई जाखरोव के मुताबिक, तालिबान अभी अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में अस्थिरता और पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में रूस की सैन्य सहायता उसके लिए काफी मददगार साबित हो सकती है। 

भगवान बिरसा मुण्डा योजना से बदली झाबुआ के अर्पित की जिंदगी, अमूल पार्लर खोल बने आत्मनिर्भर

सफलता की कहानी

भगवान बिरसा मुण्डा योजना से झाबुआ के अर्पित बने आत्मनिर्भर

 शुरू किया अमूल पार्लर
अब हर माह कमा रहे 25 हजार रुपए

भोपाल 

जिंदगी में अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा हर इंसान के मन में होती है। हर व्यक्ति आर्थिक एवं सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहता है, लेकिन सफलता उसी को मिलती है जो अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर निरंतर मेहनत करता है। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है झाबुआ के वार्ड क्रमांक 16, मेघनगर नाका, के अर्पित पिता पारसिंह मचार की। उन्होंने स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सतत् प्रयास किया। अर्पित ने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी क्षेत्र में कार्य किया, लेकिन वे अपने कार्य से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। उनके मन में स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने की इच्छा थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने अमूल पार्लर (मिल्क पार्लर) प्रारंभ करने का निर्णय लिया। व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता होने पर उन्होंने शासन की “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” के अंतर्गत ऋण प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ कार्यालय में संपर्क किया।

5 लाख के ऋण से शुरू किया अमूल पार्लर, अब हर माह हो रही 25 हजार रूपये की आय

मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ द्वारा भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना अंतर्गत ऋण प्रकरण एम.पी. ऑनलाइन के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक, राजवाड़ा शाखा, झाबुआ को प्रेषित किया गया। बैंक द्वारा प्रकरण का परीक्षण करने के उपरांत अर्पित को 5 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया। ऋण स्वीकृति प्राप्त होने के तुरंत बाद अर्पित ने अमूल पार्लर प्रारंभ कर अपना व्यवसाय शुरू किया। आज वे अपने व्यवसाय से प्रतिमाह लगभग 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपनी इकाई में एक अन्य व्यक्ति को सहायक के रूप में रोजगार भी प्रदान किया है।

रोजगार की तलाश से आत्मनिर्भरता तक, अर्पित ने युवाओं को दिया प्रेरणा का संदेश

 अर्पित का कहना है कि पहले वे रोजगार की तलाश में भटकते थे, लेकिन आज स्वयं का व्यवसाय संचालित कर आत्मनिर्भर बन चुके हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम द्वारा संचालित भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना को देते हैं। उनका मानना है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प और मेहनत करने का जज्बा हो तो सफलता अवश्य मिलती है। शासन की योजनाओं का लाभ लेकर युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

”भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार” योजना के बारे में जानकारी

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति वर्ग के बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” संचालित की जा रही है। योजना के तहत पात्र युवाओं को स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के लिए बैंकों के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। योजना के अंतर्गत विनिर्माण इकाई स्थापित करने हेतु 1 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक का ऋण प्रदान किया जाता है। इसके साथ ही हितग्राहियों को 7 वर्षों तक 5 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जाता है तथा गारंटी फीस का भुगतान मध्यप्रदेश शासन द्वारा किया जाता है। योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक को अनुसूचित जनजाति वर्ग का सदस्य होना अनिवार्य है। आवेदक की आयु 18 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। साथ ही आवेदक के पास अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र, वार्षिक आय 12 लाख रुपये से कम होने का प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, कक्षा 8वीं उत्तीर्ण की अंकसूची, बैंक पासबुक की छायाप्रति, आधार कार्ड, पैन कार्ड, समग्र आईडी, राशन कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो एवं मोबाइल नंबर होना आवश्यक है।

इस योजना में सेवा इकाई एवं खुदरा व्यवसाय के लिए भी 1 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक की परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत ब्यूटी पार्लर, वाहन मरम्मत, साइकिल रिपेयरिंग, किराना दुकान, फोटोकॉपी, फोटोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस, मोटरसाइकिल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल कार्य, टेंट हाउस, ढाबा, होटल आदि व्यवसाय शुरू किए जा सकते हैं। वाहन संबंधी योजनाओं के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना अनिवार्य रहेगा। पात्र युवक-युवतियां एमपी ऑनलाइन के माध्यम से अथवा अपने जिले के आदिवासी वित्त विकास निगम कार्यालय में संपर्क कर आवेदन कर सकते हैं। 

सिवनी-छिंदवाड़ा-सावनेर फोरलेन से बदलेगी तस्वीर, MP-महाराष्ट्र के बीच मिलेगी हाई स्पीड कनेक्टिविटी

सिवनी/छिंदवाड़ा

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच संपर्क पहले की तुलना में आधुनिक और सुरक्षित होगी। इस दिशा में सिवनी-छिंदवाड़ा-सावनेर फोरलेन परियोजना महत्वपूर्ण साबित होगी। एनएचआई की तरफ से एनएच-547 और एनएच-347 के अंतर्गत प्रास्तावित परियोजना के लिए डीपीआर का कार्य प्रगति पर है।

158 किमी लंबा है यह कॉरिडोर
करीब 158 किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित कॉरिडोर का उद्देश्य महाराष्ट्र के सावनेर-नागपुर औद्योगिक क्षेत्र को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा एवं सिवनी के माध्यम से मध्य और उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश से बेहतर ढंग से जोड़ना है। वर्तमान में यह मार्ग महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बीच यातायात, औद्योगिक परिवहन, कृषि व्यापार एवं पर्यटन गतिविधियों के लिए प्रमुख संपर्क माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। अब इसे फोर लेन में परिवर्तित किया जा रहा है।

दोनों राज्यों के औद्योगिक ग्रोथ को मिलेगी नई दिशा
वहीं, सिवनी–छिंदवाड़ा–सावनेर कॉरिडोर केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बीच आर्थिक, औद्योगिक एवं व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण मार्ग माना जा रहा है। यह कॉरिडोर नागपुर एवं सावनेर जैसे महाराष्ट्र के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर एवं मध्य भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ता है। फोरलेन निर्माण के बाद महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश की ओर माल परिवहन अधिक तेज और सुगम हो सकेगा।

छिंदवाड़ा–नागपुर कनेक्टिविटी को मिलेगा बढ़ावा
प्रस्तावित फोरलेन परियोजना छिंदवाड़ा और नागपुर के बीच संपर्क को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वर्तमान में दोनों शहरों के बीच यात्रा के दौरान भारी वाहनों का दबाव,सीमित सड़क क्षमता एवं कई स्थानों पर धीमी यातायात गति यात्रियों और व्यापारिक परिवहन के लिए चुनौती बनी रहती है। फोरलेन निर्माण के बाद नागपुर से छिंदवाड़ा की यात्रा अधिक तेज और सुगम हो सकेगी।

यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत
अभी छिंदवाड़ा से सिवनी, नागपुर और आसपास के क्षेत्रों की यात्रा करने वाले लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मार्ग अधिकांश हिस्सों में दो-लेन या सीमित क्षमता वाला है, जबकि भारी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोयला परिवहन, औद्योगिक ट्रैफिक एवं लंबी दूरी के मालवाहक वाहनों के कारण कई स्थानों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनती रहती है।

पर्यटन एवं इको-टूरिज्म को मिलेगा लाभ
यह कॉरिडोर मध्य प्रदेश के कई महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों तक पहुंच का प्रमुख मार्ग है। पेंच नेशनल पार्क, तामिया, पचमढ़ी, देवगढ़ किला, जाम सांवली हनुमान मंदिर एवं छिंदवाड़ा-सिवनी के प्राकृतिक वन क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मार्ग के निर्माण से पर्यटक इन स्थलों तक जल्दी पहुंच सकेंगे।

सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखकर डीपीआर
यह कॉरिडोर वर्तमान में कई सड़क सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए परियोजना की DPR तैयार की जा रही है, जिसमें सड़क सुरक्षा को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है। यातायात घनत्व, दुर्घटना संभावित स्थानों, शहरी क्षेत्रों में बढ़ते दबाव और भविष्य की यातायात आवश्यकताओं का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।

क्षेत्रीय और रणनीतिक महत्त्व
सिवनी–छिंदवाड़ा–सावनेर कॉरिडोर मध्य भारत के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का हिस्सा है। यह मार्ग NH-44, NH-47 तथा अन्य प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों से संपर्क स्थापित करता है, जिससे नागपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर, जबलपुर, बैतूल और सागर जैसे शहरों के बीच तेज संपर्क उपलब्ध होता है। यह कॉरिडोर महाराष्ट्र के औद्योगिक क्षेत्र नागपुर को मध्य प्रदेश के वन, खनन, कृषि और पर्यटन क्षेत्रों से जोड़ता है। भविष्य में यह मार्ग वैकल्पिक उत्तर-दक्षिण संपर्क कॉरिडोर के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिससे NH-44 पर यातायात दबाव कम करने में सहायता मिलेगी।

 

पाकिस्तान बॉर्डर पर बाड़ से बदली सुरक्षा तस्वीर, अब बांग्लादेश सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी?

  नई दिल्ली

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में बॉर्डर फेंसिंग एक अहम बदलाव साबित हुई है. खासकर पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर बाड़ लगाने के बाद घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों में काफी कमी आई है. वहीं पूर्वी सीमा यानी बांग्लादेश बॉर्डर पर अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां स्मार्ट फेंसिंग (Smart Fencing) लगाए बिना सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत नहीं किया जा सकता। 

पाकिस्तान के साथ भारत की 3323 किलोमीटर लंबी सीमा है. पहले इस सीमा पर खुली जगहों से आतंकियों और तस्करों के घुसपैठ की घटनाएं आम थीं. 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान सेक्टर में घुसपैठ के जरिए आतंकी हमले होते थे। 

2010 के आसपास भारत सरकार ने पाकिस्तान बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) की मदद से फेंसिंग का काम तेज किया. आज ज्यादातर हिस्सों में ऊंची, मजबूत और बार्ड वायर वाली फेंसिंग लग चुकी है. इस फेंसिंग का सुरक्षा पर सकारात्मक असर साफ दिखता है. घुसपैठ की घटनाओं में भारी कमी आई है। 

पहले जहां हर साल सैकड़ों घुसपैठ की कोशिशें होती थीं, अब उनकी संख्या बहुत कम हो गई है. फेंसिंग के साथ-साथ लाइटिंग, कैमरा और पेट्रोलिंग भी बढ़ाई गई, जिससे BSF को निगरानी रखने में आसानी हुई. खासकर जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सुरक्षा स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है. कुछ इलाकों में टोपोग्राफी की वजह से फेंसिंग पूरी नहीं हो पाई है, लेकिन कुल मिलाकर पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने सुरक्षा को मजबूत किया है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर क्यों जरूरी है फेंसिंग?
बांग्लादेश के साथ भारत की 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे लंबी स्थलीय सीमाओं में से एक है. यह सीमा पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल, नदी-नालों और घने जंगलों वाली है. इस वजह से फेंसिंग लगाना मुश्किल और महंगा है. अब भी कई हिस्सों में कोई फेंसिंग नहीं है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर मुख्य चुनौतियां हैं – अवैध घुसपैठ, गाय तस्करी, ड्रग्स तस्करी, हथियारों की तस्करी और कभी-कभी आतंकियों का आना-जाना. चूंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए सीमा पार करना थोड़ा आसान है. यही वजह है कि सुरक्षा बलों को 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है. 

स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी है?
साधारण फेंसिंग के बजाय स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि बांग्लादेश बॉर्डर की भौगोलिक स्थिति अलग है. स्मार्ट फेंसिंग में सेंसर, CCTV कैमरा, इंफ्रारेड डिटेक्टर, ड्रोन निगरानी, AI आधारित मॉनिटरिंग और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम शामिल होते हैं। 

यह सिस्टम रात में भी काम करता है. घुसपैठ को तुरंत पकड़ लेता है और कंट्रोल रूम में अलर्ट भेजता है. इससे जवानों की जान बचती है. छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार पहले ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ इलाकों में स्मार्ट फेंसिंग लगा चुकी है. अब इसे पूरे बॉर्डर पर फैलाने की योजना है। 

स्मार्ट फेंसिंग पारंपरिक तार की बाड़ से काफी आगे की आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था है. इसमें साधारण फेंसिंग को सेंसर, कैमरा, AI और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ जोड़ दिया जाता है, ताकि सीमा पर कोई भी गतिविधि तुरंत पकड़ी जा सके. यह तकनीक खासकर लंबी और चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर बहुत उपयोगी है। 

स्मार्ट फेंसिंग में क्या-क्या होता है?

फिजिकल फेंस  

    ऊंची (8-10 फीट) मजबूत स्टील की बाड़ जिसमें बार्ब्ड वायर या इलेक्ट्रिफाइड तार लगे होते हैं.
    कुछ जगहों पर डबल लेयर फेंसिंग (दो दीवारें) भी लगाई जाती है.

सेंसर सिस्टम  

    मोशन सेंसर: कोई व्यक्ति या वस्तु पास आने पर डिटेक्ट करते हैं.
    इंफ्रारेड (IR) सेंसर: रात में भी गर्मी वाली वस्तुओं (मानव शरीर) को पकड़ते हैं.
    फाइबर ऑप्टिक सेंसर: फेंस पर कट या चढ़ाई करने पर अलर्ट.
    वाइब्रेशन सेंसर: फेंस हिलने या काटने पर सिग्नल भेजते हैं.

कैमरा नेटवर्क  

    PTZ कैमरा (Pan-Tilt-Zoom) जो 360 डिग्री घूम सकते हैं.
    थर्मल इमेजिंग कैमरा (रात में बिना रोशनी के देख सकते हैं).
    AI आधारित कैमरा जो इंसान, जानवर या वाहन को अलग-अलग पहचान सकते हैं.
AI और सॉफ्टवेयर  

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत अलर्ट (जैसे जानवर) को फिल्टर करता है.
    मशीन लर्निंग से सिस्टम समय के साथ और स्मार्ट होता जाता है.
    रियल-टाइम एनालिसिस करके कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजता है.

कमांड एंड कंट्रोल सेंटर  

    सभी सेंसर और कैमरे एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से जुड़े होते हैं.
    BSF जवान 24×7 मॉनिटरिंग करते हैं.
    अलर्ट मिलते ही तुरंत रिस्पॉन्स टीम भेजी जाती है.

अन्य टेक्नोलॉजी  

    ड्रोन पेट्रोलिंग
    सोलर पावर बैकअप
    GPS ट्रैकिंग
    मोबाइल ऐप पर अलर्ट

भारत में स्मार्ट फेंसिंग की स्थिति
भारत सरकार ने कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग को बढ़ावा दिया है. पाकिस्तान बॉर्डर पर पहले ही काफी हद तक फेंसिंग + स्मार्ट टेक्नोलॉजी लग चुकी है. बांग्लादेश बॉर्डर पर पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं. बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग जल्दी पूरी करने की तैयारी चल रही है। 

फायदे

    24×7 निगरानी: रात-दिन काम करता है.
    कम मैनपावर: कम जवानों के साथ ज्यादा क्षेत्र कवर होता है.
    तेज प्रतिक्रिया: अलर्ट मिलते ही एक्शन लिया जा सकता है.
    कम घुसपैठ: तस्करी और अनधिकृत प्रवेश में भारी कमी.
    डेटा संग्रह: लंबे समय में पैटर्न विश्लेषण करके बेहतर प्लानिंग.

चुनौतियां

    उच्च लागत: शुरुआती खर्च बहुत ज्यादा है.
    रखरखाव: नदियों, बाढ़ और जंगलों वाले इलाकों में रखरखाव मुश्किल.
    तकनीकी ट्रेनिंग: BSF जवानों को नई टेक्नोलॉजी का प्रशिक्षण देना पड़ता है.
    बिजली और इंटरनेट: दूर-दराज के इलाकों में बिजली और कनेक्टिविटी की समस्या.

पाकिस्तान बॉर्डर vs बांग्लादेश बॉर्डर

पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग मुख्य रूप से आतंकवाद और सैन्य घुसपैठ रोकने के लिए लगाई गई. वहीं बांग्लादेश बॉर्डर पर समस्या ज्यादातर आर्थिक, सामाजिक और अपराधिक है. यहां बड़े पैमाने पर अवैध माइग्रेशन होता है, जो स्थानीय संसाधनों और कानून-व्यवस्था पर दबाव डालता है। 

स्मार्ट फेंसिंग बांग्लादेश बॉर्डर पर इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि यहां पारंपरिक फेंसिंग लगाना मुश्किल है. नदियां, दलदल और घने जंगल फेंसिंग को नुकसान पहुंचाते हैं. स्मार्ट टेक्नोलॉजी इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम है. पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने दिखा दिया कि मजबूत बाड़ सुरक्षा को कितना बेहतर बना सकती है। 

अब बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत है ताकि पूर्वी सीमा को भी सुरक्षित और आधुनिक बनाया जा सके. सरकार इस दिशा में काम कर रही है. अगर समय पर स्मार्ट फेंसिंग पूरी हो गई तो भारत की सीमा सुरक्षा और मजबूत होगी, जिससे देश के अंदर शांति और विकास को बढ़ावा मिलेगा। 

सस्ते मोबाइल के चक्कर में हो रहे साइबर फ्रॉड का शिकार, Cyber Wing ने जारी किया अलर्ट

नई दिल्ली
भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, खासकर स्मार्टफोन खरीदने के लिए लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर काफी भरोसा कर रहे हैं. हर महीने हजारों लोग ई-कॉमर्स या अन्य वेबसाइट्स से मोबाइल फोन खरीदते हैं।

जैसे-जैसे ऑनलाइन खरीदारी का ट्रेंड बढ़ा है, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों ने भी नए-नए तरीके को अपनाकर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है. आज साइबर ठग केवल फर्जी कॉल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नकली वेबसाइट, सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी डिलीवरी एजेंट, रिफंड फ्रॉड और स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स के जरिए लोगों के बैंक खाते खाली कर रहे हैं।

खास बात यह है कि ज्यादातर लोग बड़े डिस्काउंट, फ्लैश सेल और ‘सीमित समय ऑफर’ के लालच में आकर ठगी का शिकार बन जाते हैं. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ऑनलाइन शॉपिंग से जुड़े साइबर फ्रॉड के मामलों में लगभग 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। 

एक्सपर्ट का कहना है कि फेस्टिवल, सेल सीजन और नए स्मार्टफोन लॉन्च के दौरान ऐसे मामलों में तेजी से उछाल आता है।
मोबाइल शॉपिंग फ्रॉड? साइबर क्रिमिनल्स कौन सा अपनाते हैं तरीका.

1. फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स का जाल
साइबर अपराधी बिल्कुल असली वेबसाइट जैसी दिखने वाली नकली साइट तैयार करते हैं. इन वेबसाइट्स पर महंगे फोन बेहद कम कीमत में दिखाए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर 1 लाख रुपये का फोन 25 या 30 हजार रुपये में ऑफर किया जाता है. यूजर जब वेबसाइट पर जाकर पेमेंट करते हैं, तो या तो डिलीवरी नहीं होती या फिर खाली डिब्बा भेज दिया जाता है. कई मामलों में वेबसाइट कुछ दिनों बाद गायब भी हो जाती है।

2 सोशल मीडिया विज्ञापनों से ठगी
इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर 90 प्रतिशत डिस्काउंट, स्टॉक क्लियरेंस सेल या सरकारी नीलामी जैसे विज्ञापन चलाए जाते हैं. इन विज्ञापनों पर क्लिक करते ही यूजर फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दिखने वाले हर विज्ञापन की सत्यता जांचना जरूरी है क्योंकि ठग अब AI आधारित डिजाइन और नकली रिव्यू का इस्तेमाल कर रहे हैं।

3. नकली कस्टमर केयर और रिफंड फ्रॉड
कई बार लोग किसी ऑनलाइन ऑर्डर की शिकायत करने के लिए इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं. साइबर अपराधी गूगल सर्च में फर्जी नंबर डाल देते हैं. जैसे ही ग्राहक कॉल करता है, उसे AnyDesk, TeamViewer या QuickSupport जैसे ऐप डाउनलोड करवाए जाते हैं. फिर  स्क्रीन शेयर होते ही ठग बैंकिंग ऐप, यूपीआई और OTP तक पहुंच बना लेते हैं. कुछ ही मिनटों में अकाउंट खाली हो जाता है।

4. फर्जी पेमेंट लिंक और फिशिंग
ठग WhatsApp, SMS या ईमेल के जरिए भुगतान लिंक भेजते हैं. लिंक बिल्कुल असली वेबसाइट जैसा दिखाई देता है. यूजर जैसे ही कार्ड डिटेल या यूपीआई जानकारी भरता है, उसकी सारी जानकारी अपराधियों के पास पहुंच जाती है. साइबर सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक भारत में हर दिन हजारों फिशिंग लिंक एक्टिव किए जाते हैं।

5. डिलीवरी स्कैम
कुछ मामलों में ठग खुद को डिलीवरी एजेंट बताते हैं. वे कहते हैं कि ‘डिलीवरी कन्फर्म करने के लिए OTP बताइए’ या ‘QR कोड स्कैन करें. लोग बिना सोचे-समझे जानकारी साझा कर देते हैं और उनके खाते से पैसे निकल जाते हैं।

क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे अपराध?
साइबर मामलों से जुड़े एक्सपर्ट यह मानते हैं कि डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी के विस्तार के साथ साइबर अपराधियों को नए अवसर मिल रहे हैं. भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऑनलाइन खरीदारी तेजी से बढ़ रही है. युवा वर्ग जल्दी डिस्काउंट और ऑफर के चक्कर में आ जाता है. कई लोग साइबर सुरक्षा के बेसिक नियमों से अनजान हैं. यही कारण है कि साइबर ठग लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं।

कैसे पहचाने कि ऑनलाइन ऑफर फर्जी है?
यदि कोई फोन बाजार मूल्य से आधे या उससे भी कम दाम पर मिल रहा है, तो सतर्क हो जाइए. कई नकली वेबसाइट्स असली नाम से मिलते-जुलते डोमेन बनाती हैं. इसमे ऑफर या फेक सेल जैसे नाम हैं. देकर प्रोडक्ट को जल्द से जल्द बेचने का प्रयास उनके द्वारा किया जाता है. इस दौरान जब उपभोक्ता ऑनलाइन पेमेंट के लिए जाता है तो वेबसाइट केवल एडवांस पेमेंट मांग रही है और COD विकल्प नहीं दे रही, तो शक करना चाहिए।

फर्जी वेबसाइट्स पर अक्सर टूटी-फूटी हिंदी या अंग्रेजी होती है. कई बार सभी रिव्यू एक जैसे दिखते हैं तो आप समझ जाइए कि यहां पर ऑनलाइन फ्रॉड होने वाला है. अगर इस तरीके के ऑफर आ रहे हैं तो भी समझिए कि यह फ्रॉड करने वाली वेबसाइट है. केवल 5 मिनट का ऑफर, अभी खरीदें वरना मौका खत्म, जैसे मैसेज लोगों पर मानसिक दबाव बनाते हैं।
कैसे सुरक्षित ऑनलाइन खरीदारी करें

केवल भरोसेमंद प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें

मोबाइल हमेशा ऑथराइज्ड वेबसाइट या जाने-माने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से खरीदें. ब्रांड की ऑफिशियल साइट सबसे सुरक्षित विकल्प मानी जाती है।

वेबसाइट का URL जरूर जांचें

वेबसाइट के नाम के आगे HTTPS और लॉक का निशान देखें. गलत स्पेलिंग वाली साइट से बचें.

डिलीवरी के समय वीडियो रिकॉर्ड करें
 

फोन की अनबॉक्सिंग करते समय वीडियो रिकॉर्ड करना सुरक्षित माना जाता है. इससे विवाद की स्थिति में सबूत रहता है.

IMEI नंबर चेक करें

फोन मिलने के बाद *#06# डायल करके IMEI नंबर देखें और बॉक्स पर लिखे नंबर से मिलाएं.संचार साथी पोर्टल पर भी IMEI की जांच की जा सकती है.

OTP और UPI PIN कभी साझा न करें

कोई भी बैंक, कंपनी या डिलीवरी एजेंट OTP नहीं मांगता. OTP साझा करना सीधे खाते तक पहुंच देना है.

स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स से दूर रहें

अनजान व्यक्ति के कहने पर AnyDesk या TeamViewer जैसे ऐप डाउनलोड न करें.
लोगों को बचाने के लिए सरकार चला रही अभियान

सरकार लगातार साइबर अपराध रोकने के लिए अभियान चला रही है. गृह मंत्रालय के तहत इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर्स (I4C) लोगों को जागरूक करने के लिए डिजिटल कैंपेन चला रहा है.इसके अलावा बैंकों और ई-कॉमर्स कंपनियों को भी सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.  कई फर्जी वेबसाइट्स और साइबर गैंग्स के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है।

ऑनलाइन मोबाइल खरीदारी सुविधाजनक जरूर है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही भारी नुकसान पहुंचा सकती है. साइबर अपराधी लोगों की जल्दबाजी, लालच और तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं. सस्ते ऑफर, फर्जी वेबसाइट और नकली कॉल के जाल में फंसने से बचने के लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी है. याद रखें कि सुरक्षित डिजिटल व्यवहार ही साइबर ठगी से सबसे बड़ा बचाव है. अगर कोई ऑफर जरूरत से ज्यादा अच्छा लगे, तो पहले उसकी जांच करें क्योंकि ऑनलाइन दुनिया में सतर्कता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

नगरीय प्रशासन विभाग की सचिव शंगीता आर. ने विकास कार्यों का किया निरीक्षण

रायपुर

स्वच्छता, आवास, तालाब सौंदर्यीकरण एवं ईको पार्क का किया अवलोकन

नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग की सचिव शंगीता आर. ने आज गरियाबंद में विकास कार्यों का औचक निरीक्षण किया। उन्होंने नगर पालिका के वार्ड क्रमांक-7 में एमआरएफ सेंटर पहुंचकर स्वच्छता दीदियों से ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन, कचरा कलेक्शन और कचरे के अलग-अलग वर्गीकरण के बारे में विस्तृत जानकारी ली। उन्होंने स्वच्छता दीदियों द्वारा 110 प्रकार के कचरे को अलग-अलग वर्गीकृत किए जाने की जानकारी मिलने पर स्वच्छता दीदियों की सराहना की और कार्य के दौरान स्वास्थ्य सुरक्षा का विशेष ध्यान रखने को कहा। उन्होंने मास्क, दस्ताने, जैकेट, जूते और आवश्यक सुरक्षा सामग्री का अनिवार्य रूप से उपयोग करने को कहा।

नगरीय प्रशासन विभाग की सचिव ने स्वसहायता समूह की महिलाओं को पीएम स्वनिधि योजना के माध्यम से लोन लेकर अपने स्वरोजगार को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। साथ ही नागरिकों को डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के साथ स्वच्छता के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वच्छता को आदत में लाने पर ही नगरीय निकाय स्वच्छ और सुंदर बन सकेगा। इस दौरान उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में छत्तीसगढ़ की 10 हजार से अधिक महिलाओं के द्वारा वर्षभर कचरा संग्रहण और पृथक्करण किए जाने की सराहना राष्ट्रीय स्तर पर की गई है।

शंगीता आर. ने वार्ड क्रमांक-8 में केशरी नागेश के प्रधानमंत्री आवास का निरीक्षण कर समय-सीमा में निर्माण कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए, ताकि बरसात से पहले आवास का लाभ मिल सके। उन्होंने वार्ड क्रमांक-4 में तालाब सौंदर्यीकरण कार्य का अवलोकन करते हुए साफ-सफाई, पिचिंग और गहरीकरण का कार्य गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा करने को कहा, जिससे नागरिकों को पर्याप्त निस्तारीकरण जल उपलब्ध हो सके और जल संवर्धन भी सुनिश्चित हो।

विभागीय सचिव ने ईको पार्क का निरीक्षण कर पौधों की सुरक्षा, सिंचाई व्यवस्था, लगाए गए पौधों तथा ‘वीमन्स फार ट्री’ के तहत लगाए गए पौधों की जानकारी ली। उन्होंने पार्क को बेहतर पर्यावरणीय एवं मनोरंजक स्थल के रूप में विकसित करने के निर्देश दिए। गरियाबंद जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री प्रखर चंद्राकर, सूडा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री शशांक पाण्डेय, नगरीय प्रशासन विभाग के अपर संचालक श्री पुलक भट्टाचार्य, संयुक्त संचालक श्री एस.के. सुंदरानी और सीएमओ संध्या वर्मा भी निरीक्षण के दौरान मौजूद थीं।

खरीफ में धान सहित दलहन-तिलहन फसलों में परम्परागत खाद के साथ वैकल्पिक खाद एवं नैनो यूरिया व डीएपी के उपयोग को दिया जा रहा बढ़ावा

रायपुर

 मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के निर्देश पर कलेक्टर राजनांदगाँव  जितेन्द्र यादव के मार्गदर्शन में खरीफ सीजन में खेती-किसानी को ध्यान में रखते हुए किसानों को समय पर खाद-बीज का वितरण किया जा रहा है ।कलेक्टर ने कृषि अधिकारियों को कहा है कि किसानों को खाद-बीज के लिए किसी भी तरह की दिक्कत नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष खरीफ में धान सहित दलहन-तिलहन फसलों में परम्परागत खाद के साथ वैकल्पिक खाद एवं नैनो यूरिया व डीएपी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए समितियों एवं निजी क्षेत्रों में खरीफ पूर्व तैयारी के दृष्टि से वर्ष हेतु 68690 मीट्रिक टन का लक्ष्य रखा गया है। जिले में सहकारी एवं निजी क्षेत्र को मिलाकर जिले में कुल 41509 मीट्रिक टन खाद उपलब्ध है। जिसमें 17153 मीट्रिक टन यूरिया, 4088 मीट्रिक टन डीएपी, 10129 मीट्रिक टन एनपीके, 3382 मीट्रिक टन एमओपी एवं 6757 मीट्रिक टन सिंगल सुपर फास्फेट खाद उपलब्ध है, जो गत वर्ष इसी अवधि की तुलना से 34 प्रतिशत अधिक है।
    
उप संचालक कृषि  टीकम सिंह ठाकुर ने बताया कि सेवा सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को लगातार खाद वितरण किया जा रहा है। जिले में 14972 किसानों को खाद प्रदाय किया जा चुका हैं। जिसमें 7193 मीट्रिक टन यूरिया, 1807 मीट्रिक टन डीएपी, 4669 मीट्रिक टन एनपीके, 1322 मीट्रिक टन एमओपी एवं 2214 मीट्रिक टन सिंगल सुपर फास्फेट खाद किसानों को आगामी खरीफ फसलों हेतु वितरण किया जा चुका है तथा समितियों में 4568 मीट्रिक टन यूरिया, 1032 मीट्रिक टन डीएपी, 3082 मीट्रिक टन एनपीके, 1364 मीट्रिक टन एमओपी एवं 1350 मीट्रिक टन सिंगल सुपर फास्फेट उर्वरक उपलब्ध है।
    
किसानों को समय पर गुणवत्तायुक्त बीज प्राप्त हो सके इस हेतु 13980 क्विंटल का लक्ष्य रखा गया है। लक्ष्य के विरूद्ध जिले में 6036 क्विंटल बीज, बीज निगम में उपलब्ध है। जिसमें से 3201 क्विंंटल का समितियों में भंडारण कराकर 1085 क्विंटल बीज का वितरण किसानों को किया जा चुका है। निरंतर समितियों के मांग अनुरूप जिला विपणन अधिकारी एवं जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित से समन्वय स्थापित कर भंडारण किया जा रहा है। साथ ही किसानों को शासन द्वारा प्रदाय दिशा-निर्देशानुसार 80 प्रतिशत यूरिया एवं 60 प्रतिशत डीएपी के आधार पर वितरण समितियों के माध्यम से कराया जा रहा है। उर्वरकों के कालाबाजारी, तस्करी, डायवर्सन, जमाखोरी आदि अनियमिताओं को रोकने के लिए जिला एवं विकासखंड स्तरीय उडऩदस्ता टीम का गठन किया गया हैं। टीम द्वारा निरंतर उर्वरक विक्रय केन्द्रों का निरीक्षण किया जा रहा हैं। निरीक्षण के दौरान अनियमितता पाये जाने पर अब तक 28 विक्रय केन्द्रों को नोटिस, 7 विक्रय केन्द्रों में भंडारित उर्वरक मात्रा को जप्ती करते हुए सील बंद की कार्रवाई की गई है। साथ ही 5 निजी विक्रय केन्द्रों के लाईसेंस का निलंबन भी किया गया है। कृषि विभाग द्वारा जिले में निरंतर विक्रय केन्द्रों का निरीक्षण किया जा रहा है और आगे भी नियमों का उल्लंघन पाये जाने पर केन्द्रों के विरूद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।

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