INS Mahendragiri: भारतीय नौसेना को मिला नया महाबली, दुश्मन के रडार को देगा चकमा

मुंबई 

भारतीय नौसेना 11 जुलाई 2026 को अपनी समुद्री ताकत में एक और बड़ा इजाफा करने जा रही है. इस दिन विशाखापट्टनम में स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट INS महेंद्रगिरि को औपचारिक रूप से नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा. इसके साथ ही जुलाई के दौरान पनडुब्बी रोधी युद्ध (एंटी-सबमरीन वॉरफेयर) वॉरशिप आईएनएस मालवन का भी कमीशनिंग कार्यक्रम प्रस्तावित है. इन दोनों युद्धपोतों के शामिल होने से हिंद महासागर क्षेत्र और व्यापक इंडो-पैसिफिक में भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को नई मजबूती मिलेगी. स्‍टील्‍थ होने की वजह से INS महेंद्रगिरि रडार को धता बताते हुए मिशन को अंजाम देने में सक्षम है। 

INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A के तहत निर्मित छठी स्टील्थ फ्रिगेट है. इस प्रोजेक्‍ट के युद्धपोतों को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है, जबकि इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने किया है. यह युद्धपोत अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीक से लैस है, जिससे दुश्मन के रडार पर इसकी पहचान करना बेहद कठिन हो जाता है. करीब 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी तकनीक और उपकरणों से निर्मित महेंद्रगिरि भारत के डिफेंस मैन्‍यूफैक्चरिंग की बढ़ती क्षमता का भी प्रतीक है. इसमें आधुनिक मिसाइल सिस्‍टम, पनडुब्बी रोधी हथियार, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं. यह वॉर ऑपरेशन के अलावा समुद्री निगरानी, मैरीटाइम सिक्‍योरिटी, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR), खोज एवं बचाव (सर्च एंड रेस्क्यू) तथा अन्य बहुआयामी अभियानों को प्रभावी ढंग से अंजाम देने में सक्षम होगी। 

भारतीय नौसेना के अनुसार, महेंद्रगिरि का शामिल होना देश की समुद्री युद्ध क्षमता को और मजबूत करेगा. साथ ही यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भी माना जा रहा है. इससे रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिलने के साथ भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी. इससे पहले 21 जून 2026 को भारतीय नौसेना ने तीन स्वदेशी युद्धपोतों (आईएनएस दुनागिरि, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रय) को भी बेड़े में शामिल किया था. लगातार नए स्वदेशी युद्धपोतों के शामिल होने से स्पष्ट है कि भारतीय नौसेना अपने आधुनिकीकरण कार्यक्रम को तेज गति से आगे बढ़ा रही है। 

डिफेंस एक्‍सपर्ट का मानना है कि महेंद्रगिरि और मालवन जैसे अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म भारतीय नौसेना को भविष्य की समुद्री चुनौतियों से निपटने में अधिक सक्षम बनाएंगे. साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी और समुद्री हितों की सुरक्षा को भी नई मजबूती मिलेगी. बता दें कि इंडिन नेवी ने पिछले कुछ महीनों में अपने बेड़े में कई वॉरशिप को शामिल कर चुकी है. हिन्‍द महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नकेल कसने के लिहाज से इस कदम को अहम माना जा रहा है। 

Modi Cabinet Reshuffle: कैबिनेट विस्तार में नौकरशाहों की एंट्री की चर्चा, मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी

नई दिल्ली

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार की चर्चाएं जोरों पर हैं। इस विस्तार में अनुभवी सेवानिवृत्त नौकरशाहों को अहम जिम्मेदारियां मिलने की अटकलें है। सूत्रों का कहना है कि ‘परफॉर्मेंस’ और ‘लॉयल्टी’ के फॉर्मूले पर खरे उतरने वाले अफसरों को पीएम मोदी जल्दी रिटायर नहीं होने देते। ऐसे में कुछ बड़े अधिकारियों के नाम मंत्रिमंडल फेरबदल में शामिल हो सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में शक्तिकांत दास और तपन डेका जैसे आला अधिकारियों के नाम हैं। इनके अलावा भी कुछ अधिकारी महत्वपूर्ण स्थानों पर नजर आ सकते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों में भी कभी-कभी ऐसे प्रयोग हुए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में यह व्यवस्थागत रूप ले चुकी है। सेवानिवृत्त अधिकारियों को सेवा विस्तार मिलना सामान्य हो गया है और वे विभिन्न मंत्रालयों तथा सरकार संचालन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह मॉडल न केवल प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करता है, बल्कि बड़े सुधारों को गति देने और संकट प्रबंधन में भी सहायक सिद्ध हो रहा है।

सरकारों को यह होता है लाभ: दशकों का प्रशासनिक अनुभव, जटिल नीतियों की गहरी समझ, संस्थागत स्मृति का संरक्षण, बड़े सुधारों में निरंतरता, संकट के समय अनुभवी नेतृत्व की उपलब्धता और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन रिटायर लोगों को जिम्मेदारी देने की बड़ी वजह बताई जाती है। मोदी सरकार का जोर अनुभव, निष्ठा और परिणाम पर रहा है। फाइल क्लियरेंस, प्रोजेक्ट डिलीवरी, खर्च प्रबंधन की दक्षता और शिकायत निवारण जैसे पैमानों पर अधिकारियों को स्कोर कार्ड दिए जा रहे हैं। हालांकि, इस मॉडल की आलोचना भी होती है। आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक सेवा विस्तार से नए अधिकारियों के पदोन्नति के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

भारत ही नहीं कई देशों में भी यह प्रयोग
यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है। सिंगापुर में स्थायी सचिव सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी कंपनियों और नीति आयोगों का नेतृत्व करते हैं। अमेरिका में जेम्स मैटिस और लॉयड ऑस्टिन (सेवानिवृत्त जनरल) रक्षा मंत्री बने। जेनेट येलेन (पूर्व फेड चेयर) वित्त मंत्री बनीं। जेरोम पॉवेल केंद्रीय बैंक का नेतृत्व कर रहे हैं। पूर्व अधिकारी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, थिंक टैंक और विशेष दूत के रूप में कार्य करते हैं। ब्रिटेन में सेवानिवृत्त वरिष्ठ सिविल सेवकों को हाउस ऑफ लॉर्ड्स, सार्वजनिक आयोगों और नियामक संस्थाओं में नियुक्त करना सामान्य है। मार्क सेडविल सेवानिवृत्ति के बाद विभिन्न संस्थानों में रणनीतिक भूमिकाएं निभा चुके हैं। फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों स्वयं उच्च सिविल सेवा से आए। जापान में अमकुदरी (स्वर्ग से अवतरण) परंपरा के तहत वरिष्ठ नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद निजी कंपनियों में नेतृत्व करते हैं।

हिमाचल के सेब पर बड़ा संकट! 40% उत्पादन घटने की आशंका, ₹5000 करोड़ का कारोबार खतरे में

 नई दिल्ली
एक कहावत है कि ‘रोज एक सेब खाएं और डॉक्टर को दूर भगाएं’, लेकिन अब लग रहा है कि डॉक्टर को भगाने के लिए सेब ही नहीं बचेंगे. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि रिपोर्ट्स में अधिकारियों के हवाले से ये डराने वाले अनुमान जाहिर किए जा रहे हैं. सेब के उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खलनायक बन रहा है मौसम का मिजाज, जिसके चलते हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब उत्पादन में 40 फीसदी की बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। 

Apple इकोनॉमी खतरे में है
बिजनेस टुडे पर छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश की 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था (Apple Economy) इस समय अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है. मौसम की अनियमितता के चलते इस साल सेब उत्पादन में लगभग 40% की गिरावट आने की आशंका है और ये सेब की फसल पर निर्भर जिससे इस फसल पर निर्भर करीब  25 लाख किसान परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। 

अधिकारियों को सता रही चिंता
हिमाचल प्रदेश राज्य के बागवानी अधिकारियों ने अनुमान जाहिक करते हुए कहा कि राज्य में सेब का उत्पादन 2025 में 6.99 लाख मीट्रिक टन से घटकर 2026 में लगभग 4.36 लाख मीट्रिक टन (लगभग 2.15 करोड़ बक्से) रह जाएगा, यानी 2.63 लाख मीट्रिक टन की गिरावट आएगी. इसके साथ ही इसी अनुपात में सेब अर्थव्यवस्था में भी गिरावट देखने को मिल सकती है। 

सेब उत्पादन में इस बड़ी गिरावट को लेकर अधिकारियों ने कारण बताते हुए कहा कि सर्दियों में अपर्याप्त हिमपात, बेमौसम  बारिश, लगातार ओलावृष्टि और तापमान में अनियमित उतार-चढ़ाव से ये हालात पैदा हुए हैं. बागवानों की मानें, तो मौसम ने उत्पादन लागत बढ़ाने और पैदावार घटाने की चुनौतियां पैदा कर दी हैं. दूसरी ओर कीटनाशक दवाओं और मशीनरी समेत अन्य एग्रीकल्चर उपकरणों की कीमतों में बढ़ोतरी ने उनका बोझ बढ़ा दिया है। 

किसानों ने सरकार से लगाई गुहार
राज्य के भारी भरकम 5000 करोड़ रुपये के करीब के सेब कारोबार पर संकट बढ़ता देख, किसानों ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है. उन्होंने फसल बीमा योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने का आग्रह किया है, ताकि नुकसान की भरपाई में मदद मिल सके। 

मौसम का बदलता मिजाज न सिर्फ राज्य की इकोनॉमी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी मुसीबत माना जा रहा है, इसका प्रभाव सिर्फ सेब तक ही सीमित नहीं है. तमाम एक्सपर्ट शेयर बाजार पर भी मौसम के प्रभाव का अनुमान जता रहे हैं। 

मौसम बनता जा रहा खलनायक?
बीते कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों ने महंगाई का जोखिम बढ़ाया था, लेकिन अब अमेरिका-ईरान में बात बनते ही तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिली है. बीते दिनों आई एक रिपोर्ट में तेल सस्ता होने के बाद अब एक्सपर्ट भी मानते नजर आए थे कि मौसम इकोनॉमी के लिए खलनायक बनता जा रहा है। 

इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मनोरंजन शर्मा ने कहा था कि आज देश में महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम तेल नहीं, बल्कि मानसून है. कमजोर मानसून अब भारत के लिए कच्चे तेल की तुलना में महंगाई का बड़ा खतरा पैदा कर रहा है, क्योंकि देश में महंगाई की कैलकुलेशन में Fuel Price से कहीं ज्यादा खाद्य पदार्थों का रोल रहता है और भारत की करीब आधी एग्रीकल्चर लैंड बारिश पर निर्भर है, इसमें अनियमितता से अनाज, दालों, सब्जियों, फलों और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आ सकती है, जिससे महंगाई दर में तेज इजाफा हो सकता है और घरेलू बजट गड़बड़ा सकता है। 

E20 पेट्रोल पर बड़ा खुलासा! 53% कार मालिकों ने बताया फेल, 66% ने कहा- माइलेज हुआ कम

 नई दिल्ली

कहते हैं बदलाव की कीमत चुकानी पड़ती है. लेकिन जब कीमत हर बार आम आदमी की जेब से ही निकले, तो सवाल उठना तय है. सरकार E20 पेट्रोल के फायदे गिना रही है, उधर पुराने पेट्रोल वाहन चलाने वाले लोग घटते माइलेज और बढ़ते रिपेयर बिल का हिसाब लगा रहे हैं. अब एक बड़े सर्वे ने इस बहस को और हवा दे दी है. सर्वे में 53 प्रतिशत लोगों ने E20 लागू करने के तरीके पर नाराजगी जताई, 66 प्रतिशत ने माइलेज गिरने की शिकायत की और 45 प्रतिशत ने कहा कि गाड़ी का मेंटेनेंस पहले से ज्यादा महंगा हो गया है। 

लोकल सर्किल्स (LocalCircles) के सर्वे में देश के 316 जिलों के 22,567 पेट्रोल वाहन मालिकों ने हिस्सा लिया. सर्वे के अनुसार 53 प्रतिशत लोगों ने सड़क परिवहन मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय की E20 पेट्रोल लागू करने की प्रक्रिया को या तो “बेहद खराब” या “असरहीन” बताया. इनमें 42 प्रतिशत लोगों ने इसे “बेहद खराब” करार दिया, जबकि सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों ने इस पहल को थोड़ी अच्छी रेटिंग दी। 

10% घटा माइलेज
सर्वे में सबसे बड़ी चिंता 2023 से पहले बनी पेट्रोल गाड़ियों को लेकर सामने आई. ऐसे वाहन मालिकों में 66 प्रतिशत लोगों का कहना है कि E20 पेट्रोल आने के बाद उनकी गाड़ी का माइलेज 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हो गया है. वहीं 45 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनकी गाड़ियों के कंपोनेंट में समस्या बढ़ी है और मरम्मत पर पहले के मुकाबले ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। 

इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि, लोग इथेनॉल ब्लेंडिंग का पूरी तरह विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से विकल्प चाहिए. 2023 से पहले बनी पेट्रोल गाड़ियों के करीब 31 प्रतिशत मालिकों ने कहा कि अगर E0 या E10 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाए तो वे E20 से महंगा होने पर भी उसे खरीदना पसंद करेंगे. इससे साफ है कि पुराने वाहन मालिक कम इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल के लिए रेडी हैं, भले ही इसके लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़े। 

सरकार E20 के फायदे गिना रही है
दूसरी ओर केंद्र सरकार लगातार इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का बचाव कर रही है. सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी, प्रदूषण घटेगा, एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत होगी और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. बीते दिनों सरकार ने दिग्गज वाहन निर्माताओं के अधिकारियों का एक पूरा पैनल बठाया था. जिसमें सभी कंपनियों ने एक सुर में इथेनॉल के फायदे गिनाए थे। 

सर्वे में कहा गया है कि भारत की सड़कों पर अभी भी बड़ी संख्या में ऐसी पेट्रोल गाड़ियां चल रही हैं जिन्हें कम इथेनॉल वाले फ्यूल को ध्यान में रखकर बनाया गया था. अप्रैल 2023 से पहले बनी ज्यादातर गाड़ियां E10 पेट्रोल के लिए डिजाइन की गई थीं, जबकि अप्रैल 2025 के बाद बनने वाले नए मॉडल पूरी तरह E20 कम्पलायंट माने जाते हैं. ऐसे में पुराने वाहन मालिकों को माइलेज और मेंटेनेंस से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 

अपग्रेड करना भी आसान नहीं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर पुरानी गाड़ियों को E20 कम्पलायंट बनाना हो, तो फ्यूल सिस्टम के ऐसे कई पार्ट बदलने पड़ सकते हैं जो ज्यादा इथेनॉल को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाते. इससे वाहन मालिकों का खर्च और बढ़ सकता है. हाल ही में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के डायरेक्टर जनरल दीपक बलानी ने आजतक से ख़ास बातचीत में बताया कि, एक ख़ास तरह की फ्लेक्स-फ्यूल कन्वर्जन किट की टेस्टिंग की गई है. जिसके नतीजे काफी हद तक पुरानी बीएस4 और बीएस6 कारों के लिए सकारात्मक रहे हैं। 

दीपक बलानी ने ये भी बताया कि, इस कन्वर्जन किट की टेस्टिंग रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है. हालांकि इसे इंपोर्ट कर के लाया गया था तो इसकी कीमत 50,000 रुपये है. लेकिन अगर इसे स्थानीय स्तर पर डेवलप किया जाता है तो इसकी कीमत तकरीबन 20,000 रुपये तक हो सकती है. ISMA ने इस किट को मारुति डिजायर कार में टेस्ट किया था। 

कैसे किया गया सर्वे
लोकलसर्किल्स का यह सर्वे देश के 316 जिलों के 22,567 पेट्रोल वाहन मालिकों के बीच किया गया. इसमें 69 प्रतिशत पुरुष और 31 प्रतिशत महिलाओं ने हिस्सा लिया. करीब 46 प्रतिशत लोग टियर-1 जिलों से, 32 प्रतिशत टियर-2 जिलों से और बाकी 22 प्रतिशत टियर-3, टियर-4, टियर-5 और ग्रामीण इलाकों से थे. लोकल सर्किल्स के अनुसार सर्वे में शामिल सभी लोग उसके प्लेटफॉर्म के रजिस्टर्ड और सर्टिफाइड यूजर थे। 

RSS पर टिप्पणी को लेकर BJP सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल का तीखा बयान, बोले- उंगली उठाई तो हाथ तोड़ देंगे

खंडवा
 मध्य प्रदेश की सियासत में अयोध्या के श्री राम मंदिर को लेकर एक बार फिर जुबानी तीर चलने शुरू हो गए हैं। इस बार कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि मंदिर में बिना कलश स्थापना के ही प्राण प्रतिष्ठा की गई और भगवान राम की प्रतिमा का रंग भी काला है। उन्होंने दावा किया कि इन्हीं वजहों से देश में ‘दंड’ मिल रहा है और वर्तमान की अप्रिय घटनाएं इसी का नतीजा हैं।

बीजेपी सांसद का करारा पलटवार
दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद बीजेपी पूरी तरह हमलावर हो गई है। बुरहानपुर पहुंचे खंडवा संसदीय क्षेत्र के बीजेपी सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। सांसद ने साफ लफ्जों में कहा कि ऐसी ही बातें कह-कहकर दिग्विजय सिंह ने खुद का और अपनी कांग्रेस पार्टी का सत्यानाश कर लिया है।

‘प्रभु राम ने कर दिया बेड़ापार’
जो लोग कभी भगवान राम और रामसेतु को काल्पनिक बताते थे, प्रभु श्री राम ने आज उनकी और उनकी पार्टी की क्या स्थिति कर रखी है, यह सब देख रहे हैं। दरअसल, इनका खुद का मन काला है। इन्हें हर समय हिंदू समाज पर उंगली उठाने में ही आनंद आता है। प्रभु श्री राम इनको ऐसी ही सद्बुद्धि देते रहें और इनका जो बेड़ापार हुआ है, वह आगे भी ऐसे ही होता रहे। जब से राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ है, इनके पेट में दर्द हो रहा है। ये लोग गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।- ज्ञानेश्वर पाटिल, सांसद, खंडवा

आरएसएस पर दिया बड़ा बयान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर चंदा चोरी के आरोपों को लेकर भी सांसद पाटिल ने सख्त चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि संघ एक पवित्र संस्था है और इसके मार्गदर्शन में सब काम कर रहे हैं। इस पर गलत आरोप लगाने वाले और उंगली उठाने वाले तत्वों की उंगली और हाथ तोड़ दिया जाएगा। उन्होंने साफ किया कि चंदे के मामले में जिन कर्मचारियों की गड़बड़ी सामने आई थी, उन पर पहले ही एक्शन लिया जा चुका है और दोषियों को बिल्कुल बख्शा नहीं जाएगा।

 

‘गर्भ रखना या नहीं, फैसला महिला का अधिकार’: इंदौर हाईकोर्ट ने कहा- पति की सहमति जरूरी नहीं

इंदौर

हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कानून में निर्धारित अवधि के भीतर गर्भावस्था होने पर यह निर्णय पूरी तरह महिला का होगा कि वह गर्भ जारी रखना चाहती है या उसका समापन कराना चाहती है। कोर्ट ने कहा कि गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है। इसी के साथ खंडपीठ ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) ऐक्ट के तहत गर्भसमापन की अनुमति प्रदान कर दी।

यह आदेश 29 जून 2026 को पारित किया गया। मामला इंदौर संभाग के एक हाई प्रोफाइल दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह करीब दो वर्ष पहले हुआ था। विवाह के बाद दोनों के बीच लगातार विवाद बढ़ने लगे। इसी दौरान महिला गर्भवती हो गई। गर्भावस्था लगभग 13 सप्ताह की थी, लेकिन पति-पत्नी के रिश्तों में आई खटास के कारण दोनों अलग रहने लगे।

महिला का कहना था कि वैवाहिक संबंध टूटने की स्थिति में बच्चे का जन्म उसके लिए मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कठिन होगा। भविष्य को देखते हुए उसने गर्भ जारी नहीं रखने का निर्णय लिया और अधिवक्ता जी.पी. सिंह के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी।

कोर्ट ने क्या कहा
जब महिला अलग रहने लगी तो महिला नहीं चाहती थी कि बच्चा जन्म ले. इसलिए उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. फिर कोर्ट ने 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति दी है. साथ ही स्पष्ट किया है कि कानून द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर गर्भावस्था है तो महिला खुद तय कर सकती है कि वह गर्भ रखना चाहती है या नहीं. उसे गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है। 

क्या है प्रेगनेंसी एक्ट
कोर्ट ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का मानसिक और शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक महिला पर पड़ता है, इसलिए गर्भ जारी रखना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय महिला का ही होगा. कोर्ट ने कहा कि महिला की गर्भावस्था 13 सप्ताह और एक दिन की है, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट, 1971 की निर्धारित सीमा के भीतर है. ऐसे मामलों में अधिकृत डॉक्टर्स कानून के अनसार गर्भसमापन की प्रक्रिया कर सकते हैं। 

पति को नोटिस, फिर भी कोर्ट में नहीं हुआ उपस्थित
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पति को नोटिस जारी किया था, जिसकी विधिवत तामील भी हो गई थी, लेकिन वह किसी भी तारीख पर अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। वहीं, राज्य शासन की ओर से भी याचिका का कोई विरोध नहीं किया गया।

अनुच्छेद-21 के तहत महिला की स्वायत्तता को बताया अधिकार
खंडपीठ ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले ‘एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यह उसकी व्यक्तिगत गरिमा और मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

कोर्ट ने फैसले में महिला के प्रजनन अधिकारों को बताया सर्वोपरि
हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि अवांछित गर्भावस्था का सबसे अधिक मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक प्रभाव महिला पर पड़ता है। इसलिए यह निर्णय कि गर्भावस्था को जारी रखा जाए या उसका समापन कराया जाए, पूरी तरह महिला का व्यक्तिगत और संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मातृत्व स्वीकार करने या गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की गर्भावस्था 13 सप्ताह और एक दिन की थी, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 में निर्धारित वैधानिक सीमा के भीतर आती है। ऐसे मामलों में कानून अधिकृत चिकित्सकों को आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण और प्रक्रिया का पालन करते हुए गर्भसमापन की अनुमति देता है। इसलिए याचिकाकर्ता का मामला भी कानूनी रूप से गर्भपात की अनुमति दिए जाने योग्य पाया गया।

सहमति के बाद पीछे हट गया पति
महिला ने अपने एडवोकेट जीपी सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई और गर्भपात की अनुमति मांगी गई। कोर्ट को बताया कि पति के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय हो चुका था, लेकिन बाद में पति अपने रुख से पीछे हट गया। ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके लिए मानसिक तनाव, असुरक्षा और भावनात्मक पीड़ा का कारण बन रहा है।

पति को नोटिस, फिर भी नहीं हुआ पेश
मामले में पति को नोटिस जारी किया गया था और उसकी तामील भी हो चुकी थी, लेकिन वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ। राज्य शासन की ओर से भी याचिका पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई।

कोर्ट ने माना प्रजनन स्वतंत्रता मौलिक अधिकार
मामले में कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले ‘एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत महिला को अपनी शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है।

जानिए क्या और क्यों दी गर्भपात की अनुमति

  •     कोर्ट ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का मानसिक और शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक महिला पर पड़ता है, इसलिए गर्भ जारी रखना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय महिला का ही होगा।
  •     कोर्ट ने कहा कि महिला की गर्भावस्था 13 सप्ताह और एक दिन की है, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट, 1971 की निर्धारित सीमा के भीतर है। ऐसे मामलों में अधिकृत डॉक्टर्स कानून के अनुसार गर्भसमापन की प्रक्रिया कर सकते हैं।
  •     कोर्ट ने यह भी माना कि वैवाहिक स्थिति में बदलाव, पति-पत्नी का अलग रहना और तलाक की स्थिति भी गर्भपात की अनुमति के लिए वैध आधार हो सकते हैं।
  •     आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिला की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं।
  •     कोर्ट ने डॉक्टर्स को निर्देश दिया कि गर्भपात की प्रक्रिया स्वास्थ्य मंत्रालय और कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप पूरी सावधानी और संवेदनशीलता के साथ की जाएं। याचिका स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने महिला को गर्भपात की अनुमति प्रदान कर दी और मामले का निराकरण कर दिया।

वैवाहिक विवाद और अलगाव को माना अहम आधार
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि पति-पत्नी के संबंध गंभीर रूप से बिगड़ चुके हों, दोनों अलग रह रहे हों या तलाक जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो, तो ऐसी परिस्थितियां महिला के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं। ऐसे मामलों में महिला यदि गर्भ जारी नहीं रखना चाहती है, तो यह गर्भसमापन की अनुमति देने के लिए एक वैध और न्यायसंगत आधार हो सकता है।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि महिला की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार हैं। इसलिए महिला के शरीर और प्रजनन से जुड़े निर्णयों में उसकी इच्छा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति की सहमति को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।

चिकित्सकों को दिए संवेदनशीलता बरतने के निर्देश
खंडपीठ ने संबंधित चिकित्सकों को निर्देशित किया कि गर्भसमापन की पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा न्यायालय द्वारा निर्धारित सभी दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन करते हुए की जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया के दौरान महिला की गोपनीयता, गरिमा और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए तथा आवश्यक चिकित्सकीय सावधानी और संवेदनशीलता बरती जाए।

मुंगेली : महतारी वंदन योजना बनी सुनीता साहू के बच्चों की बेहतर शिक्षा का आधार

मुंगेली : महतारी वंदन योजना बनी सुनीता साहू के बच्चों की बेहतर शिक्षा का आधार

प्रतिमाह की सहायता राशि से बच्चों की पढ़ाई और स्कूल वैन का खर्च हो रहा आसान

मुंगेली

 मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय के नेतृत्व में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से संचालित महतारी वंदन योजना जिले की हजारों महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है। प्रतिमाह मिलने वाली आर्थिक सहायता महिलाओं को न केवल आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण सहयोग दे रही है। जिले के ग्राम लिम्हा की निवासी श्रीमती सुनीता साहू भी इस योजना का लाभ उठाकर अपने परिवार के भविष्य को संवार रही हैं। उन्हें प्रतिमाह मिलने वाली 01 हजार रुपये की सहायता राशि बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने का अवसर दे रही है। 
     सुनीता ने बताया कि इस राशि से वे अपने बच्चों की स्कूल वैन का किराया और पढ़ाई से जुड़ी आवश्यकताओं को सहजता से पूरा कर पा रही हैं। पहले बच्चों की पढ़ाई से जुड़े खर्चों का प्रबंधन करना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता था, लेकिन अब महतारी वंदन योजना से मिलने वाली नियमित सहायता ने काफी राहत दी है। इससे बच्चों की पढ़ाई बिना किसी बाधा के जारी है और परिवार की आर्थिक स्थिति भी पहले से अधिक संतुलित हुई है। उन्होंने बताया कि योजना से मिलने वाली राशि छोटी जरूर है, लेकिन नियमित रूप से मिलने के कारण यह परिवार के लिए बड़ा सहारा बन गई है। इससे बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देना आसान हुआ है और भविष्य को लेकर आत्मविश्वास भी बढ़ा है। सुनीता साहू ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महतारी वंदन योजना महिलाओं के सम्मान, आत्मनिर्भरता और परिवार की आर्थिक मजबूती का प्रभावी माध्यम बन रही है। 

सुशासन तिहार से 53 नए टीबी मरीजों की पहचान कर तत्काल उपचार शुरू

रायपुर.

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देशन में आयोजित सुशासन तिहार जनसमस्याओं के त्वरित समाधान के साथ स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रभावी अभियान बनकर उभरा है। इसी क्रम में 1 मई से 10 जून 2026 तक सरगुजा जिले में राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत विशेष स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर टीबी की समय पर पहचान, उपचार और जनजागरूकता पर व्यापक अभियान चलाया गया।

जिला प्रशासन एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा आयोजित 42 विशेष स्वास्थ्य शिविरों में 5,890 लोगों की डिजिटल एक्स-रे जांच की गई, जिनमें 30 व्यक्तियों में टीबी की पुष्टि हुई। वहीं 538 बलगम (स्पुटम) जांच में 23 मरीज टीबी पॉजिटिव पाए गए। अभियान के दौरान कुल 53 नए टीबी मरीजों की पहचान कर उनका तत्काल उपचार प्रारंभ कराया गया, जिससे बीमारी के प्रसार को रोकने और मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने में सफलता मिली। अभियान के दौरान संभावित मरीजों की पहचान, जांच, उपचार एवं नियमित फॉलोअप की प्रभावी मॉनिटरिंग की गई। साथ ही निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत उपचाररत मरीजों को पोषण सहायता उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया गया।

जिले की 40 ग्राम पंचायतों के सचिवों ने निक्षय मित्र के रूप में सहभागिता निभाते हुए उपचाररत 38 टीबी मरीजों को फूड बास्केट प्रदान किए, जिससे उपचार अवधि में उन्हें आवश्यक पोषण सहयोग मिल सके। टीबी मुक्त ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से टीबी मुक्त घोषित ग्राम पंचायतों के सरपंच, पंच एवं सचिवों को जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों की उपस्थिति में महात्मा गांधी जी की प्रतिमा एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस पहल से अन्य ग्राम पंचायतों को भी टीबी उन्मूलन अभियान में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरणा मिल रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की मंशा के अनुरूप सुशासन तिहार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित की जा रही है।

स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि यदि दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना या टीबी के अन्य लक्षण दिखाई दें तो निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में निःशुल्क जांच अवश्य कराएं। समय पर जांच, नियमित उपचार और जनसहभागिता से टीबी मुक्त सरगुजा तथा टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य को शीघ्र साकार किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश : पीएम स्वनिधि में घटी लंबित फाइलें, फिर भी 78 हजार से ज्यादा हितग्राही बैंक मंजूरी के इंतजार में

विवेक झा, भोपाल। प्रधानमंत्री स्वनिधि (PM SVANidhi) योजना के तहत मध्यप्रदेश में लंबित आवेदनों की संख्या में कमी जरूर आई है, लेकिन अब भी 78,426 स्ट्रीट वेंडर्स बैंक मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में जहां 88,290 आवेदन लंबित थे, वहीं जून 2026 के पहले सप्ताह तक यह संख्या घटकर 78,426 रह गई। यानी करीब ढाई महीने में लगभग 9,864 मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन लंबित मामलों की संख्या अभी भी काफी अधिक बनी हुई है। इसी कारण मुख्य सचिव ने बैंकों को लंबित मामलों का शीघ्र निराकरण करने के निर्देश दिए हैं।

SLBC बैठक में उठाया गया लंबित आवेदनों का मुद्दा

रिपोर्ट के अनुसार 197वीं SLBC बैठक में पीएम स्वनिधि योजना की समीक्षा के दौरान नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग (UADD) के आयुक्त ने बैंकों से कहा कि वे लंबित मामलों पर विशेष ध्यान दें और पात्र हितग्राहियों के आवेदन जल्द स्वीकृत अथवा निरस्त करें। बैठक में यह भी कहा गया कि अनावश्यक लंबित फाइलें योजना के उद्देश्य को प्रभावित कर रही हैं।

मुख्य सचिव ने दिए सख्त निर्देश

बैठक में मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि पीएम स्वनिधि और प्रधानमंत्री आवास योजना (ISS) दोनों योजनाओं को नियमित रूप से कलेक्टर कॉन्फ्रेंस के एजेंडे में शामिल किया जाए, ताकि जिलों में लंबित मामलों की लगातार समीक्षा हो सके और बैंक समय पर कार्रवाई करें। रिपोर्ट के अनुसार इस निर्देश के पालन के लिए संबंधित विभागों ने सहमति भी दे दी है।

तीन महीने में करीब 10 हजार आवेदन कम हुए

SLBC की एक्शन टेकन रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2026 में पीएम स्वनिधि योजना के तहत 88,290 आवेदन लंबित थे। बैंकों और संबंधित विभागों की कार्रवाई के बाद 5 जून 2026 तक यह संख्या घटकर 78,426 रह गई। हालांकि यह सुधार सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लंबित आवेदन यह भी दर्शाते हैं कि योजना के क्रियान्वयन में अभी काफी सुधार की आवश्यकता है।

छोटे कारोबारियों की आजीविका से जुड़ा है मामला

पीएम स्वनिधि योजना का उद्देश्य रेहड़ी-पटरी और फुटपाथ पर व्यवसाय करने वाले छोटे कारोबारियों को बिना गारंटी कार्यशील पूंजी ऋण उपलब्ध कराना है। बैंक मंजूरी में देरी होने से हजारों स्ट्रीट वेंडर्स समय पर वित्तीय सहायता नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं, जिससे उनके व्यवसाय और आय पर सीधा असर पड़ता है। इसी कारण राज्य सरकार और SLBC ने बैंकों को लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे पर विशेष जोर दिया है।

पीएम आवास योजना में भी दिखा सुधार

रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना (ISS) के तहत CNA स्वीकृत मामलों की संख्या भी बढ़ी है। मार्च 2026 में जहां 7,491 मामले स्वीकृत थे, वहीं 5 जून 2026 तक यह संख्या बढ़कर 9,830 हो गई। सरकार का लक्ष्य इसे 10 हजार तक पहुंचाना है। इससे स्पष्ट है कि दोनों योजनाओं में बैंकिंग प्रक्रियाओं को तेज करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

बैंकों की जवाबदेही बढ़ेगी

SLBC ने स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में पीएम स्वनिधि के लंबित मामलों की नियमित समीक्षा की जाएगी। जिला स्तर पर भी कलेक्टरों और लीड बैंकों को निगरानी की जिम्मेदारी दी जाएगी, ताकि पात्र हितग्राहियों को समय पर ऋण मिल सके और योजना का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

फैक्ट फाइल

  • मार्च 2026 में लंबित आवेदन: 88,290
  • 5 जून 2026 तक लंबित आवेदन: 78,426
  • करीब ढाई महीने में निपटे आवेदन: 9,864
  • PMAY (ISS) के CNA स्वीकृत मामले: 7,491 से बढ़कर 9,830
  • निर्देश: पीएम स्वनिधि और PMAY की नियमित समीक्षा कलेक्टर कॉन्फ्रेंस में होगी।

दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने और संरक्षित करने में मध्यप्रदेश देश में प्रथम

दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने और संरक्षित करने में मध्यप्रदेश देश में प्रथम

देश की प्राचीन मेधा को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने का महायज्ञ- अपर मुख्य सचिव  शुक्ला
ज्ञान भारतम् ऐप पर मध्यप्रदेश ने अपलोड की सबसे अधिक दुर्लभ पांडुलिपियाँ
प्रदेश की 34 लाख 45 हजार से अधिक पांडुलिपियों पन्नों का पंजीकरण, 12 लाख से अधिक पांडुलिपियों का हुआ सत्यापन

भोपाल :

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सांस्कृतिक अभ्युदय के संकल्प को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सशक्त नेतृत्व में साकार किया जा रहा है। मध्यप्रदेश की धरती ने भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के विषय में देश भर में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार की डिजिटल पहल ‘ज्ञान भारतम् ऐप’ के अनुसार, दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों की सूचना दर्ज करने और उनके संरक्षण के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में प्रथम स्थान पर आ गया है। यह सफलता राज्य की समृद्ध ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रही है। अब तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ज्ञान भारतम् ऐप के माध्यम से 3 जुलाई 2026 को मध्यप्रदेश ने अब तक कुल 34 लाख 45 हजार 439 पांडुलिपियों पन्नों का पंजीकरण किया जा चुका है। 12 लाख 13 हजार 127 पांडुलिपियों का ‘ज्ञान भारतम्’ द्वारा सफलतापूर्वक सत्यापन हुआ है शेष सत्यापन की प्रक्रिया में हैं, जिनका चरणबद्ध तरीके से परीक्षण एवं प्रमाणीकरण किया जा रहा है।

देश की प्राचीन मेधा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महायज्ञ- अपर मुख्य सचिव श्री शिव शेखर शुक्ला

अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व तथा सामान्य प्रशासन श्री शिव शेखर शुक्ला ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा है कि आज भी विश्वभर के मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों और संग्रहालयों में संरक्षित भारतीय पाण्डुलिपियाँ हमारी समृद्ध ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। इनका संरक्षण, डिजिटलीकरण और पुनर्प्रसार भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। इसी के साथ भारत अपनी ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करते हुए ‘विश्व गुरु’ की अपनी गौरवशाली पहचान को सशक्त बना रहा है। मध्यप्रदेश के जिलों के उत्कृष्ट प्रयासों ने न केवल प्रदेश की समृद्ध ज्ञान परंपरा के संरक्षण को नई दिशा दी है, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एवं बौद्धिक धरोहर को संरक्षित करने के राष्ट्रीय अभियान को भी मजबूती प्रदान की है।

प्रदेश में पांडुलिपियों के पंजीकरण के लिए विशेष अभियान

ज्ञान भारतम् अभियान के अंतर्गत पांडुलिपियों के पंजीकरण में मध्यप्रदेश के सभी जिलों में विशेष अभियान चलाया जा रहा है। 1 जुलाई तक के आकंड़ों के अनुसार इनमें भोपाल ने सबसे अधिक 24 लाख 26, हजार 172 पांडुलिपियों का पंजीकरण किया है। इसके बाद इंदौर में 3,99,477, रीवा में 2,68,763, बैतूल में 1,00,593 तथा छिंदवाड़ा में 77,094 पांडुलिपियां दर्ज की गईं। पन्ना से 64,257, सागर से 60,025, ग्वालियर से 29,870, उज्जैन से 20,995, रायसेन से 15,539, मंदसौर से 12,412, अनूपपुर से 11,829, नीमच से 8,950, मऊगंज से 8,406, खंडवा से 5,740, जबलपुर से 4,715, सतना से 4,061, नर्मदापुरम (होशंगाबाद) से 4,049, गुना से 3,937, उमरिया से 3,824, दतिया से 3,179, विदिशा से 2,745, सीधी से 2,497, अशोकनगर से 1,908, बालाघाट से 1,741, शहडोल से 1,397, टीकमगढ़ से 1,290, मंडला से 957, शिवपुरी से 943, धार से 870, भिंड से 800, रतलाम से 731, मुरैना से 655, शाजापुर से 638, बड़वानी से 614, सीहोर से 607, सिवनी से 564, छतरपुर से 381, देवास से 330, श्योपुर से 310, नरसिंहपुर से 254, राजगढ़ से 198, निवाड़ी से 177, खरगोन से 171, मैहर से 146, दमोह से 133, बुरहानपुर से 120, हरदा से 84, कटनी से 83, आगर मालवा से 57, सिंगरौली से 33, झाबुआ से 17, अलीराजपुर से 8, पांढुर्ना से 3 तथा डिंडोरी से 1 पांडुलिपि का पंजीकरण किया गया। यह व्यापक सहभागिता दर्शाती है कि प्रदेश के सभी जिलों ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण के राष्ट्रीय अभियान में अपनी सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

‘ज्ञान भारतम् ऐप’ और इसका उद्देश्य

‘ज्ञान भारतम् ऐप’ भारत सरकार की एक अनूठी डिजिटल पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखना और दुर्लभ पांडुलिपियों का एक विशाल डिजिटल अभिलेख (Digital Archive) तैयार करना है। ये भारतीय पांडुलिपियाँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (विश्व एक परिवार है) की भावना से प्रेरित ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों का जीवंत स्रोत हैं, जो संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं। इस डिजिटल अभियान के माध्यम से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों के लिए इन अमूल्य ग्रंथों तक पहुँच बेहद आसान हो गई है।

पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण में नागरिक भी बन सकते हैं भागीदार

ज्ञान भारतम् ऐप न केवल सूचना देता है, बल्कि आम जनता को भी इस सांस्कृतिक महायज्ञ से जोड़ता है। स्मार्ट सर्च: उपयोगकर्ता शीर्षक, लेखक, भाषा, विषय और संग्रह स्थल के आधार पर किसी भी पांडुलिपि की जानकारी आसानी से खोज सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति या संस्था के पास कोई दुर्लभ पांडुलिपि उपलब्ध है, तो वे ऐप के माध्यम से उसके संरक्षण या डिजिटलीकरण के लिए सीधे अनुरोध दर्ज कर सकते हैं। आम नागरिक अपने पास मौजूद प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों की जानकारी साझा कर भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के रूप में स्थापित करने में अपना योगदान दे सकते हैं।

जिलों से मिलीं दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियाँ

ज्ञान भारतम् मिशन से हुए संरक्षण कार्य से कई प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों का पता चला है। टीकमगढ़ से 10 फीट लंबा जम्बूद्वीप का रहस्यमयी नक्शा मिला है। इसमें प्राचीन भारतीय भूगोल को दर्शाने वाला ‘जम्बूद्वीप’ का एक अत्यंत रहस्यमयी और दुर्लभ नक्शा अंकित है।चित्र में बीच में वृत्ताकार संरचना है, उसके चारों ओर पर्वत-मालाएं और क्षेत्र दिखाए गए हैं।

इसी तरह पन्ना से महाकवि केशव दास रचित रसिक प्रिया(1591 ई) की हस्त लिखित पांडुलिपि श्री राम जानकी मंदिर में मिली है। यह रीतिकाल का एक प्रतिष्ठित ‘लक्षण-ग्रंथ’ है जो काव्यशास्त्र, श्रृंगार रस और नायिका-भेद पर आधारित है। इसमें अमूर्त शास्त्रीय नियमों को राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों और मौलिक छंदों के माध्यम से समझाया गया है।

बुरहानपुर से 220 वर्ष पुराना हस्तलिखित 20 फीट लंबा प्राचीन ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ ग्रंथ भी शामिल है, जिसका आधिकारिक तौर पर पंजीयन कर लिया गया है। दतिया के श्री राधा वल्लभ मिश्रा के आवास से ओरछा नरेश राजा उद्दोत सिंह के समय का एक ताम्रपत्र अभिलेख प्राप्त हुआ है, जिस पर विक्रम संवत 1828 अंकित है।

 

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